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Tuesday, July 28, 2026
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गंगा का मौन हाहाकार…!!

Dr.JitendraPandey@Navpravah.com

शाम हो रही थी। गगन कुछ रक्ताभ हो चला था। सूरज अपनी  मखमली किरणों को समेटने की तैयारी में था।भगवान शिव की  गगनचुम्बी  प्रतिमा त्रिलोक पर अपना एकाधिकार जमाने के लिए बिल्कुल समाधिस्थ थी। हरिद्वार में “हर की पौड़ी” पर चहल-पहल बढ़ने लगी।घाट धोए जा रहे थे। सीढ़ियों पर चटाइयां और चादरें बिछाकर लोग अपनी-अपनी जगह सुनिश्चित कर लेना चाहते थे-गंगा की मनोरम आरती जो होने वाली थी। कुछेक क्षणों में घड़ियाल ,शंख आदि आरती के वाद्य यंत्र बजने लगे। गंगा की अनगिनत लघु तरंगें दीपों के मद्धिम आलोक में झिलमिलाने लगीं। भवतारिणी को पंचामृत से स्नान कराया जा रहा था। गोधूलि की वेला में  रमणीयता पल-पल  बढ़ रही थी। तट पर दीपावलोक की आभा मनोहारिणी थी।ऐसा लग रहा था मानो एक विशालकाय जलयान असंख्य लोगों को लेकर ज्योतिर्यात्रा पर निकला हो और ब्रह्मकुंड के अमृत से सभी सराबोर हों। बिल्कुल वही “तमसो मा ज्योतिर्गमय वाली शाश्वत यात्रा।वातावरण की दिव्यता तन-मन और आत्मा में उतरने लगी।

गंगा-आरती में शामिल होना सुखकर लगा।इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भी यही था।हम लोग अपने निवास-स्थल की ओर बढ़ने लगे।रात्रि-भोजन के पश्चात दूसरे दिन की योजना बना सभी अपने-अपने बिस्तर पर लेट गए।शरीर थका था किन्तु मन भरपूर ताज़गी से लवरेज़।शाम का अनोखा दृश्य पुनः साकार होने लगा।त्रिबिध-ताप-विनाशिनी गंगा का कन्या रूप कई भावों को झंकृत कर रहा था।भारतीय धर्म,साहित्य,संस्कृति,संगीत और कला की प्राणस्वरूपा  माँ गंगा हमारे लिए अनमोल एवं रक्षणीय हैं।युगानुरूप इस यथार्थ को हमें समझना होगा।हमें अपनी आस्थाओं पर पुनर्मन्थन करना होगा।उन कारणों पर पुनर्विचार करना होगा जिनसे गंगा का शुद्ध जल ज़हरीला बनता जा रहा है।सुरसरि की गोमुख से गंगासागर तक की यात्रा क्यों इतनी दुष्कर हो गई ? स्वार्थ में डूबा मनुष्य क्या अपनी माँ के दर्द को अनसुना कर दिया है ? मात्र दोहन ही उसका धर्म है ? गंगा-सफाई के लिए केवल सरकारें जिम्मेदार हैं , हम नहीं ? अपनी संतानों के कारण भविष्य में गंगा का क्या स्वरूप होगा ? क्या हम अपने पूर्वजों की इस विरासत को यूँ ही दम तोड़ते देखते रहेंगे ? इन्हीं अनुत्तरित प्रश्नों के भंवरजाल में न जाने कब आँख लग गई।

सुबह बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था।नहा-धोकर हम सभी बस से ऋषिकेश के लिए रवाना हुए। ऋषिकेश को योग की जन्मस्थली भी माना जाता है। टूरिस्ट गाइडों ने अपनी-अपनी सहूलियत के लिए बस- यात्रियों को दो जत्थों में बांटकर तमाम महत्त्वपूर्ण निर्देश जारी कर दिए । उतरते ही शिवानंद आश्रम चलने को कहा गया। हम अपने पथ-प्रदर्शकों के पीछे हो लिए।जगह-जगह हमसे हाथ जुड़वाते और मत्था टेकने को कहते।परिणामतः मैं कुछ असहज महसूस करने लगा था।कुछ समय बाद हमें “लक्ष्मण झूला” पर लाया गया। सुरम्य पहाड़ियों से होकर निकलने वाली माँ गंगा का सिरमौर-सा लगने वाला यह पुल अत्यंत मनोरम था। ऐसा लग रह था मानो कलकल करती प्रवाहमान आध्यात्मिक धारा पर विकास का चमकीला लेवल लगाया गया हो।मान्यता है कि राम के अनुज लक्ष्मण ने जूट की रस्सी बनाकर यहीं से गंगा-पार की थी। 1939 में लोहे के मजबूत तारों से 450 फीट लम्बे और 70 फीट ऊँचे पुल का निर्माण करवाया गया। तबसे सैलानियों के लिए यह पुल आकर्षण का कारण बना हुआ है।पुल के पश्चिमी किनारे से उतरते हुए हमने लक्ष्मण मंदिर और राम मंदिर के महात्म्य को जानने और समझने की कोशिश की। तत्पश्चात हम धार्मिक वस्तुओं के एक विशाल शोरूम में गए।रुद्राक्ष की अनेक किस्में। उनसे अलग-अलग लाभ। विक्रेताओं द्वारा  ज़ोरदार डेमो दिया गया।हमारे टूरिस्ट गाइडों ने भी  हम पर मानसिक दबाव बनाया।कभी डर , कभी लालच , कभी मान-प्रतिष्ठा तो कभी नए फैशन की दुहाई देकर श्रद्धालुओं को रुद्राक्ष खरीदने के लिए तैयार किया जा रहा था। अंतिम दाव खेलते हुए उन्होंने भयभीत ही कर दिया ” ऋषिकेश आकर जो रुद्राक्ष न खरीदे , उसकी यात्रा व्यर्थ मानी जाती है।” ऐसी स्थिति से बच पाना लगभग असम्भव होता है, वह भी जब परिवार साथ हो।मामूली खरीददारी करने के बाद हम स्वर्गाश्रम स्थित चोटीवाला रेस्टोरेंट पहुंचे।रेस्टोरेंट के मुख्य द्वार के दोनों ओर दो चोटीवालों की हृष्ट-पुष्ट और सुंदर मूर्ति थी। पास आने पर उन में हरकत देख हम हैरत में पड़ गए। अरे ! ये दोनों तो मानवीय पुतले हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इनके साथ फ़ोटो खिंचवा रहे थे। इनके निर्विकार चेहरे को देखकर ऐसा लगता था मानो समूचे देवभूमि की  शांति इन्हीं में समा गई हो।

भूख और थकान मिटाने के बाद नई स्फूर्ति और ताज़गी के साथ हम गंगा में नौका-विहार के लिए उतरे। बच्चों की किलकारियां गूंजने लगीं। नाव से झुककर लोग छटा-छटा पानी उछालते हुए एक-दूसरे के ऊपर फेंक रहे थे। मौज-मस्ती के साथ-साथ माँ गंगा के प्रति मन में कृतज्ञ भाव उभरने लगा। श्रद्धा से माथा झुक गया। अचानक मन भयभीत हो उठा।सम्भवतः इसके पीछे “अतिस्नेही पापशंकी ” की भावना हो।वैश्विक- ताप , प्रदूषण , वनों की अंधाधुंध कटाई आदि विकराल समस्याएं दिल में दहशत पैदा करने लगीं। सुकुमार सीता की तरह माँ गंगा। हाय! कैसे होगी इनके आत्मसम्मान की रक्षा ? आज कोई  भगीरथ भी नहीं दिखाई देता।भागीरथी के अमृत सदृश जल को ग्रहणकर नीलकण्ठ महादेव को पूजता हुआ जनमानस गंगा में विष-वमन कर रहा है।हमने आचरण और आस्था के बीच एक गहरी खाईं खोद ली है।ये  जीवन के दो छोरों पर स्थित हैं । व्यवधान रहित । नौका-विहार के बाद भारतमाता और वैष्णव देवी सहित कई विशाल मंदिरों की हमने परिक्रमाएं कीं। मौसम भी सुहावना हो चला था।अनिर्वचनीय आनंद से भरपूर हम हरिद्वार की तरफ लौट पड़े।

अगले दिन योजना के अनुसार हम हरिद्वार के गायत्री आश्रम  पहुंचे। बचपन से ही पम्पलेट, बुकलेट, पत्र-पत्रिकाओं आदि में गायत्री परिवार के संस्थापक युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के सुभाषित को पढ़ता रहा हूँ। उसी के साथ “हरिद्वार” शब्द ज़ेहन में लगभग बस-सा गया था। आज उसी वैचारिक ऊष्मा का साकार रूप  तपोभूमि के रूप में हमारे सामने था।हिमालय की छाया और सप्तर्षियों की तपस्थली में स्थापित यह आश्रम युग निर्माण का मुख्यालय है। यहां व्यक्ति, परिवार और समाज के निर्माण द्वारा युग निर्माण का  अनोखा विज़न है। धरती को स्वर्ग बनाने की सराहनीय पहल। गुरुकुल की प्राचीन परम्परा का वाहक यह आश्रम आधुनिक तकनीकी से भी लैस था।यज्ञशाला, प्रवचन हॉल, समाधि-स्थल, योग-भवन, पुस्तकालय से लेकर आचार्यों के आवास तक सभी भव्य व रमणीक लगे। छात्रों का सेवा-भाव प्रशंसनीय था।लोगों का रेला  लगातार प्रसाद (भोजन) ग्रहण करने के लिए आ रहा था। सबके लिए समान व समुचित व्यवस्था। कहीं कोई आडम्बर नहीं। सर्वत्र सादगी व शांति। भारतीय संस्कृति की सुगंध चारों ओर मह-मह कर रही थी। संभवतः “देव-कानन” की परिकल्पना कुछ इसी तरह होगी।

बहुत कुछ सोद्देश्य घूमने के उपरांत हम हरिद्वार-दिल्ली राष्ट्रीय महामार्ग पर स्थित पतंजलि योगपीठ आए। शानदार  प्रांगण में स्थापित महर्षि पतंजलि की विशाल मूर्ति योगपीठ को और भी भव्य बना रही थी।

अलग-अलग विभागों में बंटा योगपीठ आज दुनिया को जीवन जीने की प्राचीन शैली से परिचित करा रहा है जिसमें योग का सर्वाधिक महत्त्व है।जीवन की आपाधापी में कुछ क्षण ठहरकर “स्व” पर विचार करने की ज़रूरत बनता जा रहा है योग। “बांटो और राज करो” की अमानवीय नीति का विकल्प है यह।कुल मिलाकर योग राजनीति, साहित्य, स्वास्थ्य, समाज, परिवार और व्यक्ति के लिए अपरिहार्य है, चाहे योग का जो भी सकारात्मक रूप हो।यह समष्टि के लिए शिव है।इसीलिए योगगुरु बाबा रामदेव ने योग को पुनः प्रचलित करने का संकल्प लिया होगा। विभिन्न भाषाओँ में निकलने वाली “योग संदेश” पत्रिका बाबा के संकल्पों की वाहक है।साथ ही हमें देववाणी संस्कृत पर गर्व होता है । इस भाषा का अध्ययन करके एक साधारण -सा छात्र बाबा रामदेव बना जिसने अपनी व्यावसायिक मेधा द्वारा तमाम ऊँचे कॉर्पोरेट घरानों को शुद्धता के मामले में चुनौती दी। आज मार्केट में पतंजलि उत्पादों की धूम है। दिव्य फार्मेसी,पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड और पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क लिमिटेड के संयुक्त प्रयासों ने देश में स्वदेशी-नारे को एक गति दी है। कुल मिलाकर पतंजलि योग पीठ का अस्तित्व में आना भारतीयता का जय-घोष है और उनके लिए एक आईना है जो विदेशी उत्पादों के गुलाम बनकर रह गए हैं।

आख़िर वह दिन भी आया जब हम देवभूमि हरिद्वार को छोड़ने के लिए तैयार थे।प्रकृति में संस्कृति के वैभव को महसूस करते हुए मैं बड़ा आश्वस्त था।एक-एक चित्र रील की तरह घूमने लगा।इसी बीच हरिद्वार स्टेशन के लिए हम ऑटो में बैठ चुके थे। माँ गंगा की दिव्य-आरती का पुनः स्मरण हो आया।असंख्य कंठों से फूटता जय-घोष । ज्योति- पर्व में जगमगाता घाट। शंख और घंटों की सम्मिलित ध्वनियों में लग रहा था जैसे त्रिपथगा खिलखिला रही हों। दूसरे ही क्षण मुझे ऐसा लगा मानो भवतारिणी अशांत हों। मौन-रुदन से संतप्त।उनकी यह व्यथा कपिल मुनि के शाप से भस्म राजा सगर के पुत्रों के लिए नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व के लिए थी।यह वेदना मानवजाति के भविष्य को लेकर थी क्योंकि वह सबका हित चाहती हैं – “सुरसरि सम सब कहँ हित होई।” माँ की ममतामयी पुकार और असीम हाहाकार को अनसुना कर हम आगे बढ़ रहे थे।

उकसाववाद की राजनीति और धार्मिक असहिष्णुता

आनंद रूप द्विवेदी, 

ग्वालियर म०प्र०.

स्वतंत्र रूप से विचार अभिव्यक्ति की परिस्थितियां स्वस्थ जनमत के निर्माण में परमतत्व की भूमिका अदा करती हैं | सर्वाधिकारवादी व्यवस्थाओं में सत्ता की निरंकुश प्रवृत्ति तथा विचार-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभाव स्वस्थ जनमत-निर्माण में सबसे बड़ा बाधक है | हाल ही में हुई दादरी दुर्घटना के उत्तरार्ध में छुट्भइये नेताओं का जमावड़ा, बेतरतीब बयानबाजी, राजनीतिक स्वार्थ के चलते सहानुभूति का पाखण्ड कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान भी छोड़ता है | धार्मिक संवेदना जितनी आम जनमानस पर प्रभाव डालती है उतना ही राजनेता इससे लाभ लेना जानते हैं | कल तक भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मोर्चा ताने खड़े आम आदमी पार्टी सुप्रीमो केजरीवाल भी इस मौके को भुनाने में पीछे नहीं रहे | सवाल फिर भी जस का तस है ! क्या धार्मिक भावनाएं किसी की जान से ज्यादा मायने रखती हैं ? क्या पीड़ित व्यक्ति व उसके परिवार को न्याय मिलने से ज्यादा इसे एक ब्रेकिंग न्यूज़ बना देना ही सहृदयता है ? इन सबसे ऊपर ,क्या तथाकथित धर्म के पैरोकार नेताओं से हम संवेदनशील बयानबाजी की अपेक्षा भी नहीं रख सकते ? संवेदना के नाम पर पीड़ित परिवार के लिए आर्थिक पैकेज यदि व्यवस्था और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में सफ़ल और कारगर औज़ार साबित हों तो फिर कहना ही क्या |

            सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन की मानें तो, “भारत एक सिक्यूलर देश है…कब तक रहेगा ये कह नहीं सकते क्योंकि इसे लेकर कई समस्याएं भी सामने आ रही हैं |” संदेह की स्थिति आम जनमानस के मन से इतर कहीं विधिवेत्ताओं के मन में भी स्पष्ट है | ये धार्मिक सौहार्द्र के प्रति घातक संकेत भी है | जब भी देश के किसी हिस्से में साम्प्रदायिक तनाव का माहौल तैयार हुआ , नेताओं ने आग में घी का काम ही किया है | हैदराबाद के ओवैसी बंधुओं ने इस मसले में विशेष महारत हासिल कर रखी है | खुलेआम देश की अखंडता को ललकारते ये राजनेता संविधान के प्रति खोखली आस्था व्यक्त करते भी नहीं चूकते |

            बेशक भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है लेकिन अनुच्छेद 19(2) इस पर युक्तियुक्त निर्बन्धन भी लगाते हैं जिसके अनुसार “भारत की प्रभुता और अखंडता” सर्वोपरि है | वहीं भारतीय दण्ड संहिता 1960 की धारायें 153 (A) तथा 295 (A) धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले शब्दों/कथनों को अपराध मानते हुए दण्ड का प्रावधान करती है | जनगण के मूल अधिकारों का उच्चतम संरक्षक माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी साम्प्रदायिक सौहार्द्र को आवश्यक तत्व मानते हुए कई बड़े निर्णय दे चुका है |

            एआइएमआईएम के अकबरुद्दीन देश के प्रधानमंत्री को शैतान कहे जाने के लिए गिरफ़्तार हों या आपराधिक अभियोग के जाल में फंसे, मुस्लिमों को देश छोड़ पाकिस्तान चले जाने को कहने वाले या उन्हें पाकिस्तानी कहने वाले तथाकथित धर्माचार्य/नेतागण भले ही बाज न आयें, किन्तु ये निर्णय हमारा होना चाहिए कि हमें किस तरह की व्यवस्था का हिस्सा बनना है | एक ओर देश जहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थायी सदस्यता की फ़िराक में जुटा हुआ है, वहीं दूसरी ओर हम इसे अपनी राजनीतिक लालसाओं की पूर्ति के लिए धार्मिक कट्टरता के घुन से नुकसान भी पहुंचा रहे हैं | जहाँ हम दूसरे देशों के उपग्रह अन्तरिक्ष में भेजने लायक हुए हैं वहीं गोमांस खाए जाने की खबर मात्र हमें मानव हत्या के लिए उकसा रही है |

            हिदुत्व इतना असहिष्णु हो सकता है या बना दिया गया लेकिन सनातन धर्म में सहिष्णुता ही इसकी सुन्दरता है| दूसरी ओर यदि गोमांस किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है तो इसका सेवन ही बंद क्यों न करें | क्या बिना गोमांस मानव जीवन दुष्कर होगा ? संजय दत्त और जैबुन्निसा काजी जैसों के लिए माफ़ी की मांग करने वाले रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज मार्कंडेय काटजू भी उकसाव की राजनीतिक सोच से बंधे हुए नज़र आते हैं | इन सभी बातों से इतर हाशिये पर खड़ी देश की एकता और अखंडता फिर भी जिंदा है और हमेशा रहेगी | दादरी काण्ड में मृतक के परिवार की रक्षा एक हिन्दू परिवार ने की तो लखनऊ में एक मुस्लिम युवक नमाज़ से उठकर अपने प्राणों को संकट में डालते हुए कुएं में गिरी गाय की जान बचाता है | देश की यही तस्वीर आधुनिक भारत के निर्माताओं के ज़ेहन में रही होगी | यही सच्चा भारत है |

 

17वां मुम्बई फ़िल्म फेस्टिवल 29 अक्टूबर से

AmitDwivedi@Navpravah.com

29 अक्टूबर से शुरू होने वाले मुम्बई फ़िल्म फेस्टिवल में दुनियाभर की 150 से अधिक फिल्में दिखाई जाएंगी। 17वें मामी फेस्टिवल में मशहूर फीचर, लघु और डॉक्यूमेंटरी फिल्में प्रदर्शित की जाएँगी।

फेस्टिवल के ज्यूरी के एक सदस्य ने बताया कि जियो मामी के दर्शकों को 31 भारतीय फिल्में देखने को मिलेंगी जो भारत में पहले कभी नहीं दिखाई गईं। इंडिया गोल्ड वर्ग में 13 फिल्में सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार के लिए दावेदारी करेंगी। भारतीय कहानी वर्ग में 15 काल्पनिक फीचर और पांच डॉक्यूमेंट्री फिल्में शामिल हैं।

फेस्टिवल में ‘आफ्टर डार्क’ नामक एक नया वर्ग शुरू किया जा रहा है, जिसमें हॉरर और साइंस बेस्ड काल्पनिक फिल्में दिखाई जाएंगी।

बच्चों के लिए भी मनोरंजक साबित होगी मामी-

फेस्टिवल में इस मर्तबा बच्चों के लिए भी एक नया वर्ग शुरू किया जा रहा है ‘हाफ टिकट’।इसमें दुनियाभर की एनीमेशन,डॉक्यूमेंट्री,फीचर और लघु फिल्में बच्चों के जूरी पुरस्कार के लिए लिए दावेदारी पेश करेंगी।

सलीम-जावेद किए जाएंगे सम्मानित-
सिनेमा में उत्कृष्टता के लिए दो पुरस्कार दिए जाएंगे, जिनमें से एक भारतीय और एक अंतर्राष्ट्रीय शख्सियत को दिया जाएगा। इनमें अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार इजरायली फिल्म निर्माता अमोस गिताई को और भारतीय पुरस्कार पटकथा लेखकों सलीम खान और जावेद अख्तर को दिया जाएगा।

असमय अस्त हुआ संगीत का रवि

Dr.JitendraPandey@Navpravah.com,

जिस प्रकार पूरब की लालिमा का आभास पाते ही पक्षी कलरव करने लगते हैं, मधुमास में फूलों की महक अनायास ही भौरों को आकर्षित करने लगती है, काले बादलों को देखकर मोर नाचने लगते हैं उसी प्रकार संगीत के आकाश में रवीन्द्र का उदय हुआ। परिणामतः अनेक संगीत के बहुतेरे बीज पुष्पित, पल्लवित और फलित हुए।

पंडित इन्द्रमणि जैन के सुपुत्र रवीन्द्र जैन बचपन से ही छंदों की रचना करने लगे थे। संगीत तो उनके पूर्वजों ने उन्हें विरासत में दे दिया था। अलीगढ़ के धूल की सोंधी महक बालक रवीन्द्र के तन, मन और आत्मा में समा गई थी। इस महक का झोंका अलीगढ़ से कोलकाता की तरफ बहा। कोलकाता उनकी साधना-स्थली बनी। बंगाल की मिट्टी की यह ख़ासियत भी रही है कि इसकी रज को शरीर में मलने वाला शोहरत के उच्च शिखर पर पहुंचा है। माँ काली के सानिध्य में श्री जैन ने संगीत के क्षेत्र में एक युगांतकारी कार्य का श्री गणेश किया।

19 सितम्बर, 1968 में रवीन्द्र जी सपनों की नगरी मुम्बई में आए। कवि रामरिख मनहर के साहचर्य ने उनके संघर्षपूर्ण मार्ग को आसान बना दिया।दादा के इस शुरूआती यात्रा में ताराचन्द जी बड़जात्या के सुपुत्र राजकुमार बड़जात्या का वरदहस्त हमेशा रहा। उनके पहले फ़िल्मी गीत का रिकॉर्डिंग 14 जनवरी,1975 में हुआ –

“ग़म भी है न मुकम्मल खुशियाँ भी हैं अधूरी।
आंसू भी आ रहे हैं हंसना भी ज़रूरी।”

इस ग़ज़ल को स्व.रफ़ी और रवीन्द्र जैन ने मिलकर गाया।एक दुनिया को उजाला देकर अस्ताचल की तरफ था तो दूसरा संगीत के क्षेत्र में क्रमशः लालिमा बिखेरने की तैयारी कर रहा था। मो.रफ़ी और दादू की संगति ऐतिहासिक रही।संगीत के इस कारवां में कई गायक पैदा हुए और जुड़े। रवीन्द्र की शीतल छाया में आरती मुखर्जी, हेमलता, जसपाल सिंह, सुरेश वाडकर जैसे सुप्रसिद्ध गायकों ने काफी शोहरत बटोरी। अनगिनत फिल्मों में अपना गीत और संगीत देकर इस फकीरा ने फ़िल्म उद्योग में एक नया कीर्तिमान रचा।

रवीन्द्र जैन 2 मार्च,1982 में दिव्या के साथ परिणय सूत्र में बंध गए। विवाहोपरांत दादू के कैरियर में जैसे पंख लग गए। दिव्या जैन ने इनके हर प्रोजेक्ट में हाथ बंटाकर जीवन को सरल,सुगम और दिव्य बना दिया।इस दिव्यता की कड़ी में छोटे पर्दे पर इतिहास रचने वाला रामानंद सागर का “रामायण”जुड़ गया। इसके माध्यम से जैन की भारी भरकम पहाड़ी आवाज़ जन-मन में बस गई। “मंगल भवन अमंगल हारी…”की गूंज कानों में पड़ते ही लोग टीवी की तरफ दौड़ पड़ते थे। बाद में “कृष्णा हरे मुरारे….” भी हिट हुआ। देशभक्ति के गीत पूरी दुनिया में सराहे गए।

रवीन्द्र जैन एक आशुकवि भी थे। मुशायरों और कवि सम्मेलनों में उनकी उपस्थिति भारी भीड़ का कारण बनती थी। दादा उच्च कोटि के भाषाविद् थे। उर्दू, बंगाली, संस्कृत, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, फ्रेंच आदि भाषाओँ पर उनका असाधारण अधिकार था। सुप्रसिद्ध गायक उदित नारायण ने उनके बारे में ठीक ही कहा था – ” अनेक भाषाओँ के विद्वान , अति गुणी और विलक्षण गीतकार एवं संगीतकार आदरणीय जैन की रचना जिसे गाने का सौभाग्य मिल जाय, वह अपने आप धन्य और सफल हो जाता है।”

अनेक आयामों से युक्त रवीन्द्र जैन वर्तमान गीत-संगीत के क्षेत्र में शलाका पुरुष थे। उनके गीतों में आध्यात्मिकता का आभास होता है। वे फ़िल्म और संगीत के लिए हमेशा पथ-प्रदर्शक बने रहेंगे। उनका असमय अस्त होना भारतीय मनीषा की क्षति है। वे हमेशा अपने गीतों में अमर रहेंगे।

दादरी काण्ड एक साज़िश, नहीं बक्शे जाएंगे दोषी – मुलायम सिंह यादव

AmitDwivedi@navpravah.com

 

 

दादरी कांड पर समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने आज अपनी चुप्पी तोड़ते हुए इस घटना को साज़िश करार दिया और कहा कि कुछ लोग राजनीतिक लाभ लेने के लिए प्रदेश का माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में जिन लोगों का हाथ है उन्हें सज़ा ज़रूर दिलाएंगे भले से उनकी सरकार खतरे में आ जाए।

यादव ने मुजफ्फरपुर दंगे का ज़िक्र करते हुए कहा कि जिस तरह 2013 के दंगे में साज़िश हुई थी, कुछ उसी तरह दादरी काण्ड को भी अंजाम दिया गया है। उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि प्रदेश में सौहार्द्र बना रहे इसका हर संभव प्रयत्न किया जाएगा।

तीन बड़े नेताओं के इशारे पर हुआ काण्ड-

सपा मुखिया ने कहा कि इस काण्ड में जिन तीन नेताओं का नाम सामने आया है, उसकी पुष्टि के लिए जांच जारी है। जैसे ही मामला स्पष्ट होता है सबका नाम सामने लाया जाएगा। यादव ने कहा कि इन्हीं तीनो नेताओं के इशारे पर माहौल को बिगाड़ने की कोशिश की गई है और लगातार जारी भी है।

मुलायम ने स्पष्ट किया कि दादरी काण्ड के दोषियों को कतई माफ़ नहीं किया जाएगा। अफवाह फैलाकर कुछ लोग माहौल खराब करना चाहते हैं। और उत्तर प्रदेश की छवि धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

बिकनी से कोई परहेज नहीं- आलिया भट्ट

Amit Dwivedi@Navpravah.Com

करण जोहर की रोमांटिक ड्रामा स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर फ़िल्म से अपने कॅरियर की शुरुआत करने वाली आलिया भट्ट ने कम समय में ही लोगों के दिलों में अपनी जगह बना ली है। फ़िल्म हाईवे, टू स्टेट्स और हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया के बाद अब आलिया भट्ट विकास बहल द्वारा निर्देशित फ़िल्म शानदार में नज़र आएंगी। प्रस्तुत है फ़िल्म शानदार के सिलसिले में उनसे हुई लंबी बातचीत के प्रमुख अंश-

प्रश्न- फ़िल्म शानदार के प्रोमोज़ काफी पसंद किए जा रहे हैं। आपको कैसा रिएक्शन मिल रहा है इंडस्ट्री और दोस्तों से?

आलिया- लोगों को बहुत अच्छा लग रहा है। काफी लोगों ने कहा कि हमने अभी तक शादियों और रोमांटिक फिल्में देखी हैं, लेकिन इस फ़िल्म के प्रोमोज़ देखकर लग रहा है कि इसमें ज़रूर कुछ डिफरेंट होगा। गाने को ही देख लीजिए,गुलाबो,शाम शानदार और नज़दीकियां सभी गाने अलग मूड के हैं। फ़िल्म में भी बहुत सारे सरप्राइज़ेज़ हैं।

प्रश्न- फ़िल्म में अपने कैरेक्टर के बारे में कुछ बताएँ।

आलिया- फ़िल्म के बारे में ज़्यादा तो नहीं बता सकती। हाँ, इसमें एक ऐसी लड़की की जर्नी दिखाई गई है जिसे इमसोन्या नामक बीमारी होती है। यह सच में एक तरह की बीमारी है जिसमे लोगों को रात में नींद नहीं आती। मेरी बहन शाहीन को भी ये बीमारी है। तो मुझे यह रोल प्ले करने में आसानी हुई।

प्रश्न- सबसे शानदार क्या है फ़िल्म में?

आलिया- ये एक फैमिली फ़िल्म है। इसको देखने के बाद आपको पता चलेगा कि कितनी शानदार चीज़ें हैं इस फ़िल्म में एन्जॉय करने के लिए। इस फ़िल्म में हर एज ग्रुप के लिए कुछ  कुछ है।

प्रश्न- कम उम्र में इतनी शोहरत मिल गई आपको। खुलेआम निकल कर मज़े करने की आज़ादी छिन गई, ऐसा लगता है?

आलिया- मुझे कोई दुःख नहीं है। मैं चार साल की उम्र से ही ये चाहती थी कि मैं एक्ट्रेस बनूँ। हाँ, थोड़ी सी लाइफ ज़रूर बदल गई है लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी फैन ने मुझे डिस्टर्ब कर दिया हो। मेरा मानना है कि यही उम्र है जमकर काम करने का। हमारे अंदर जितना उत्साह आज है, उससे ज़्यादा कल के दिन होना चाहिए। तभी हम बेहतर कर सकते हैं ज़िन्दगी में।

प्रश्न- बिकनी में दिखी हैं आप इस फ़िल्म में। कम्फर्टेबल हैं इस ड्रेस में? परिवार का कोई दबाव?

आलिया- इसके लिए बहुत काम करना पड़ा मुझे। लेकिन जब फ़िल्म के निर्देशक विकास बहल ने कहा कि अच्छी दिख रही हो तो सोचा करना ही पड़ेगा। अगर मैं किसी कपडे में अच्छे दिखूं तो मुझे पसंद है। दबाव बिलकुल नहीं है। मुझे लगता है कि मेरे पापा दुनिया के सबसे ज़्यादा लिबरल इंसान हैं।

प्रश्न- शाहिद कपूर काफी समय से इंडस्ट्री में हैं, उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

आलिया- शाहिद बहुत ही कमाल के कलाकार हैं और उतने ही अच्छे इंसान। एक पल के लिए भी ऐसा नहीं लगा कि मैं इतने अनुभवी कलाकार के साथ काम कर रही हूँ। बल्कि अक्सर वही शॉट देने के बाद फीडबैक लेते। मैं बड़ी सरप्राइज़ रहती थी कि शाहिद को मैं क्या बताउंगी। हमें एक-दूसरे के साथ काम करके बड़ा मज़ा आया।

प्रश्न- शाहिद उम्दा डांसर भी हैं, कैसे मैनेज किया आपने?

आलिया- मैं डरी हुई थी कि शाहिद के साथ डांस कैसे करूँगी। अपने डांस लेवल को शाहिद में करीब ला सकूँ इसलिए मैंने सुबह जल्दी उठकर डांस प्रैक्टिस शुरू कर दिया। एक दिन शाहिद का फोन आया कि क्या कर रही ही हो, तो मैंने बताया कि गुलाबो वाले गाने की प्रैक्टिस कर रही हूँ। शाहिद चौंक गया कि तुम छुप छुपकर प्रैक्टिस कर रही हो। सब चिल्लाए कि सुबह उठोगी तो फेस खराब हो जाएगा। नींद पूरी लो।

प्रश्न- जब आपका नाम किसी एक्टर से जोड़ा जाता है तो बुरा लगता है?

आलिया- मुझे ज़्यादा बुरा तब लगेगा जब लोग मेरे बारे में बात नहीं करेंगे। बात होते रहना ज़रूरी है। नहीं तो मुझे लगेगा कि कोई मेरे बारे में बात करना ही नहीं चाहता। ये ज़्यादा टेंशन वाली बात होगी।

प्रश्न- फ़िल्म शानदार में आपके किरदार की तरह जब आप को रात में नींद नहीं आती तो क्या करती हैं?

आलिया- मुझे नींद नहीं आती तो मैं बहुत स्ट्रेस हो जाती हूँ क्योंकि मुझे सोना बहुत पसंद है। जब नींद नहीं आती तो मैं या तो बुक पढ़ती हूँ या फ़िल्म देखती हूँ। कुछ देर में आँखे बंद होने लगती हैं।

Aalia Bhatt

आज़म पाकिस्तानी एजेंट..!!

Amit Dwivedi@Navpravah.Com

Amit Dwivediबीजेपी नेता साक्षी महाराज ने उत्तर प्रदेश के मंत्री आज़म खान के बयान पर हल्ला बोल दिया है। साक्षी महाराज ने कहा कि जैसे हमें जन्म देने वाली माँ है, वैसे ही हमारी भारत माँ और गौ माता। अगर कोई हमारी माँ का अपमान करेगा तो या तो मर जाएंगे या मार देंगे। उन्होंने अपने वक्तव्य में आज़म को पाकिस्तानी एजेंट करार दिया।

साक्षी महाराज ने कहा कि उत्तर में कितने लोग हिंसा सहन कर रहे हैं। उनके कभी ख़बर नहीं ली जाती। दादरी हादसे पर बस राजनीति की जा रही है। आज़म ख़ान घटनास्थल पर जाकर बस अपनी राजनीति को हवा दे रहे हैं।

दादरी मामले पर भाजपा नेता साक्षी महाराज आज़म पर जमकर बरसे। उन्होंने कहा कि आज़म खान पाकिस्तान से मिले हुए हैं। और पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जिस तरह पाकिस्‍तान यूएन में भारत की शिकायत करता है आज़म भी उसी की राह पर चलते हुए यूएन में हमारी शिकायत कर रहे हैं। साक्षी महाराज ने कहा कि आज़म कभी भारत माता को डायन बताते हैं, कभी अमित शाह को शैतान बताते हैं। मुझे लगता है कि आजम मनोरोगी हैं उन्हें आगरा या रांची में भर्ती करवा देना चाहिए।

10-11 अक्टूबर को ग्वालियर में होगा मीडिया चौपाल

Media Chaupal

ग्वालियर ब्यूरो@नवप्रवाह.कॉम,

ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में 10 और 11 अक्टूबर को द्विदिवसीय मीडिया चौपाल का आयोजन किया गया है। अटलबिहारी वाजपेयी हिंदी विवि और जीवाजी विश्वविद्यालय के सहयोग से होने वाले इस चौपाल में वर्धा हिंदी विवि, इंदौर विवि, इंक मीडिया संस्थान, लखनऊ विवि, खालसा कालेज (दिल्ली विवि), माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि, अटल बिहारी हिंदी विवि सहित जीवाजी विवि के विद्यार्थी और प्राध्यापक भाग लेंगे।

चौपाल में संचार के अध्येता, विद्यार्थी, अध्यापक के साथ ही पत्रकार, ब्लॉगर, सोशल मीडिया के संचारक, वेब संचालक और इलेक्ट्रानिक मीडिया के रिपोर्टर भी भागीदारी करेंगे। इसमें नदी और पानी के साथ-साथ मीडिया विशेषज्ञ भी होंगे। इस मीडिया चौपाल में विशेषज्ञ जहां अपने अनुभव साझा करेंगे वहीं संचार माध्यमों के अध्येता समाज की संचार अपेक्षाओं को अभिव्यक्त करेंगे।

इस राष्टीय मीडिया चौपाल में प्रो. बृज किशोर कुठियाला, प्रभात झा, उमाकान्त उमरांव, जयदीप कर्णिक,पंकज चतुर्वेदी, सुभद्रा राठौर, डा स्मिता मिश्रा, हितेश शंकर, गिरीश उपाध्याय, प्रो मोहनलाल छीपा, के जी व्यास, के.जी. सुरेश, डॉ. मनोज पटैरिया, राजकुमार भारद्वाज, प्रकाश हिन्दुस्तानी, आदि सम्मिलित हो रहे हैं।

प्रमुख प्रतिभागियों में उमेश चतुर्वेदी, अनिल पाण्डेय, अलका सिंह, डॉ. धीरेंद्रनाथ मिश्र, सीत मिश्र, केसर सिंह, शिवानंद द्विवेदी क़ायनात काजी, रितेश पाठक, ऋषभ कृष्ण सक्सेना, आशीष कुमार अंशु, बिकास कुमार, प्रवीण कुमार झा, केशव कुमार, अनुराग अन्वेषी, अमरनाथ, पूजा मेहरोत्रा, प्रिया शाह, प्रज्ञा, प्रणव सिरोही, हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्रवण शुक्ल, सिद्धार्थ झा और पवन रेखा आदि हैं।

यूपी में दबंगों ने लड़की को जिंदा जलाया, तमाशबीन बने रहे लोग !!

उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में लालगंज, अजहारा तहसील के श्रीपुर उमरपुर गांव में 25 सितंबर की शाम कुछ दबंगों ने शौच के लिए गई अकेली और निहत्थी 19 साल की ज्योति विश्वकर्मा पर हमला कर उस पर मिट्टी का तेल डालकर उसे जिन्दा जला दिया। क़रीब 90 फ़ीसदी जलाई गई वह लड़की आठ दिन तक इलाहाबाद के स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल में मौत से लड़ती रही, लेकिन शनिवार (तीन अक्टूबर) को तड़के ढाई बजे उसने काल के सामने हथियार डाल दिए। उसका जिस्म ठंडा हो गया और उसके सपने को भी मौत निगल गई। ज्योति ने मरने से पहले अपने दिए गए बयान में इस कुकृत्य में शामिल सभी चार आरोपियों का नाम लिया।

ज्योति विश्वकर्मा एक सपने देखने वाली लड़की थी। देहात और ग़रीब परिवार की लड़की करियर बनाने के लिए कृतसंकल्प थी। वह पढ़-लिखकर किसी स्कूल या विद्यालय में टीचर बनना चाहती थी, ताकि समाज की निरक्षरता दूर करने में ज़्यादा तो नहीं थोड़ी-बहुत मदद कर सके। इसलिए वह बीए की पढ़ाई कर रही थी। लेकिन शायद प्रकृति को यह भी मंज़ूर नहीं था। उसे इलाज के लिए बड़े शहरों के अस्पताल में ले जाया जाता तो शायद उसका जीवन बचाया जा सकता था, परंतु ऐसा नहीं हुआ। उसने आखिर दम तोड़ दिया।

दरअसल, यह घटना उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में लालगंज अजहारा तहसील के श्रीपुर उमरपुर गांव में 25 सितंबर की शाम पांच बजे हुई। उस समय सूर्यास्त होने में क़रीब घंटे भर बाक़ी था। हैवानियत पर उतरे पड़ोसियों ने घर के पीछे शौच के लिए गई अकेली और निहत्थी 19 साल की ज्योति विश्वकर्मा पर हमला कर दिया। उस पर मिट्टी का तेल डालकर उसके जिस्म में आग लगा दी, जिससे ज्योति धू-धू करके जलने लगी। पास-पड़ोस का कोई व्यक्ति रक्षा करने के लिए भी नहीं आया। असहाय ज्योति का जिस्म जलता रहा, वह चिल्लाती रही लेकिन सब तमाशाबीन बने थे। आसपास खड़े थे, लेकिन उसे बचाने या उसके जलते शरीर पर कंबल डालने कोई नहीं आया। अंततः जलती हुई ज्योति ने ख़ुद बचने का प्रयास किया और अपने घर में भागी, जहां उसकी मां मालती विश्वकर्मा शाम को परिवार के छह लोगों के लिए खाना बना रही थी।

जब जलती हुई ज्योति घर के अंदर घुसी तो मां और तीन बहनें घबरा गईं कि ज्योति के साथ यह क्या हो गया? सबने कंबल डालकर आग बुझाया लेकिन ज्योति पूरी तरह जल चुकी थी। बहरहाल, दो किलोमीट दूर रहने वाले लड़की के बड़े पिता को बुलाया गया, क्योंकि ज्योति के पिता सउदी अरब में कारपेंटरी के दिहाड़ी मज़दूर हैं। परिजन आनन-फानन ज्योति को लेकर प्रतापगढ़ जिला अस्पताल गए, लेकिन वहां उसे फौरन इलाहाबाद ले जाने की सलाह दी गई। इलाहाबाद में सरकारी अस्पताल में ले गए, जहां डॉक्टर हड़ताल पर थे। मजबूरी में घर वाले उसे सिविल लाइंस के एक निजी अस्पताल ले गए।

बीरेंद्र अस्पताल में ज्योति का इलाज शुरू हुआ। बाद में मामला उनसे भी नहीं संभला तो उसे इलाहाबाद के स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल में भेज दिया गया। चहरे को छोड़कर ज्योति का बाक़ी सारा जिस्म जल चुका था। जब ज्योति के रिश्तेदार घटना की रिपोर्ट लिखवाने घर से दो किलोमीटर दूर जेठवारा पुलिस स्टेशन गए तो, जैसा कि आरोप है, थानाध्यक्ष चंद्रबली यादव ने उन्हें गाली देकर भगा दिया। जलाने की वारदात रिपोर्ट दबाव बनाने के बाद 26 सितंबर की शाम दर्ज की जा सकी। जब सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 27 सितंबर को कार्रवाई करने का आदेश दिया तब पुलिस ने मुख्य आरोपी ओमप्रकाश मौर्या समेत सभी चारों आरोपियों को गिरफ़्तार किया।

देश के दूर-दराज के इलाक़ों में होने वाली बर्बर घटना पर भी पुलिस और प्रशासन का क्यो रवैया होता है, यह इस घटना से साबित हो गया। कोई घटना दिल्ली या मुंबई में होती है तो मीडिया और आम जनता में उबाल आ जाता है। ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगती है लेकिन देहातों में होने वाली घटनाओं की कोई नोटिस भी नहीं लेता। कुछ साल पहले दिल्ली के गैंगरेप की पीड़ित लड़की को बचाने के लिए सिंगापुर तक ले जाया गया लेकिन ज्योति विश्वकर्मा को बुनियादी मेडिकल फैसिलिटीज़ बमुश्किल मयस्सर हो पाई। आठ दिन तक ज़िंदा रही ज्योति मजिस्ट्रेट को बयान दिए बयान में सभी चारों आरोपियों का नाम लिया है। उसे इलाज के लिए बड़े शहरों के अस्पताल में ले जाया जाता तो शायद उसका जीवन बचाया जा सकता था, परंतु ऐसा नहीं हुआ।

दरअसल, ज्योति उस समाज की थी जो आज़ादी के सात दशक बाद आज भी प्रजा मानी जाती है और इस समाज के इक्का दुक्का लोग ही गांवों में पाए जाते हैं। मौर्य बाहुल्य श्रीपुर गांव में ज्योति का परिवार इकलौता विश्वकर्मा परिवार है। माता-पिता और चार बेटियों वाले परिवार में ज्योति की सबसे बड़ी थी। बाक़ी तीन बहने 14, 10 और सात साल की हैं। उसके पिता राजेंद्र विश्वकर्मा कारपेंटरी का काम करते हैं और इस समय सउदी अरब में दिहाड़ी मज़दूरी कर रहे हैं। आने जाने का किराया न होने और सउदी सरकार द्वारा इजाज़त न देने के कारण वह बड़ी बेटी तो देखने भी नहीं आ सके।

ज्योति के रिश्तेदार संजय कुमार विश्वकर्मा के मुताबिक़ टीचर बनने का सपना पाले ज्योति पास के बाबा सर्वजीत गिरी महाविद्यालय सरायभूपत कटरा गुलाब सिंह प्रतापगढ़ में बैचलर ऑफ़ आर्ट (बी.ए.) के अंतिम साल में पढ़ रही थी। संजय ने बताया कि ज्योति के परिवार का दो बीघा खेत है। उस खेत पर पड़ोस में रहने वाले ओमप्रकाश मोर्या की नज़र थी। उसने दो महीने पहले ज्योति के खेत में ज़बरदस्ती दीवार खड़ी बना ली थी। इस ज़ोर-जबरदस्ती का ज्योति की मां मालती विरोध करती थी। परिवार को सबक सिखाने के लिए ज्योति की हत्या की गई। उधर ज्योति मौवन मौत के बीच झूल रही थी, इधर आरोपी पुलिस के साथ मिलकर केस वापस लेने के लिए ज्योति के परिजनों पर दबाव बना रहे थे और केस वापस न लेने पर बाक़ी लोगों की हत्या की धमकी दे रहे थे।

ज्योति की मौत से निराश और पस्त संजय कुमार कहते हैं, “कभी-कभी लगता ही नहीं, बल्कि यह साबित भी हो जाता है कि यह देश, यहां का लोकतंत्र और यहां संविधान सब कुछ चंद लोगों के लिए ही है। आज़ादी के बाद जिन्हें मौक़ा मिला उन्होंने अपना ही विकास किया। बाक़ी लोगों की खोज-ख़बर लेने वाला कोई नहीं। ज्योति को बेहतर मेडिकेयर मिलता तो उसकी जान बच सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। काश ऐसा हो पाता।” जो भी हो ज्योति को जिंदा जलाए जाने की घटना के चलते उत्तर प्रदेश एक बार फिर शर्मसार हुआ है।

साभार:
हरिगोविंद विश्वकर्मा
सदस्य, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी

मोज़ेज़ सिंह की ‘ज़ुबान’ का स्वागत!

Shikha Pandey@navpravah.com

निर्देशक मोज़ेज़ सिंह की म्यूज़िकल ड्रामा फिल्म ‘ज़ुबान’ कोरिआ के बुसान फ़िल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की जाएगी। फ़िल्म में विकी कौशल अहम भूमिका में नज़र आएंगे।

इस फेस्टिवल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी भारतीय फ़िल्म से फेस्टिवल की ओपनिंग होगी। बुसान एशिया का सबसे बड़ा फ़िल्म फेस्टिवल माना जाता है।

इस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेहद अहम भूमिका निभाने वाले निर्माता गुनीत मांगा की मसान, लंच बॉक्स, गैंग्स ऑफ़ वासेपुर जैसी फिल्म इस फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा रह चुकी हैं।