ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में 10 और 11 अक्टूबर को द्विदिवसीय मीडिया चौपाल का आयोजन किया गया है। अटलबिहारी वाजपेयी हिंदी विवि और जीवाजी विश्वविद्यालय के सहयोग से होने वाले इस चौपाल में वर्धा हिंदी विवि, इंदौर विवि, इंक मीडिया संस्थान, लखनऊ विवि, खालसा कालेज (दिल्ली विवि), माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि, अटल बिहारी हिंदी विवि सहित जीवाजी विवि के विद्यार्थी और प्राध्यापक भाग लेंगे।
चौपाल में संचार के अध्येता, विद्यार्थी, अध्यापक के साथ ही पत्रकार, ब्लॉगर, सोशल मीडिया के संचारक, वेब संचालक और इलेक्ट्रानिक मीडिया के रिपोर्टर भी भागीदारी करेंगे। इसमें नदी और पानी के साथ-साथ मीडिया विशेषज्ञ भी होंगे। इस मीडिया चौपाल में विशेषज्ञ जहां अपने अनुभव साझा करेंगे वहीं संचार माध्यमों के अध्येता समाज की संचार अपेक्षाओं को अभिव्यक्त करेंगे।
इस राष्टीय मीडिया चौपाल में प्रो. बृज किशोर कुठियाला, प्रभात झा, उमाकान्त उमरांव, जयदीप कर्णिक,पंकज चतुर्वेदी, सुभद्रा राठौर, डा स्मिता मिश्रा, हितेश शंकर, गिरीश उपाध्याय, प्रो मोहनलाल छीपा, के जी व्यास, के.जी. सुरेश, डॉ. मनोज पटैरिया, राजकुमार भारद्वाज, प्रकाश हिन्दुस्तानी, आदि सम्मिलित हो रहे हैं।
प्रमुख प्रतिभागियों में उमेश चतुर्वेदी, अनिल पाण्डेय, अलका सिंह, डॉ. धीरेंद्रनाथ मिश्र, सीत मिश्र, केसर सिंह, शिवानंद द्विवेदी क़ायनात काजी, रितेश पाठक, ऋषभ कृष्ण सक्सेना, आशीष कुमार अंशु, बिकास कुमार, प्रवीण कुमार झा, केशव कुमार, अनुराग अन्वेषी, अमरनाथ, पूजा मेहरोत्रा, प्रिया शाह, प्रज्ञा, प्रणव सिरोही, हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्रवण शुक्ल, सिद्धार्थ झा और पवन रेखा आदि हैं।
उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में लालगंज, अजहारा तहसील के श्रीपुर उमरपुर गांव में 25 सितंबर की शाम कुछ दबंगों ने शौच के लिए गई अकेली और निहत्थी 19 साल की ज्योति विश्वकर्मा पर हमला कर उस पर मिट्टी का तेल डालकर उसे जिन्दा जला दिया। क़रीब 90 फ़ीसदी जलाई गई वह लड़की आठ दिन तक इलाहाबाद के स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल में मौत से लड़ती रही, लेकिन शनिवार (तीन अक्टूबर) को तड़के ढाई बजे उसने काल के सामने हथियार डाल दिए। उसका जिस्म ठंडा हो गया और उसके सपने को भी मौत निगल गई। ज्योति ने मरने से पहले अपने दिए गए बयान में इस कुकृत्य में शामिल सभी चार आरोपियों का नाम लिया।
ज्योति विश्वकर्मा एक सपने देखने वाली लड़की थी। देहात और ग़रीब परिवार की लड़की करियर बनाने के लिए कृतसंकल्प थी। वह पढ़-लिखकर किसी स्कूल या विद्यालय में टीचर बनना चाहती थी, ताकि समाज की निरक्षरता दूर करने में ज़्यादा तो नहीं थोड़ी-बहुत मदद कर सके। इसलिए वह बीए की पढ़ाई कर रही थी। लेकिन शायद प्रकृति को यह भी मंज़ूर नहीं था। उसे इलाज के लिए बड़े शहरों के अस्पताल में ले जाया जाता तो शायद उसका जीवन बचाया जा सकता था, परंतु ऐसा नहीं हुआ। उसने आखिर दम तोड़ दिया।
दरअसल, यह घटना उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में लालगंज अजहारा तहसील के श्रीपुर उमरपुर गांव में 25 सितंबर की शाम पांच बजे हुई। उस समय सूर्यास्त होने में क़रीब घंटे भर बाक़ी था। हैवानियत पर उतरे पड़ोसियों ने घर के पीछे शौच के लिए गई अकेली और निहत्थी 19 साल की ज्योति विश्वकर्मा पर हमला कर दिया। उस पर मिट्टी का तेल डालकर उसके जिस्म में आग लगा दी, जिससे ज्योति धू-धू करके जलने लगी। पास-पड़ोस का कोई व्यक्ति रक्षा करने के लिए भी नहीं आया। असहाय ज्योति का जिस्म जलता रहा, वह चिल्लाती रही लेकिन सब तमाशाबीन बने थे। आसपास खड़े थे, लेकिन उसे बचाने या उसके जलते शरीर पर कंबल डालने कोई नहीं आया। अंततः जलती हुई ज्योति ने ख़ुद बचने का प्रयास किया और अपने घर में भागी, जहां उसकी मां मालती विश्वकर्मा शाम को परिवार के छह लोगों के लिए खाना बना रही थी।
जब जलती हुई ज्योति घर के अंदर घुसी तो मां और तीन बहनें घबरा गईं कि ज्योति के साथ यह क्या हो गया? सबने कंबल डालकर आग बुझाया लेकिन ज्योति पूरी तरह जल चुकी थी। बहरहाल, दो किलोमीट दूर रहने वाले लड़की के बड़े पिता को बुलाया गया, क्योंकि ज्योति के पिता सउदी अरब में कारपेंटरी के दिहाड़ी मज़दूर हैं। परिजन आनन-फानन ज्योति को लेकर प्रतापगढ़ जिला अस्पताल गए, लेकिन वहां उसे फौरन इलाहाबाद ले जाने की सलाह दी गई। इलाहाबाद में सरकारी अस्पताल में ले गए, जहां डॉक्टर हड़ताल पर थे। मजबूरी में घर वाले उसे सिविल लाइंस के एक निजी अस्पताल ले गए।
बीरेंद्र अस्पताल में ज्योति का इलाज शुरू हुआ। बाद में मामला उनसे भी नहीं संभला तो उसे इलाहाबाद के स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल में भेज दिया गया। चहरे को छोड़कर ज्योति का बाक़ी सारा जिस्म जल चुका था। जब ज्योति के रिश्तेदार घटना की रिपोर्ट लिखवाने घर से दो किलोमीटर दूर जेठवारा पुलिस स्टेशन गए तो, जैसा कि आरोप है, थानाध्यक्ष चंद्रबली यादव ने उन्हें गाली देकर भगा दिया। जलाने की वारदात रिपोर्ट दबाव बनाने के बाद 26 सितंबर की शाम दर्ज की जा सकी। जब सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 27 सितंबर को कार्रवाई करने का आदेश दिया तब पुलिस ने मुख्य आरोपी ओमप्रकाश मौर्या समेत सभी चारों आरोपियों को गिरफ़्तार किया।
देश के दूर-दराज के इलाक़ों में होने वाली बर्बर घटना पर भी पुलिस और प्रशासन का क्यो रवैया होता है, यह इस घटना से साबित हो गया। कोई घटना दिल्ली या मुंबई में होती है तो मीडिया और आम जनता में उबाल आ जाता है। ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगती है लेकिन देहातों में होने वाली घटनाओं की कोई नोटिस भी नहीं लेता। कुछ साल पहले दिल्ली के गैंगरेप की पीड़ित लड़की को बचाने के लिए सिंगापुर तक ले जाया गया लेकिन ज्योति विश्वकर्मा को बुनियादी मेडिकल फैसिलिटीज़ बमुश्किल मयस्सर हो पाई। आठ दिन तक ज़िंदा रही ज्योति मजिस्ट्रेट को बयान दिए बयान में सभी चारों आरोपियों का नाम लिया है। उसे इलाज के लिए बड़े शहरों के अस्पताल में ले जाया जाता तो शायद उसका जीवन बचाया जा सकता था, परंतु ऐसा नहीं हुआ।
दरअसल, ज्योति उस समाज की थी जो आज़ादी के सात दशक बाद आज भी प्रजा मानी जाती है और इस समाज के इक्का दुक्का लोग ही गांवों में पाए जाते हैं। मौर्य बाहुल्य श्रीपुर गांव में ज्योति का परिवार इकलौता विश्वकर्मा परिवार है। माता-पिता और चार बेटियों वाले परिवार में ज्योति की सबसे बड़ी थी। बाक़ी तीन बहने 14, 10 और सात साल की हैं। उसके पिता राजेंद्र विश्वकर्मा कारपेंटरी का काम करते हैं और इस समय सउदी अरब में दिहाड़ी मज़दूरी कर रहे हैं। आने जाने का किराया न होने और सउदी सरकार द्वारा इजाज़त न देने के कारण वह बड़ी बेटी तो देखने भी नहीं आ सके।
ज्योति के रिश्तेदार संजय कुमार विश्वकर्मा के मुताबिक़ टीचर बनने का सपना पाले ज्योति पास के बाबा सर्वजीत गिरी महाविद्यालय सरायभूपत कटरा गुलाब सिंह प्रतापगढ़ में बैचलर ऑफ़ आर्ट (बी.ए.) के अंतिम साल में पढ़ रही थी। संजय ने बताया कि ज्योति के परिवार का दो बीघा खेत है। उस खेत पर पड़ोस में रहने वाले ओमप्रकाश मोर्या की नज़र थी। उसने दो महीने पहले ज्योति के खेत में ज़बरदस्ती दीवार खड़ी बना ली थी। इस ज़ोर-जबरदस्ती का ज्योति की मां मालती विरोध करती थी। परिवार को सबक सिखाने के लिए ज्योति की हत्या की गई। उधर ज्योति मौवन मौत के बीच झूल रही थी, इधर आरोपी पुलिस के साथ मिलकर केस वापस लेने के लिए ज्योति के परिजनों पर दबाव बना रहे थे और केस वापस न लेने पर बाक़ी लोगों की हत्या की धमकी दे रहे थे।
ज्योति की मौत से निराश और पस्त संजय कुमार कहते हैं, “कभी-कभी लगता ही नहीं, बल्कि यह साबित भी हो जाता है कि यह देश, यहां का लोकतंत्र और यहां संविधान सब कुछ चंद लोगों के लिए ही है। आज़ादी के बाद जिन्हें मौक़ा मिला उन्होंने अपना ही विकास किया। बाक़ी लोगों की खोज-ख़बर लेने वाला कोई नहीं। ज्योति को बेहतर मेडिकेयर मिलता तो उसकी जान बच सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। काश ऐसा हो पाता।” जो भी हो ज्योति को जिंदा जलाए जाने की घटना के चलते उत्तर प्रदेश एक बार फिर शर्मसार हुआ है।
साभार: हरिगोविंद विश्वकर्मा सदस्य, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी
निर्देशक मोज़ेज़ सिंह की म्यूज़िकल ड्रामा फिल्म ‘ज़ुबान’ कोरिआ के बुसान फ़िल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की जाएगी। फ़िल्म में विकी कौशल अहम भूमिका में नज़र आएंगे।
इस फेस्टिवल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी भारतीय फ़िल्म से फेस्टिवल की ओपनिंग होगी। बुसान एशिया का सबसे बड़ा फ़िल्म फेस्टिवल माना जाता है।
इस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेहद अहम भूमिका निभाने वाले निर्माता गुनीत मांगा की मसान, लंच बॉक्स, गैंग्स ऑफ़ वासेपुर जैसी फिल्म इस फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा रह चुकी हैं।
जम्मू कश्मीर विधानसभा में आज सदन की कार्यवाही शुरू होते ही बीफ बैन को लेकर बीजेपी विधायक और एक निर्दलीय विधायक के बीच हाथापाई हो गई। विधायकों में हुए आपसी विवाद के चलते सदन की कार्रवाई 15 मिनट के लिए स्थगित करनी पड़ी।
बीफ बैन मामले पर मौक़ा मिलते ही कांग्रेस ने भी जमकर हंगामा मचाया।
विधायक इंजीनियर रशीद (निर्दलीय) और भारतीय जनता पार्टी के विधायकों के बीच बीफ बैन को लेकर हाथापाई हुई। नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के नेताओं ने ने बीफ बैन का मुद्दा उठाया और इसका विरोध किया।
हालाँकि जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने भी बीफ बैन का आदेश दिया है। जिसके बावजूद राजनेता इसे एक विवादित मुद्दा बनाए हुए हैं। इस मामले में राज्य सरकार ने दो वरिष्ठ कानून अधिकारियों को बर्खास्त भी कर दिया था। बीफ बैन पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई होगी।
सदन में बीफ बैन के अलावा सदन में कांग्रेस विधायकों ने पिछले साल आई बाढ़ से प्रभावितों को उचित मुआवजा और सुविधाएं मुहैया न किए जाने को लेकर भी हंगामा किया।
विपक्षी नेताओं ने हेलीकॉप्टर के जरिए वैष्णो देवी यात्रा पर सर्विस टैक्स लगाए जाने पर भी नाराजगी जताई। सोमवार को सदन की कार्यवाही शुरू होने के कुछ समय बाद से ही हंगामा शुरू हो गया। जिसे शांत शांत करने के लिए सदन को कुछ समय के लिए रोकना पड़ा।
अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा ने अपनी उम्दा कलाकारी की बदौलत फ़िल्म इंडस्ट्री में एक अहम जगह बनाई है। निजी ज़िन्दगी में खुशमिजाज़ कोंकणा ने अपने गंभीर अभिनय का लोहा मनवाया है। २००८ के आरुषि मर्डर केस पर आधारित फिल्म ‘तलवार’ सिनेमाघरों में आ चुकी है। नवप्रवाह.कॉम से उन्होंने इस फिल्म व उसमें अपने किरदार के विषय में काफी दिलचस्प बातें बताई हैं। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
प्रश्न: फिल्म में आपका अपने किरदार की ओर कैसा दृष्टिकोण रहा ?
कोंकणा: इस फिल्म में, हमने वास्तव में अपने कैरेक्टर को लेकर ज़्यादा अध्ययन नहीं किया है। जब भी हमें कोई रोल मिलता है, हमें उसका कुछ इतिहास या भूमिका बताई जाती है। फिल्म में इस केस की जांच पड़ताल के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया है। तीन बार की गई जांच में से दो बार के निष्कर्ष में तलवार दंपति को दोषी पाया गया। हमें यही चीजें विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल कर के कुछ अलग ढंग से प्रस्तुत करनी थी। विशाल जी ने स्क्रिप्ट बहुत बढ़िया लिखी है और मैंने मात्र उस स्क्रिप्ट का अनुसरण किया है।
प्रश्न:फिल्म का विवादास्पद प्रारूप देखकर क्या आपके दिमाग में कोई संशय चल रहा था ?
कोंकणा: इरफान खान,विशालजी, गुलजार साहब और मेघना जी एक साथ काम कर रहे थे। इसीलिए मुझे पूरा विश्वास था कि फिल्म सुरक्षित हाथों में है। इन सभी लोगों को विषय की भावुकता व संवेदनशीलता की बहुत अच्छी समझ है। इन लोगों ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है, इसलिए मैं इस विषय में बिलकुल निश्चिंत थी ।
प्रश्न: इरफान खान व नीरज क़बी के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
कोंकणा: इरफान के साथ काम करने का अनुभव बहुत अच्छा था क्योंकि वो इतने बेहतरीन कलाकार हैं कि कोई भी उनके साथ अच्छी तरह काम कर सकता है। मुझे उनके साथ काम करने में बहुत मज़ा आया। मेरे अधिकतर दृश्य नीरज के साथ हैं। उनके साथ भी काम करने में बहुत मजा आया। आशा है कि वो भविष्य में भी ऐसी ही बेहतरीन फिल्मों के साथ आगे आएँगे।
प्रश्न: क्या इस फिल्म के लिए आप तलवार दंपति से मिलीं?
कोंकणा: नहीं, मैं उनसे नहीं मिली क्योंकि यह फिल्म कोई जीवनी नहीं है। फिल्म का मुख्य उद्देश्य इस केस में हुई जांच की तीनों धाराओं को दर्शाना है, तलवार दंपति को दर्शाना नहीं।
प्रश्न:किस बात ने आपको इस किरदार की ओर आकर्षित किया?
कोंकणा: यह किरदार कोई साधारण किरदार नहीं है। यह एक बहुत ही अलग तरह का किरदार है। जांच के आधार पर इसे तीन अलग अलग तरीकों से चित्रित करना है। इसी बात ने मुझे इस फिल्म व इस किरदार की ओर आकर्षित किया।
प्रश्न:क्या आपको लगता है कि ऐसे मामलों में निर्णय मिलने में समय लगता है?
कोंकणा: ऐसे मामलों की जांच में सही सबूतों, दस्तावेजों की आवश्यकता होती है। इस केस में सही गुनहगार को खोजना बहुत मुश्किल था। जल्दबाजी में न्याय पर आँच नहीं आनी चाहिए।
प्रश्न: क्या आपको लगता है कि इस फिल्म से दर्शकों को इस केस की सही जानकारी मिलेगी?
कोंकणा: फिल्म का उद्देश्य इस केस की गुत्थी सुलझाना नहीं है, बल्कि जांच के विभिन्न पहलुओं को दर्शाना है। अब हम समय के साथ पीछे जाकर उस कमरे को सील कर और जांच कर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते।
‘सेल्फ़ी’ सुनते ही मानो चंद ख़ुशनुमां-सी तस्वीरें आंख़ों के सामने आ जाती हैं। अमूमन हर कोई ‘सेल्फ़ी’ खींचता है और अपनी पसंदीदा ‘सेल्फ़ी’ को अपनी यादों में संजोए रखना चाहता है। कुछ इसी तर्ज़ पर टेलीविजन के परदे पर ‘सेल्फ़ी’ के नए मायने लेकर आ रहा है एबीपी न्यूज़।
सितारों की यादों और बातों की ऐसी तस्वीरें, जिन्हें आप अपने ज़हन में संजोए रखना चाहेंगे हमेशा-हमेशा के लिए।
आप सभी ने सितारों के फ़िल्मी सफ़र की दास्तानें तो कई बार सुनी होंगी। एक स्टार ने कहां से शुरुआत की और वो कामयाबी के किस मुक़ाम पर पहुंच गया, कैसे एक अनजाना चेहरा आसमान का चमकता सितारा बन गया वग़ैरह। आमतौर पर सितारों की ज़िंदगी और फ़िल्मी करियर की ऐसी कहानियां हर कहीं दिखाई और सुनाई देती हैं, मगर एबीपी न्यूज़ ‘सेल्फ़ी’ के ज़रिए बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारों के फ़िल्मी करियर का सफ़रनामा नहीं दिखाएगा, बल्कि उनकी ज़िंदगी के कई ख़ास पलों से सभी को रू-ब-रू कराएगा।
“क्या आपने कभी सुना था कि फ़िल्मों में ब्रेक की चाहत लिए एक बी-ग्रेड प्रोड्यूसर के ऑफ़िस पहुंचे सलमान ख़ान को उस प्रोड्यूसर ने चपरासी को बुलाकार ऑफ़िस से बाहर निकलवा दिया था ?”
‘सेल्फ़ी’ में बॉलीवुड के आपके फेवरिट स्टार्स अपने संघर्ष की घिसी-पिटी कहानियां नहीं, बल्कि उस पहले ब्रेक के बारे में बताएंगे, जिसने आज उन्हें वो मुक़ाम दिलाया, जिसके बारे में कभी ख़ुद उन्होंने भी सोचा नहीं होगा। फ़िल्मी पर्दे पर ‘लार्जर दैन लाइफ़’ क़िरदार निभाने वाले इन सितारों को पहला ब्रेक कैसे मिला ? ब्रेक मिलने से पहले सितारों ने किस-किस का दरवाज़ा खटखटाया ? मुलाक़ातों के सिलसिले के दौरान क्या कुछ झेला? पहला ब्रेक मिलने से पहले कैसी थी इन सितारों की ज़िंदगी ? ऐसे तमाम सवालों, बातों और हालातों पर रोशनी डालेंगे ख़ुद आपके पसंदीदा स्टार्स।
अलसुबह बारिश की बूंदा-बांदी ने सरयू-तट को गीला कर दिया था।असावधानी से चलने के कारण कई श्रद्धालु फिसल-फिसल कर गिर रहे थे। सधे हुए कदमों से भी आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा था।किसी प्रकार नदी में प्रवेश किया।पानी का बहाव इतना कि पैर एक जगह टिकते ही नहीं। कमर तक पानी में डुबकी लगाकर बाहर निकल आया। ठंडी हवाओं ने बदन में कंपकंपी – सी पैदा कर दी।सतत प्रवाहमान सरयू जी के लिए अंतःकरण से सदिच्छाएं फूटने लगीं।सरस सलिला का सौम्य विस्तार देखकर गोस्वामी तुलसीदास की पंक्ति अनायास जिह्वा पर आ गई- “उत्तर दिसि सरयू बह पावन”।
सरयू जी को प्रणाम करके अयोध्या की तरफ अभिमुख हुआ। मन में रामलला के बचपन का बिम्ब उभरने लगा। घुटनों के बल चलते चारों भाई , पैजनियों की रुन-झुन , माताओं का अगाध स्नेह , चौथेपन में राजा दशरथ का पुत्र-मोह आदि चित्रवत मानसपटल पर फिरने लगा।रामचरितमानस की पूरी कथा असम्बद्ध रूप से स्मरण हो आई।
स्नानादि के बाद राम की पैड़ी से होते हुए हम हनुमानगढ़ी की ओर बढ़ने लगे।सहयात्री अपने ही थे। यशवंत जी ने बताया -“पाण्डेयजी,आप हर जगह घरों में एक छोटा-सा मंदिर पाएंगे लेकिन अयोध्या में आपको मंदिरों में घर मिलेंगे।यहां के महंत ? बाप रे बाप ! किसी राजे-महाराजे से कम नहीं। छप्पन व्यंजनों का छककर भोग लगाते हैं। बिल्कुल वीआईपी कल्चर। बिना पूर्व अनुमति के आप उनका दर्शन नहीं कर सकते।चौबीसों घंटे सीसीटीवी की निगरानी।” कार की स्टेयरिंग को तेजी से घुमाते हुए संतोष सिंह ने चुटकी ली – कहिए ज़नाब , गाड़ी हनुमानगढ़ी के बजाय अखाड़ों की तरफ मोडूं?” “न न संतोष जी , महंत-दर्शन फिर कभी।फ़िलहाल हनुमंतलाल का दर्शन कराइए।”अखाड़ों को देखने की प्रबल इच्छा को दबाते हुए मैंने निवेदन किया। मंदिरों में दर्शन की प्रक्रिया आरम्भ हुई। चंद चढ़ावे की कीमत पर दुनिया के सारे सुखों को बटोर लेने की प्रार्थना में सभी तल्लीन हो गए।
मंदिर-दर-मंदिर मत्था टेकते , मनौती करते, कुछ बुदबुदाते और आगे बढ़ जाते। कदम-कदम पर क्षण-विशेष को कैमरे में कैद करने की ज़द्दोज़हद मेरी कमजोरी है। हनुमानगढ़ी में क्लिक करते समय पता चला कि संतों की सशस्त्र सेना यहीं रहती है। बताया गया जब भी अयोध्या पर आक्रमण हुए संत-सेना नने वीरता से मुकाबला किया।
अयोध्या की गलियों में चलते हुए भारतीय संस्कृति की अक्षुण्य विरासत यत्र-तत्र बिखरी मिली।कहीं प्रभावशाली उपस्थिति के साथ तो कहीं ‘कुछ शेष चिह्न हैं केवल , मेरे उस महामिलन’ के रूप में। अपनी परत-दर-परत में अयोध्या की धरती ने आर्यों के वैभवशाली इतिहास को बड़ी सावधानी से छिपा रखा है।इतिहास का वृहत् कालखंड सर्वत्र करवट-सा लेता प्रतीत हुआ।
अयोध्या में बंदरों का आतंक सर्वविदित है।उनकी नज़र भक्तों के हाथों से लटकती हुई थैलियों पर बनी रहती है।झपट्टा मारते और पलक झपकते ही प्रसाद की थैली उनके हाथ में।हमें भी उनके आतंक का शिकार होना पड़ा।प्रसाद-मोह छोड़ हम रामजन्म भूमि की ओर बढ़ चले।चाक-चौबंद सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी अपनी मर्ज़ी से पंख न फड़फड़ा सके।सुरक्षा घेरों में प्रवेश करने से पहले
मोबाइल,पर्स,कैमरा,बेल्ट,कंघी आदि सिक्योरिटी में जमा करना पड़ा।कमांडों के अलग-अलग दस्ते सभी चौकियों पर तैनात थे।सघन जाँच का सिलसिला शुरू हुआ।तीन फीट चौड़े और आठ फीट ऊँचे लौह-जाल से होकर एक किलोमीटर से अधिक की यात्रा करनी थी।हर मोड़ पर जाँच।सुरक्षा का इतना पुख्ता इंतजाम मन को कचोटने लगा।एक ऐसे महापुरुष के जन्मस्थली को विवादास्पद बनाना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है जिसने सभी आदर्शों को जिया।वह एक संप्रदाय विशेष से कैसे हो सकता है ? ‘निर्मल-मन’ की शर्त रखने वाले प्रभु राम की जन्मभूमि तो सांस्कृतिक धरोहर के रूप में समस्त देशवासियों को स्वीकार करनी चाहिए।भारत की समृद्ध परम्परा की खूबसूरती की विकृति देखकर मन बोझिल हो गया।
मानवता के पोषक रामलला को तिरपाल के नीचे पाकर भारतीय राजनीति का स्याह चेहरा भी सामने आया। इंसान को मज़हबों में बांटकर उनमें घृणा और अविश्वास पैदा करना सत्ता-सुख के लिए अनिवार्य शर्त-सी बनती जा रही है।सही है-” राजनीति देवकन्या नहीं बल्कि विषकन्या की आत्मजा है।”मर्यादापुरुषोत्तम सहित राम दरबार के सामने हाथ जुड़े और नेत्र सजल हो आए।तभी भक्तों का एक रेला आया और हठात् सुरक्षा रास्ते से बाहर कर दिया गया।
चिलचिलाती धूप में एक लम्बा चक्कर लगाकर हमारी टोली प्रसाद,फोटो,माला,सिन्दूर,चूड़ी,खिलौने आदि खरीदने में व्यस्त हो गई।लोगों की आस्था एवं भावनाओं को भुनाते दुकानदार हर पल व्यावसायिक पैतरा बदल रहे थे।धर्म भीरु भक्तों को उनके चंगुल से निकल पाना मुश्किल ही नहीं असंभव था।दूसरी तरफ टूरिस्ट गाइड लोगों को अलग-अलग जत्थों में बांटकर अयोध्या-महात्म्य समझा रहे थे।वे पूरी तरह धर्माचार्य की भूमिका में सक्रिय थे।लोग स्वीकारात्मक मुद्रा में लगातार सिर हिलाए जा रहे थे।पर्यटकों को लुभाने वाले मनमोहक शब्दों का गुलदस्ता इतना विश्वसनीय था कि गोया वे कोई टूरिस्ट गाइड नहीं बल्कि व्यासपीठ पर विराजमान आध्यात्मिक गुरु हों।
अयोध्या की सड़कों से लेकर संसद के गलियारों तक सभी मस्त।वर्तमान की चिंता भविष्य पर हावी नज़र आ रही है। धूमिलाना तेवर में कहें तो ‘घोडा पीया जा रहा है , कुत्ता खाया जा रहा है।’अपने-अपने वर्तमान को स्वर्णिम बनाने की होड़ मची है।बिल्कुल ,जंगल-न्याय।संचित ज्ञान-विज्ञान के भारतीय स्रोत और उनसे जुड़ी भौगोलिक परिस्थितियां या तो इन टूरिस्ट गाइडों की मोहताज़ हैं या ऊँची टीआरपी की जुगाड़ में संलिप्त मीडिया की।
बाबाओं की फलती-फूलती दुकान से जनमानस लगातार ठगा जा रहा है। दसकों पहले भारतीय ज्ञान-विज्ञान पर चलाया गया विदेशी हंटर आज भी हमें लहूलुहान कर रहा है।इनके प्रति भारतीयों में अविश्वास का बीज बो दिया गया है। इन्हें आउटडेटेड मानकर दरकिनार करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। दरकिनार की बात तो दूर,लोग खुलेआम अपना विरोध दर्ज़ करा रहे हैं। इनके मन और मस्तिष्क में यह भर दिया गया है कि संस्कृत पढ़कर इनकी संतान दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर नहीं चल पाएगी। अपनी अस्मिता से अंजान इन भोले-भालों को यह नहीं मालूम कि पूरी दुनिया के वैज्ञानिक भारतीय वेदों की प्रमाणिकता पर अपनी मुहर लगा रहे हैं। आविष्कार-जगत में ये अधिक विश्वसनीय और तथ्यपूर्ण हैं।
आवश्यकता है कि इस प्रकार की अद्यतन जानकारी को युवा पीढ़ी से परिचित कराया जाय।मेरा मानना है कि शिक्षा ही इसका सर्वोत्तम माध्यम है। हमारे प्राचीन ग्रन्थ मात्र भारत के ही नहीं बल्कि समष्टि की अनमोल धरोहर हैं। इन पर उच्च स्तरीय कमेटी का गठन व प्रामाणिक शोध कार्य की महती आवश्यकता है। दुनिया में भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति के लिए भारतीय ज्ञान-विज्ञान के महत्त्वपूर्ण स्रोतों को शैक्षिक धारा से जोड़ना ही होगा। इस कार्य के लिए दुनिया के सभी थिंकर टैंकों को एकजुट होकर सामने आना पड़ेगा।
ओह ! मैं भी क्या-क्या सपने बुनने लगा ? प्रसाद की एक दुकान के सामने खड़ा होकर इतना बड़ा क्रन्तिकारी परिवर्तन ! समाज , संस्कृति और शिक्षा पर इतना गहरा मंथन ! न , बाबा न।ध्यान भंग हुआ। पुरुष अपनी खरीददारी कब का कर चुके थे।महिलाएं कॉस्मेटिक की दुकान पर अब भी व्यस्त थीं।सौंदर्य-सामग्री को चुनने में विलम्ब करती महिलाएं दल के मुखिया का पारा लगातार बढ़ा रही थीं।मैं भी कुछ अपने इस्ट -मित्रों के लिए लेता , लोग गाड़ी में बैठ चुके थे।कुछ भी न खरीद पाने का ग़म मुझे कम किन्तु मेरी सहधर्मिणी को अधिक था।पति के साथ शॉपिंग न कर पाने का मलाल चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।गाड़ी सरपट घर की तरफ दौड़ पड़ी।पुनः स्मरण हो आया – “उत्तर दिसि सरयू बह पावन।”
निर्देशक– मेघना गुलज़ार संगीतकार/लेखक– विशाल भारद्वाज गीतकार– गुलज़ार मुख्य कलाकार– इरफ़ान खान, कोंकणा सेन, तब्बू।
जिस देश की सुरक्षा व्यवस्था मर्डर जैसे संवेदनशील मसले को सांप सीढ़ी का खेल समझे वहाँ न्याय की अपेक्षा करना, स्वयं से एक छलावा मात्र है। एक ऐसे ही संवेदनशील मुद्दे को सिनेमा की शक्ल दी है निर्देशक मेघना गुलज़ार ने। मेघना द्वारा निर्देशित फ़िल्म तलवार जिसकी पटकथा लिखी है मशहूर लेखक-निर्देशक विशाल भारद्वाज ने, एक ज़ोरदार तमाचा है देश की सुस्त और आराम पसंद प्रशासनिक व्यवस्था को। आरुषि डबल मर्डर केस में निर्देशक ने स्थानीय पुलिस के इन्वेस्टिगेशन सिस्टम पर बड़ा सवाल किया है। पुलिस प्रशासन और सीबीआई जैसे जांच समूह के भीतर के शीतयुद्ध को भी दर्शाया गया है, जिसकी वजह से कई मर्तबा बेगुनाहों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
फ़िल्म में इंटरवल का पहला हिस्सा थोड़ा सुस्त है लेकिन दुसरे हिस्से को बेहद रोमांचक बना दिया है लेखक ने। कोंकणा सेन को स्क्रीन स्पेस कम मिला है, बावजूद इसके उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता को सिद्ध किया है। वहीं इरफ़ान खान ने अपनी बेहतरीन कलाकारी का एक और नमूना पेश किया है। कुछ समय के लिए तब्बू भी नज़र आई हैं। सपोर्टिंग एक्टर्स ने भी पटकथा के साथ पूरा न्याय किया है।
विशाल की तमाम फिल्मों की तरह ही इस फ़िल्म में भी गुलज़ार साहब के बोल कहानी के भाव को बड़ी खूबसूरती से उकेरते हैं। फ़िल्म की एक अच्छी बात यह भी है कि इसमें बेवजह गाने नहीं डाले गए हैं। जिसकी वजह से कहानी दर्शक को जोड़े रहती है। फ़िल्म आपको वर्तमान सुरक्षा के प्रति एक बार फिर से सोचने पर मजबूर करती है। देखना यह है कि फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद इस केस को लेकर कुछ बात उठती है!
सोचने पर मजबूर करती है फ़िल्म ‘तलवार’। दर्शकों को फ़िल्म के लिए समय ज़रूर निकालना चाहिए।
बुधवार को दिल्ली में आयोजित केंद्र-राज्य रिलेशनशिप कॉन्क्लेव में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल केंद्र पर जमकर हमला बोला। कार्यक्रम में देश के गैर बीजेपी शासित 6 राज्यों के मुख्यमंत्रियों (प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से) ने भाग लिया।
केजरीवाल ने अपने भाषण में कहा कि 23 साल में किसी भी गवर्नर ने विधानसभा के ऑर्डर को नल एंड वायड नहीं किया है, लेकिन जब से हमारी सरकार आई है, गवर्नर ने मेरे कई आदेशों को नल एंड वायड किया है।
केजरीवाल यहीं नहीं रुके उन्होंने केंद्र सरकार पर राष्ट्रदोह का आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार सरकारी अफसरों को राज्य सरकार के खिलाफ करके उन्हें रिबेल बना रही है। यही नहीं पुलिस को आम आदमी पार्टी के विधायकों को गिरफ्तार करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
राष्ट्रदोह का आरोप लगाने के बाद उन्होंने कहा कि हम केंद्र के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन देश तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक केंद्र मजबूत नहीं होगा। और राज्यों को कमज़ोर करके केंद्र कैसे मज़बूत हो सकता है।
केजरीवाल में केंद्र ही नहीं विभिन्न राज्यों के राज्यपालों को भी आड़े हाथो लिया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल केंद्र सरकार के एजेंट की तरह काम करते हैं। केजरीवाल ने सीबीआई के गलत इस्तेमाल को लेकर भी भड़ास निकाली। उन्होंने कहा कि सीबीआई का इस्तेमाल करके राज्यों पर कंट्रोल किया जा रहा है।
मौन को मुखर और सन्नाटे को शब्द देती विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता की सबसे प्रभावशाली स्वर हैं।प्रस्तुत है साहित्य अकादमी , दिल्ली के अध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की डॉ.जितेन्द्र पाण्डेय से बातचीत के कुछ अंश :
* आपने काव्य लेखन की शुरुआत कैसे की ?
~ मेरे काव्य लेखन की शुरुआत मेरे किशोर वय में ही हो गई।मैं जानता भी नहीं कि कैसे हो गई और आज भी उसका कोई सटीक कारण नहीं बता सकता।वह कोई भीतरी प्रेरणा थी संभवतः अपने को ही जानने और पहचानने की।शब्द अपने आप आए और कविता बन गई।यह 1955-56 की बात है,जब मैं पंद्रह -सोलह वर्ष का था।
* आपके प्रिय कवि कौन हैं ?
~ मेरे प्रिय कवि तुलसीदास और सूरदास हैं।
* आपके अब तक सात संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।इनमें से आप का पसंदीदा संकलन कौन सा है ?
~ ‘निज कवित्त केहि लागि न नीका’-तुलसीदास ने कहा है कि कवि को तो अपनी कविता अच्छी लगेगी ही।महत्वपूर्ण यह है कि पाठकों को कवि की कौन सी कविताएँ अच्छी लगती हैं ?हर कविता का भाव स्तर अलग होता है और सम्भव है जो कविता मुझे बिल्कुल ही कमजोर लगती है वह मेरे किसी पाठक को बहुत अच्छी लगे।फिर भी आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए कहूँगा कि ‘बेहतर दुनिया के लिए’,’आखर अनंत’तथा ‘फिर भी कुछ रह जाएगा’ नामक संग्रहों की अधिकांश कविताएँ मुझे प्रिय हैं।अच्छी हैं या नहीं , इसे मैं कहने का अधिकारी नहीं।
* इस समय हिंदी कविता के क्षेत्र में कई पीढ़ियां सक्रिय हैं और वस्तु एवं शिल्प के धरातल पर वैविध्यपूर्ण प्रयोग हो रहे हैं।ऐसी स्थिति में हिंदी कविता हमें किस रूप में आश्वस्त करती है ?
~ हिंदी कविता हमें वस्तु और शिल्प दोनों रूपों में आश्वस्त करती है।हिंदी कविता बहुत अच्छी लिखी जा रही है और बहुत खराब भी।उनमें अंतर करने की जरूरत है।
* सन् 60 के बाद हिंदी कविता में दर्जनों आंदोलन चले थे लेकिन 1980 के बाद समकालीन कविता के अलावा किसी अन्य सम्बोधन का प्रयोग नहीं हो रहा है।क्या इससे काव्य-क्षेत्र में ठहराव की प्रतीति होती है ?
~ आंदोलनों से कविता का विकास या उसकी श्रेष्ठता रेखांकित नहीं होती।उनसे इतना ही प्रमाणित होता है कि कवि समाज और राजनीति के प्रश्नों के प्रति सचेत है।1980 के बाद कविता में आंदोलन तो नहीं हुए पर वह अपने पूर्व की कविता ( अर्थात् 1960-80 ) से बेहतर ही लगती है।हर कविता की अलग इयत्ता होती है।उसकी काव्यानुभूति का अलग स्तर होता है।कविताओं को सामान्यीकृत करने की जरूरत नहीं है।
* आपकी कविताओं में मनुष्य तथा कविता की अमरता और जिजीविषा के प्रति गहरी संलग्नता पायी जाती है ।क्या यह आपके जीवनानुभव का परिणाम है ?
~ कविता में जो कुछ भी आता है , कवि के जीवनानुभव से ही आता है , बल्कि कहूँ कि आना चाहिए।कविता वही होती है जो कि कवि स्वयं होता है, बल्कि कहूँ कि होनी चाहिए।मेरी कविता में आप उसे महसूस करते हैं , यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है।
* आपने कविताओं के द्वारा पर्यावरण की समस्या पर बड़ी ही गंभीर और सतर्क टिप्पणी की है। ‘आरा मशीन ‘ जैसी कविता इस समूचे चक्र को व्यंजित करती है। क्या इस कविता की कोई प्रेरणा रही है ?
~ ‘आरा मशीन ‘ शीर्षक कविता की कहीं मैंने विस्तार से व्याख्या की है।उसमें सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं है बल्कि अपने समय का आतंक और उसका भयावह चेहरा भी है।अपने समय के हीनताबोध के दैन्य और मूल्यों के क्षरण का भी उसमें संकेत है।वह कविता सपाट और एक आयामी नहीं है बल्कि अर्थ के अनेक स्तर उसमें हैं।यह कविता बहुत मानसिक दबाव में बल्कि कहूँ कि निरंतर दबाव झेलते रहने के बहुत बाद में लिखी गई है।इसकी प्रेरणा भी प्रत्यक्ष रही है , जैसा कि आप का अनुमान है।
* आपकी दृष्टि में कालजयी कविता किसे माना जा सकता है और हिंदी की किन कविताओं को आप कालजयी मानते हैं?
~ कालजयी कविता वह है जो काल के लंबे समय तक यात्रा करे।ऐसी कविता मानव प्रकृति और उसकी चिरंतन चिंताओं की अभिव्यक्ति होती है।ऐसी कविता प्रेम की भी हो सकती है,कवि की आत्मवेदना की भी और विराट स्तर पर सत् और असत् के संघर्ष की भी।उदाहरण के लिए सूरदास की कविता , मिर्ज़ा ग़ालिब की कविता और सूरदास की कविता को पढ़ा जा सकता है।अपने समय की कविताओं में प्रसाद की ‘कामायनी’, निराला की ‘रामशक्ति पूजा’ , अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ जैसी कविताएँ कालजयी कही जा सकती हैं।
* आप भविष्य की कविता और कविता के भविष्य को किस रूप में देखते हैं ?
~ मनुष्य का भविष्य जिस दिशा में जा रहा है वह उसके लिए खतरनाक और चुनौतीपूर्ण है।पर्यावरण का संकट मनुष्य के सामने है।विनाशक यांत्रिकी उसके अस्तित्व को मिटाने में सक्षम है।ऐसे में कविता का भविष्य भी चुनौतीपूर्ण है।मगर मनुष्य के पास जब तक उसकी भाषा है , भाव है , विचार है तब तक वह अपने समय को भी चुनौती देता रहेगा और इसके लिए उसकी रचना ही अस्त्र बनेगी।वह कविता के रूप में भी हो सकती है और किसी अन्य विधा के भी।कवि को कविता के भविष्य के प्रति आश्वस्त रहना चाहिए।