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Tuesday, August 11, 2026
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नेटज़ेक सर्वे रिपोर्ट : उत्तर प्रदेश में खिलेगा कमल!

शिखा पाण्डेय | Navpravah.com

कुल 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से सारे देश की नज़रें जिस राज्य के परिणामों पर टिकी हैं, वे हैं उत्तर प्रदेश के परिणाम। 11 मार्च को मत गणना के बाद उत्तर प्रदेश की जनता को अपना नया मुख्यमंत्री मिल जायेगा। मुख्यमंत्री किस पार्टी का होगा, यह अब तक तय तो नहीं है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के सितारे बुलंद नज़र आ रहे हैं।

सर्वे एजेंसी ‘नेटज़ेक रिसर्च एंड डेवलपमेंट’ की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तमाम चुनावी रैलियाँ उत्तर प्रदेश पर अपना जादू बिखेरती नज़र आ रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का विजय परचम लहराने की पूरी उम्मीद है। समाजवादी पार्टी की ‘साइकिल’ कांग्रेस के ‘पंजे’ में फंस कर पंक्चर हो गई है, वहीं बहनजी का ‘हाथी’ भी बिल्कुल बेदम और पस्त नज़र आ रहा है।

‘नेटज़ेक रिसर्च एंड डेवलपमेंट’ के अनुसार उत्तरप्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से लगभग 209 सीटें भाजपा के खाते में आने की उम्मीद है। वहीं सपा-कांग्रेस गठबंधन को लगभग 105 सीटें मिलने की उम्मीद है। रिपोर्ट के अनुसार बहुजन समाज पार्टी के खाते में 78 सीटें आने के आसार हैं। वहीं राष्ट्रीय लोक दल को 9 सीटों पर और अन्य को 7 सीटों पर बढ़त मिलती नज़र आ रही है।

उत्तरप्रदेश को ‘उत्तम प्रदेश’ बनाने की होड़ में जुटी तमाम पार्टियों में से जनता ने किस पार्टी को उत्तम दर्ज़ा दिया है, ये तो परिणामों की घोषणा के बाद ही पता चलेगा, लेकिन फिलहाल सभी पार्टियों ने काउंट डाउन शुरू कर दिया है। प्रदेश को तो बस यही उम्मीद है कि जो भी पार्टी उत्तम साबित हो, वह अपने वादे के मुताबिक राज्य को वाक़ई उत्तम बनाये।

आतंकी गतिविधि बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है बीजेपी द्वारा मुस्लिमों की उपेक्षा -दिग्विजय सिंह

शिखा पाण्डेय | Navpravah.com

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को भारत में बढ़ रही आतंकवादी गतिविधियों के पीछे भी भारतीय जनता पार्टी का हाथ नज़र आता है। उनके अनुसार भाजपा द्वारा मुस्लिमों की उपेक्षा इसकी बड़ी वजह है। उनका कहना है कि ये उपेक्षित मुसलमान ही पाकिस्तान द्वारा भारत को आतंकित रखने की मंशा की ओर आकर्षित होते हैं।

लखनऊ में संदिग्ध आतंकी सैफुल्लाह के एनकाउंटर के बाद दिग्विजय सिंह ने एक अग्रेंजी चैनल से बात करते हुए कहा, “मैं ये काफी समय से कह रहा हूं। लगातार मुसलमानों के साथ हो रहे अन्याय के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है कि जहां पाकिस्तान और पाकिस्तान की भारत को अस्थिर करने की इच्छा भारतीय मुसलमानों को आकर्षित कर रही है।”

सिंह ने कहा,” मुसलमानों को यहां से जुड़े होने का विश्वास देना होगा। उन्हें ये विश्वास दिलाना होगा कि इस देश के सभी नागरिकों को बराबर न्याय, सम्मान और अधिकार प्राप्त है। तालिबान हमारे पड़ोस के देशों में एक्टिव है, लेकिन आज तक कोई भारतीय मुसमलान उससे प्रेरित नहीं हुआ, लेकिन आईएसआईएस एकाएक भारतीय मुसलमानों को इतना आकर्षित करने लगा।” उन्होंने कहा कि ये सरकार के लिए वेक अप कॉल है कि मुसलमानों को पृथक न रखें। सरकार को मुसलमानों को न्याय देना होगा।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने बुधवार (8 मार्च) को स्पष्ट किया कि राजधानी लखनऊ में तड़के मारे गए संदिग्ध आतंकी सैफुल्लाह के तार अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन आईएसआईएस से जुड़े थे। इसका कोई प्रमाण नहीं है, हालांकि वह आईएसआईएस के साहित्य और विचारों से स्वत: प्रेरित था।

अपनी हरकतों की वजह से फिर चर्चा में अभिनेता ऋषि कपूर

शिखा पाण्डेय | Navpravah.com

‘जैसे को तैसा’ कहावत पर गंभीरता से अमल करने वाले अभिनेता ऋषि कपूर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं, आज कल ऋषि अपनी फिल्मों से अधिक अपने ओपन ट्वीट्स से चर्चा में रहते हैं। इस बार भी मुद्दा वही है।

ऋषि कपूर ने अपने एक ट्वीट पर बदतमीज़ी भरे रिट्वीट करने वालों को ऐसा जवाब दिया है कि अब वे खुद सबकी नज़र में ‘बद्तमीज़’ साबित हो गए हैं। ऋषि कपूर ने अपने ट्विटर बायो भी बदल दिया है। इसमें उन्होंने चेतावनी दी है कि ट्रोल्स और गाली देने वाले दूर रहें, वर्ना ब्लॉक कर दिए जाएंगे।

पिछले दिनों ऋषि की ट्विटर पर कुछ फॉलोवर्स से बहस हो गई थी। उन्होंने कहा था कि गाली देने वाले को वे उसी की भाषा में जवाब देना जानते हैं। ऋषि ने बुधवार को ट्वीट करके लिखा, “भविष्य के नए ट्रोल्स और गाली देने वालों के लिए नई चेतावनी, समझदार दोस्त नजरअंदाज करें। चलो फन वर्ल्ड में जिएं।”

ऋषि ने अब चेतावनी लिखी है, ” ट्रौल्स और गाली देने वालों, कोशिश भी मत करना, तुम गाली खाओगे और ब्लॉक भी किए जाओगे। धैर्य की भी हद होती है।” साथ ही ऋषि ने अपनी प्रोफाइल भी बदल ली है। नई प्रोफाइल में ऋषि ने औरंगजैब फिल्म की पिक्चर लगाई है, जिसमें वो हाथ में पिस्तौल लिए नजर आ रहे हैं।

☠️Released new Warning Bio for future Trolls, Abusers and Idiots! Refer profile. Please ignore sensible friends. Let’s live in a fun World

गौरतलब है कि हाल ही में ट्विटर पर ऋषि कपूर ने एक शॉर्ट क्विज किया था। उन्होंने कुछ सवाल यूजर्स से पूछे, जिनके जवाब बाद में वह खुद भी बताते जा रहे थे। ऋषि ने पूछा कि वह कौन सी बात है जो कि ऋषि कपूर और करण जौहर में कॉमन और एक जैसी है? इस सवाल के जवाब में कई यूज़र्स ने पॉजिटिव बातें लिखीं, तो कई ने नेगेटिव। नकारात्मक जवाबों पर ऋषि कपूर भड़क गए और उन्होंने गाली गलौज भरे जवाब दिए। यहां तक की महिलाओं को भी नहीं छोड़ा। 2 महिलाओं के जवाब से ऋषि इतने खफा हुए, कि उनकी पर्सनल वॉल पर उन्हें मेसेज भेजा और उन महिलाओं द्वारा मेसेजेस पब्लिक किए जाने पर उन्हें ब्लॉक भी कर दिया।

‘काशी’ जीतने में जुटी राजनीतिक पार्टियाँ

सौम्या केसरवानी | Navpravah.com

उत्तर प्रदेश विधानसभा का आखिरी चुनाव अब अपने आखिरी दौर में है, आखिरी चरण में पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में चुनाव होना है और इसके लिए नरेन्द्र मोदी भी कमर कस चुके हैं। वाराणसी से बीजेपी को काफी उम्मीदें है और बीजेपी अबकी चुनाव में एक बड़ी जीत की तलाश में है, इस चुनाव में हालाँकि बीजेपी ने पूरे कैबिनेट को उतार दिया है, और अब अंतिम चरण में पूरी कैबिनेट वाराणसी की गलियों में देखी जा रही है। जाहिर है पीएम मोदी और भाजपा पर इस क्षेत्र से अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव जीतने का दबाव होगा लेकिन इसके बारे में 11 तारीख से पहले कोई भी कयास लगा पाना मुश्किल है।

शहर उत्तरी, शहर दक्षिणी, बनारस कैंट, सेवापुरी, शिवपुरी, अजगरा, पिंडरा, और रोहनियां की 8 विधानसभा सीटों के 2012 के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। तीन सीटों वाराणसी कैंट, वाराणसी उत्तरी और वाराणसी दक्षिणी सीटों पर भाजपा का कब्जा रहा था, जबकि अजगरा और शिवपुर में बसपा ने कब्ज़ा जमाया वहीँ अपना दल ने रोहनिया, पिंडारा में कांग्रेस और सेवापुरी में सपा को जीत मिली थी।

जीती हुई 3 सीटों को बचाने के अलावा बीजेपी की नजर अन्य सीटों पर भी है और अधिक से अधिक सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए बीजेपी जोर लगा रही है। लेकिन बीजेपी की राह इतनी आसान नहीं और बीजेपी को एक बार फिर मोदी मैजिक का ही सहारा है।

वाराणसी दक्षिणी सीट से भाजपा के दिग्गज व वर्तमान विधायक और लगातार सात बार चुनाव जीत चुके श्यामदेव राय चौधरी का टिकट कटने के कारण यहाँ आतंरिक कलह से भी बीजेपी को दो चार होना पड़ा है। नीलकंठ तिवारी को यहाँ से टिकट दिया गया है, जहाँ राजेश मिश्रा सपा-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में सामने हैं।

वाराणसी उत्तरी सीट से वर्तमान विधायक रवींद्र जायसवाल के ऊपर भी जीत दर्ज करने का दबाव है और उनको बसपा-सपा से कड़ी टक्कर मिल रही है, लेकिन भाजपा के बागी सुजीत सिंह इनका खेल ख़राब करने में जुटे हुए हैं। सुजीत सिंह निर्दल उम्मीदवार के रूप में है और जायसवाल की जीत की उम्मीदों पर तुषारापात करने की पूरी कोशिश में जुटे हैं। अब्दुल समद अंसारी एक मात्र मुस्लिम उम्मीदवार होने के नाते भी मैदान में बने हुए हैं।

सपा के लिए सुरेंद्र पटेल ने सेवापुरी से जीत दर्ज की थी और पार्टी अखिलेश के चेहरे के अलावा कांग्रेस के सहारे वाराणसी से अधिक से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही है। अगर गठबंधन की बात करें तो कांग्रेस के खाते में पिंडारा के रूप में एक सीट है जहाँ से अजय राय विधायक चुने गए थे। हालाँकि अजय राय वाराणसी से लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़े थे, अजय राय को इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे थे। सपा अब अखिलेश यादव और राहुल के सहारे वाराणसी में बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फेरने की कोशिश में जुटी हुई है।

वहीं बसपा के खाते में अजगरा और शिवपुर की सीट 2012 में रही और बसपा को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी। लेकिन अब अखिलेश यादव के परिवार में हुए झगड़े और अपराध को मुद्दा बनाकर बसपा ने सपा के दोबारा सत्ता में आने को चुनौती दी है तो वहीँ केंद्र सरकार पर नोटबंदी के दौरान जनता को परेशान का इल्जाम लगाते हुए पीएम पर बसपा सुप्रीमो ने कई हमले किये हैं।

पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र में अब जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा ये तो 11 मार्च को मालूम होगा लेकिन काशी की गंगा में जीत की डुबकी लगाने के लिए सभी दलों ने अपनी ताकत झोंक दी है। आखिरी चरण में काशी के कोतवाल की शरण में सभी प्रमुख दल पहुंचे हैं लेकिन बनारसी ‘रंग’ में रंगकर कौन विजय की होली खेलेगा इसका जवाब 8 मार्च को ‘बनारस’ के लोग ही देंगे।

सावधान! टॉयलेट की सीट से भी ज्यादा गंदे होते हैं मोबाइल फ़ोन

शिखा पाण्डेय । Navpravah.com

अगर आप दिन-रात, चौबीसों घंटे अपने सेल फोन से चिपके रहते हैं तो सावधान हो जाइए। रोटी, कपड़ा और मकान की तरह आपकी मौलिक आवश्यकता बन चुके ये मोबाइल फोन, एक टॉयलेट सीट से भी अधिक गंदे हो सकते हैं। जी हां! पश्चिमी देशों की खबरों की मानें तो मोबाइल फोन अक्सर शौचालयों की सीट से भी ज्यादा गंदे होते हैं। वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मजीवों की ऐसी तीन नई प्रजातियों की पहचान की है, जो मोबाइल फोनों पर पनपते हैं।

यह चौंका देने वाले परिणाम सरकारी संस्थान ‘राष्ट्रीय कोशिका विज्ञान केंद्र’ के वैज्ञानिकों ने निकाले हैं। ये वैज्ञानिक मोबाइल फोनों की स्क्रीन पर सूक्ष्म जीवों की तीन नई प्रजातियों की पहचान करने में कामयाब रहे हैं। इनके अनुसार कुछ स्मार्ट फोनों पर तो ऐसे बैक्टीरिया भी पाए जाते हैं, जिनपर दवाओं का असर ही नहीं होता। इन्हें हम सुपर बग कहते हैं। चूंकि मोबाइल फोन रसोई से लेकर सार्वजनिक परिवहन तक लगभग हर तरह के वातावरण में ले जाए जाते हैं, ऐसे में फोन पर आए पसीने और मैल में ये सूक्ष्मजीव अच्छी तरह पनप जाते हैं।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा फाइनेंस की गई इस प्रयोगशाला ने ऐसे दो बैक्टीरिया और फंगस की पहचान की है, जिनका जिक्र वैज्ञानिक साहित्य में पहले कभी नहीं किया गया। इससे पहले वर्ष 2015 में यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया में ‘मॉलिक्यूलर माइक्रोबायोलॉजी एंड इम्यूनोलॉजी डिपार्टमेंट’ के सहायक प्रोफेसर विलियम डीपाओलो द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया था कि शौचालयों की सीट पर तीन विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया पाए जाते हैं, लेकिन मोबाइल फोनों पर औसतन 10-12 विभिन्न प्रकार के फफूंद और बैक्टीरिया पाए जाते हैं।

कैसे किया गया परीक्षण-

परीक्षणकर्ता योगेश एस शोउचे ने पुणे में और उनके समूह ने एनसीसीएस में 27 मोबाइल फोनों की स्क्रीनों से नमूने एकत्र किए। वे 515 विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया और 28 विभिन्न प्रकार के फफूंदों की पहचान कर पाने में सफल रहे। इस दल ने मोबाइल की सतह से इन सूक्ष्मजीवों को हटाने के लिए रुई के स्टर्लाइज्ड टुकडों और एक लवणयुक्त घोल का इस्तेमाल किया। इन सूक्ष्मजीवों को 30 डिग्री सेंटीग्रेड पर मानकीकृत माध्यम से पनपाया गया था। इस कार्य से जुड़े सह-परीक्षणकर्ता प्रवीण राही ने कहा कि ये सूक्ष्मजीव इंसानों के मददगार हैं और आम तौर पर हमारे शरीर पर पनपते हैं।

परीक्षण के दौरान छह सदस्यों वाला यह दल दरअसल सूक्ष्मजीवों की तीन नई प्रजातियों को देखकर सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। इनमें से दो बैक्टीरिया का नाम ‘लाएसिनबैकिलस टेलीफोनिकस’ और ‘माइक्रोबेक्टीरियम टेलीफोनिकम’ और फफूंद की नई प्रजाति का नाम ‘पायरेनोकाएटा टेलीफोनी’ रखा गया है। राही के अनुसार एक अच्छी खबर यह है कि जो नमूने इन्होंने एकत्र किए हैं, उनमें रोग पैदा करने वाले स्टेफिलोकोकस ऑरियस जैसे खतरनाक सूक्ष्मजीव नहीं पाए गए हैं।

उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले स्मार्ट फोनों के नमूने सक्रिय तौर पर नहीं लिए, जिनपर आम तौर पर ये सूक्ष्मजीव रहते हैं। मोबाइल फोनों की स्वच्छता से जुड़े ये निष्कर्ष कहते हैं कि भारत में स्थिति इतनी भी खराब नहीं है। यदि भारत के अतिरिक्त अन्य देशों की बात करें तो वर्ष 2015 में मिस्र के एलेक्जेंड्रिया में 40 नमूनों के आधे से अधिक नमूनों में सुपर बग पाए गए थे। इसी सप्ताह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक चेतावनी भरा निष्कर्ष जारी करते हुए कहा कि सूक्ष्मजीवों की 12 प्रजातियां ऐसी हैं, जो एंटी-बायोटिक्स के खिलाफ लड़ाई जीतने में कामयाब हो रही हैं और इन सूक्ष्मजीवों को मारने के लिए जल्दी ही नए रसायनों की खोज की जानी जरुरी है।

कैसे रखें अपने ‘स्मार्ट फोन’ को स्वच्छ व ‘स्मार्ट’-

-अपने मोबाइल फोन को शौचालय में न ले जाएं। गन्दी जगहों पर, गंदे हाथों से मोबाइल फोन के प्रयोग से बचें।

-समय-समय पर साबुन के पानी में एक कपड़े को हल्का सा भिगोकर इसे साफ कर लें। इसे इस्तेमाल करने के पहले हैंडसेट को पूरी तरह सुखा लें।

-मोबाइल की सफाई के लिए व्यवसायिक द्रव्यों और सेनीटाइजरों का इस्तेमाल करने से बचें और मोबाइल साफ करने से पहले उसे स्विच ऑफ कर दें।

बाबरी विध्वंश मामला: फैसला 22 मार्च को, इन वरिष्ठ नेताओं पर गिर सकती है गाज

bjp leaders in trouble

अमित द्विवेदी । Navpravah.com

बाबरी विध्वंश मामले में सुप्रीम कोर्ट 22 मार्च को अपना फैसला सुनाएगा। सीबीआई और हाजी महबूब अहमद की याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीसी घोष और जस्टिस आरएफ नरीमन की खंडपीठ ने यह तारीख निश्चित की है। इस याचिका के जरिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आरोपियों के ट्रायल में हो रही देरी को लेकर चिंता जताई है।

मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया तेज़ हो, इसके लिए आरोपियों का संयुक्त ट्रेल भी कराया जा सकता है। गौरतलब है कि इस मामले में आरोपी रहे बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, केंद्रीय मंत्री उमा भारती, राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह और मुरली मनोहर जोशी सहित अन्य को दोषमुक्त पाया गया था। इस मामले में यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलता है तो इन सभी नेताओं की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

सीबीआई ने हाई कोर्ट के 21 मई 2010 को सुनाए फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी। न्यायालय ने नेताओं के खिलाफ आरोप हटाने के विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई की विशेष अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा था, जिसमें आडवाणी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार और मुरली मनोहर जोशी के ऊपर लगे षड़यंत्र रचने के आरोपों को हटा दिया गया था।

इनके अलावा सतीश प्रधान, सी आर बंसल, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, साध्वी रितम्भरा, वी एच डालमिया, महंत वैद्यनाथ, आर वी वेदांती, परम हंस राम चंद्र दास, जगदीश मुनि महाराज, बी एल शर्मा, नृत्य गोपाल दास, धरम दास, सतीश नागर और मोरेश्वर सावे के खिलाफ भी आरोप हटाए गए थे।

360 फुट ऊँचे तिरंगे को लहराते देख तिलमिला रहा पाकिस्तान!

शिखा पाण्डेय | Navpravah.com

जब जब हवा में झूमता-लहराता तिरंगा दिखाई देता है, हमारा मस्तक फ़क्र से उठा जाता है और हमें अपनी स्वतंत्रता का अद्भुत अहसास होता है। सोचिये जब देश का सबसे ऊंचा तिरंगा लहराता दिखे, तब आलम क्या होगा, और वह भी भारत-पाकिस्तान की सीमा पर! जी हां!रविवार को अंतरराष्ट्रीय अटारी-वाघा सीमा पर देश का सबसे ऊंचा तिरंगा फहराया गया। 55 टन के पोल पर फहराए गए इस तिरंगे की ऊंचाई 360 फुट है, जो पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से भी नज़र आएगा। आपको बता दें कि अटारी सीमा से लाहौर की दूरी लगभग 20 किमी है।

यह तिरंगा अटारी सीमा पर ‘नोमेन लैंड’ से 150 मीटर दूर ‘पंजाब टूरिज्म विभाग’ के सूचना केंद्र के बाहर स्थापित किया गया है। इस 120 गुना 80 फुट के तिरंगे का वजन 100 किलो है। यह लिम्का बुक में भी दर्ज होगा। नगर सुधार ट्रस्ट ने 3.50 करोड़ रुपये से ‘बजाज इलेक्ट्रिकल्स’ की सहयोगी कंपनी ‘भारत इलेक्ट्रिकल्स’, होशियारपुर से इसे तैयार कराया है। तिरंगा लगाने वाली कंपनी का दावा कि यह लाहौर से दिखाई देगा।

55 टन वजन और 110 मीटर लंबे पोल को खड़ा करने के लिए मुंबई से विशेष सात ट्रालों पर स्पेशल क्रेन मंगवाई गई थी। क्रेन ने पोल लगाने का 78 लाख रुपये किराया लिया है। तीन साल तक राष्ट्रीय ध्वज की देख-रेख ‘भारत इलेक्ट्रिकल्स’ द्वारा ही की जायेगी। प्रकाश के लिए 65-65 फुट ऊंचे तीन पोल लगाए गए हैं। हर पोल पर 500-500 वाट के 12 बल्ब लगाए गए हैं।

तिरंगे को लहराने की रस्म निकाय मंत्री अनिल जोशी, बीएसएफ के आइजी मुकुल गोयल, डीआइजी जेएस ओबराय, आइजी दिल्ली हेडक्वार्टर सुमेर सिंह और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कमल शर्मा ने अदा की। बीएसएफ के जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया।

उल्लेखनीय है कि पहले तिरंगा ‘सद्भावना द्वार’ से 30 फुट की दूरी पर स्थापित किया जाना था। पाकिस्तान द्वारा इस पर आपत्ति उठाए जाने के बाद जून 2016 में प्रोजेक्ट रुक गया। पाक रेंजरों की आपत्ति के बाद इसे ‘ज्वाइंट चेक पोस्ट, अटारी’ पर स्थित ‘पंजाब टूरिज्म विभाग’ की जगह पर स्थापित किया गया है। 1 मार्च 2017 को तिरंगे के पोल में कैमरे होने की बात कहते हुए पाक रेंजरों ने फिर आपत्ति उठाई थी, जिसे बीएसएफ ने सिरे से खाजिर कर दिया था।

बलात्कार के आरोपी मंत्री ‘गायत्री’ पर भड़के राज्यपाल नाईक

शिखा पाण्डेय | Navpravah.com

उत्तर प्रदेश पुलिस की गिरफ्त से परे चल रहे उत्तर प्रदेश के ‘बलात्कार के आरोपी’ मंत्री गायत्री प्रजापति अब तक अपने पद पर सम्मान के साथ आसीन हैं। प्रदेश की ‘समाजवादी’ सरकार का ‘काम’ इतना शोर मचा रहा है कि यूपी के गवर्नर राम नाईक को इस मुद्दे में दखल देना पड़ा है। नाईक ने गैंगरेप आरोपी मंत्री गायत्री प्रजापति के मुद्दे पर सीएम अखिलेश यादव को एक पत्र लिखा है।

राम नाईक ने लिखा है, ”सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मामले में प्रजापति के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। इन हालातों में उनका मंत्री बने रहने और कोई ठोस कार्रवाई नहीं करने से लोकतांत्रिक मर्यादा पर सवाल खड़ा होता है। कैबिनेट मंत्री रहते हुए गायत्री ने जो किया, वह गंभीर अपराध है। इस पर अपनी राय बताएं।”

दरअसल शुक्रवार को ही राम नाईक ने कहा था कि गायत्री को पुलिस के सामने सरेंडर कर देना चाहिए, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। नाईक ने कहा कि कानून को उचित कदम उठाना चाहिए। उन्होंने भरोसा जताया कि कोर्ट ने जो आदेश दिया है, उस पर काम होगा।

बता दें कि प्रजापति समेत 7 लोगों पर एक महिला से गैंगरेप और उसकी नाबालिग बेटी के सेक्शुअल हैरेसमेंट का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर पर यूपी पुलिस ने केस तो दर्ज किया है, लेकिन सभी आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। शनिवार को गायत्री के खिलाफ कोर्ट ने गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया। उनका पासपोर्ट भी 4 हफ्तों के लिए सस्पेंड कर दिया गया। पुलिस ने मंत्री और उनके साथी आरोपियों की तलाश में कानपुर, अमेठी और लखनऊ के कई इलाकों में तलाश जारी रखी है।

पुलिस के मुताबिक, “जांच के दौरान पीड़ित महिला के मोबाइल की सालभर की लोकेशन मंत्री के घर के आसपास ही मिली। कॉल डिटेल से पता चला है कि गायत्री की कई बार महिला से मोबाइल पर बातचीत हुई थी।” 17 जुलाई, 2016 को भी महिला की लोकेशन गायत्री के घर पर ही निकली थी। महिला का आरोप है कि इसी दिन मंत्री के घर पर उसके साथ गैंगरेप और बेटी के साथ रेप की कोशिश की गई थी।

उधर यूपी के बीजेपी प्रेसिडेंट केशव प्रसाद मौर्य ने ट्वीट कर कहा, ”अखिलेशजी अपने चहेते मंत्री को गिरफ्तार कराएंगे नहीं, बर्खास्त तो करें। हम 11 तारीख के बाद गिरफ्तारी कर लेंगे।” केशव ने शनिवार को आरोप लगाया था कि अखिलेश ने गायत्री को अपने सरकारी आवास में छिपा रखा है। अगर वह देश छोड़कर भागने में कामयाब हुए, तो इसकी जिम्मेदारी सीएम की होगी। इसके जवाब में अखिलेश ने शुक्रवार को मीडिया से कहा था, ”आप सब कैमरा लेकर मेरे घर चलो और देखो गायत्री है या नहीं। इस मामले में हमारी सरकार हर तरह से मदद करेगी और न्याय होगा।”

कुंवारे करण जौहर बने दो बच्चों के पिता

शिखा पाण्डेय | Navpravah.com

निर्माता-निर्देशक करण जौहर के जीवन में 2 अनोखी खुशियां शामिल हो गई हैं। करण जौहर एक नहीं, दो-दो बच्चों के पिता बन गए हैं। करण ने खुद इस बात की घोषणा की है कि सरोगेसी के माध्यम से वे जुड़वा बच्चों के पिता बने हैं। उन्होंने अपने दोनों बच्चों के नाम रखे हैं ‘यश’ और ‘रूही'(Roohi)। करण के बच्चों के नामों में एक खास बात यह है कि एक प्रकार से ये उनके माता-पिता के नाम ही हैं। दरअसल, करन के पिता का नाम यश और मां का नाम हीरू (Hiroo) है।

करण ने अपने आॅफिशियल स्टेटमेंट में बताया, “मैं इस खबर को साझा करते हुए बेहद खुश हूं कि मेरी ज़िंदगी में दो और लाइफलाइन्स जुड़ने जा रही हैं और वह कोई और नहीं मेरे बच्चे हैं। वे हैं यश और रुही। मैं इन दोनों का पिता बन कर बहुत खुश हूं और मैं तहे दिल से इन दोनों का स्वागत अपनी ज़िंदगी और इस दुनिया में करता हूं।” उन्होंने कहा,”मैं डॉ. जतिन शाह को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने मेरे इस निर्णय में मेरा साथ दिया है और मैं हमेशा उनका शुक्रगुजार रहूंगा।”

कुंवारे पिता बने करण ने बताया, ” यह मेरे लिए एक इमोशनल डिसीजन था। लेकिन मैंने अपनी सारी ज़िम्मेदारियों को देखते हुए और अपने दायित्व को समझते हुए यह निर्णय लिया। अब मेरे बच्चे मेरे लिए प्राथमिकता होंगे। अब मेरे लिए घूमना, फिरना, बुक्स, और बाकी सारे काम उनके बाद ही महत्वपूर्ण होंगे। ईश्वर की कृपा से मेरे पास मेरी मां हैं, जो उनका मुझसे भी ज्यादा ख्याल रखेंगी। मैं अपनी मां का भी शुक्रिया अदा करता हूं, जिन्होंने मेरा हमेशा ख्याल रखा। मैं पूरी आशा करता हूं कि मैं भी उनकी तरह ही अपने बच्चों का ख्याल रख पाऊंगा।”

गौरतलब है कि करण जौहर ने हाल ही में अपनी आॅटोबायोग्राफी के लांच के दौरान संकेत दे दिए थे कि उनकी इच्छा है कि वे पिता बनें, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनमें वे सारे गुण हैं जो एक पिता में होने चाहिए।
फिलहाल करण लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में हैं, वे वहां किसी सेशन का हिस्सा बनने गए हैं।

हिंदी का साहित्येतिहास लेखन और डॉ श्रीभगवान तिवारी

डॉ. जितेंद्र पाण्डेय | Navpravah.com 

साहित्य का इतिहास लेखन एक दुष्कर कार्य है । इसमें मात्र कवि व उसके रचना कर्म का विश्लेषण ही नहीं बल्कि युग- बोध भी शामिल होता है। साहित्येतिहास लेखन में कई धाराएं समानांतर चलती हैं । इनमें भाषा, समाज, राजनीति और दर्शन मुख्य हैं। हिंदी साहित्य के विकास में बोलियों की महती भूमिका है। अतः हिंदी भाषा का उद्भव, स्वरूप और विकास भी साहित्य का सहयात्री  है। एक साहित्येतिहास लेखक के लिए जहां समाजशास्त्रीय ढंग से समाज की हर धड़कन को टटोलना एक चुनौती होती है वहीं तथ्यों की खोज, संकलन , पहचान और क्रमबद्धता के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का होना ज़रूरी  है। लेखक के लिए धर्म, दर्शन, अध्यात्म और परंपरा की समझ अनिवार्य है। इससे युग-चेतना का भान होता है। इन सबके बावजूद लेखक की अपनी दृष्टि होती है जो साहित्येतिहास लेखन  में उसे अलग पहचान दिलाती है।

गार्सा द तासी, जार्ज ग्रियर्सन, शिवसिंह सेंगर तथा मिश्र बंधुओं की गणना  प्रारंभिक साहित्येतिहासकारों में होती है। इन्होंने ही साहित्य के इतिहास लेखन की नींव रखी। इनकी सबसे बड़ी समस्या तिथियों- तथ्यों की खोज और काल- विभाजन की थी क्योंकि आदिकालीन कवियों ने स्वयं का परिचय अपनी रचनाओं में न के बराबर दिया था। पांडुलिपियों की खोज एक चुनौती के रूप में उभरी। हलांकि ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ इस कार्य के लिए आगे आई । बाद में साहित्येतिहास लेखकों ने सभा के इन सद्प्रयासों का लाभ भी उठाया । किंतु हिंदी साहित्य का व्यवस्थित और प्रामाणिक इतिहास आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1929 में लिखा जो अद्यतन हिंदी साहित्य के लिए प्रकाशस्तंभ बना हुआ है। आचार्य शुक्ल ने सामग्री संकलन, प्रवृत्ति-निर्धारण और कालविभाजन पर बड़ी बारीकी से कार्य किया। युगानुरूप मुख्य प्रवृत्ति के आधार पर नामकरण शुक्लजी की बड़ी देन है। भाषा का सम्बन्ध जितना समाज से है उतना साहित्य से भी है। अतः कृतियों का मूल्यांकन करते हुए आचार्य शुक्ल इनके मध्य संतुलन स्थापित करते हुए सामाजिक चेतना को सर्वोपरि रखते हैं। वे लिखते हैं -“प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।” शुक्ल जी के बाद तमाम विद्वानों ने अपनी-अपनी स्थापनाएं रखीं किंतु आचार्य की इस स्थापना के खंडन का साहस किसी में नहीं हुआ।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने “हिंदी साहित्य की भूमिका” लिखी जिसमें हिंदी साहित्य के इतिहास को एक नयी और व्यापक दृष्टि से देखा गया था। द्विवेदी जी ने रचनाओं का मूल्यांकन तथ्यपरक और वृहद् परिप्रेक्ष्य में किया था। इसके बाद रामकुमार वर्मा का “हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास”, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा का “हिंदी साहित्य का इतिहास” और डॉ. नगेन्द्र का “हिंदी साहित्य का इतिहास ;हिन्दी वाङ्गमय बीसवीं शती” जैसी कृतियों से साहित्येतिहास लेखन समृद्ध से समृद्धतर होता गया। वैचारिक-लेखन की रिक्तता की पूर्ति होती गई ।कालान्तर में हिंदी साहित्य के आधुनिक काल-विभाजन की समस्या सामने आई। आचार्य शुक्ल से लेकर रामस्वरूप चतुर्वेदी तक ने आधुनिक साहित्य का काल-निर्धारण 1840 से लेकर 1850 के मध्य माना और निर्धारित वर्ष भी बताया किन्तु पहली बार डॉ. रामविलास शर्मा ने “भारतीय साहित्य की भूमिका” में आधुनिक काल का प्रस्थानबिंदु 1857  बताया। यही नवजागरण काल था। 1857 की क्रांति एक सैनिक विद्रोह मात्र नहीं बल्कि इससे लोगों में “राष्ट्र-मुक्ति” और “समाज-मुक्ति” की आकांक्षा जागी थी । डॉ. रामविलास शर्मा ने पांच लेखकों (भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराली’) को आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया क्योंकि इन लेखकों की कृतियों में नवजागरण के तमाम बिंदु प्रभावशाली ढंग से मौजूद हैं।

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में स्त्री लेखिकाओं ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है। ये लेखिकाएं साहित्येतिहास लेखन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती हैं। इसीलिए सुमन राजे ने अपने “हिंदी साहित्य का आधा इतिहास” में महिला रचनाकारों को केंद्र में रखा। इनका मानना है कि प्रत्येक युग में स्त्री लेखन विपुल मात्रा में हुआ है, भले ही ये लेखन लोकगीतों के रूप में क्यों न हों ! इतिहास- लेखन में पुरुषवादी दृष्टिकोण हावी रहा है। वे लिखती हैं ,”यह पहली बार है कि लोकगीतों को महिला लेखन का साक्ष्य मानते हुए उसे इतिहास में दर्ज़ किया गया है, उसमें इतिहास तलाशा गया है और जन-इतिहास की खोज की गयी है । और यह भी पहली बार हुआ है कि महिला-लेखन का एक समूचा साँस लेता हुआ सौंदर्यशास्त्र भी हमें हासिल हुआ है। हिंदी साहित्य का आधा इतिहास महिला-लेखन के बने-बनाये पूर्वाग्रहों को तोड़ता है, सांचों को नकारता है, मिथकों को बदलता है और एक नये रचना-कर्म का आविष्कार करता है ।” हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में हिंदूवादी दृष्टि का आरोप भी लगता रहा है। चन्द्रगुप्त वेदालंकार अपने “हिंदी साहित्य का सही इतिहास” में यही आरोप लगाते हुए कहते हैं कि हिंदी साहित्य का इतिहास एक ‘ख़ास नज़रिए’ से लिखा गया है। मैंने अपने इतिहास लेखन में आद्यंत “बुद्धिज़्म” का ध्यान रखा है।

डॉ. मैनेजर पाण्डेय, रंजीत गुहा, रामचंद्र गुहा, गौतम भद्र, पार्थ चटर्जी, बद्रीनारायण, हितेन्द्र पटेल जैसे समकालीन साहित्य के इतिहासकारों ने हिंदी साहित्य को नए सिरे से लिखने की पहल की है। परिणामस्वरूप उन्होंने ऐसी कृतियों का सम्यक् मूल्यांकन किया है जिनमें आदिवासी समस्याओं को उभारा गया। ये लेखक ऐसी  रचनाओं को केंद्र में ला रहे हैं, जिनमें साम्प्रदायिकता का दंश, दलितों की वेदना और विश्वग्राम का भयावह चेहरा अपनी जगह बनाता है। इन्हीं साहित्येतिहास लेखकों में डॉ. श्रीभगवान तिवारी का नाम बड़ी तेजी से उभरता है। डॉ. तिवारी का “हिंदी साहित्य का इतिहास” सहस्राब्दि तक की कृतियों और रचनाकारों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करता है। यही दृष्टि लेखक को अन्य साहित्येतिहास लेखकों से अलग करती है। तिवारी जी पुस्तक की भूमिका में स्वीकार करते हैं, “साहित्य के इतिहास का सम्बन्ध अतीत की व्याख्या से होता है और प्रत्येक व्याख्या के मूल में इतिहास लेखक का दृष्टिकोण अनुस्यूत रहता है। एक साहित्य के इतिहास के लेखक के रूप में मेरा दृष्टिकोण मूलतः वैज्ञानिक है। सिद्धान्तों तथा प्रतिष्ठित नियमों को केंद्र में रखकर प्राप्त सामग्री की तथ्यपरक एवं बौद्धिक व्याख्या इस ग्रन्थ में सुस्पष्ट रूप से की गई है।”

इतिहास दर्शन के सम्बन्ध में डॉ. तिवारी ने पाश्चात्य और भारतीय इतिहासकारों की तुलना करते हुए बताया है कि जहाँ पाश्चात्य इतिहासकारों की दृष्टि वैज्ञानिक और यथार्थवादी रही है, वहीं भारतीय इतिहासकार आदर्शोन्मुखी रहे हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने हीगल, डार्विन, कार्लमार्क्स, ओस्वाल्ड स्पेंगलर, आर्नोल्ड जोसेफ टॉयनबी आदि का नाम बड़े आदर के साथ लिया है। यहां वे अध्यात्मवाद-भौतिकवाद और निवृत्तमार्ग-प्रवृत्तमार्ग जैसे दृष्टान्तों से इतिहास- दर्शन सम्बन्धी अनेकानेक प्रचलित धारणाओं को स्पष्ट करते हैं।

डॉ. तिवारी ने अपने “हिंदी साहित्य के इतिहास” में कालविभाजन और नामकरण के लिए पूर्व परिपाटी का ही अनुसरण किया है किंतु सबकी पूर्व पीठिका नितांत तथ्यपरक और वैज्ञानिक है। तिवारी जी ने पुस्तक को कुल चार खण्डों में विभाजित किया है। प्रथम खंड-आदिकाल, द्वितीय खंड -पूर्व मध्यकाल(भक्तिकाल), तृतीय खंड -उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) और चतुर्थ खंड  आधुनिक काल है। आधुनिक काल की पूर्व पीठिका में लेखक ने जहां आधुनिक काल का प्रारम्भ सन् 1850 में स्वीकार किया  है, वहीं वह आधुनिकता का प्रादुर्भाव सन् 1857 से मानता है।

डॉ. श्रीभगवान तिवारी का अध्ययन व्यापक और गहरा है । इसकी परिधि में ज्ञान-विज्ञान के सभी भारतीय स्रोत समाहित हैं । साहित्य के लिए दर्शन और इतिहास की अपरिहार्यता पर इस मनीषी चिंतक ने काफी बल दिया है । ये लिखते हैं, “दर्शन, इतिहास तथा साहित्य में गहरा सम्बन्ध होता है । यद्यपि इन अनुशासनों का विषय और क्षेत्र अलग-अलग होता है फिर भी दर्शन और इतिहास का समावेश साहित्य में अवश्य होता है । दर्शन विश्व को केवल समझता ही नहीं, समझाता भी है ।” डॉ. तिवारी का अध्ययन क्षेत्र मात्र भारतीय साहित्य ही नहीं बल्कि पाश्चात्य साहित्य और इतिहास भी  है । इन्होंने अंग्रेजी साहित्य के विभिन्न काव्यान्दोलनों का बारीकी से अध्ययन किया है । एज़रा पाउंड के बिंब और बिम्बवाद को बड़ी सूक्ष्मता से जांचा-परखा है । हिंदी साहित्य के आधुनिक इतिहास पर पाश्चात्य चिंतन, और साहित्य के प्रभाव को लेखक ने बड़ी सूक्ष्मता से उकेरा है । लेखक ने ‘आधुनिक’, ‘आधुनिकता’ और ‘आधुनिकतावाद’ के अंतर को स्पष्ट करते हुए लिखा है, “अंग्रेजी में किसी ‘विचार-निकाय’ की प्रतिष्ठा के लिए शब्दों के पश्चभाग में ‘ism’ लगाने की प्रथा है । अंग्रेजी के ‘ism’ शब्द का तात्पर्य हिंदी में ‘वाद’ है । जब किसी शब्द के पश्चभाग में ‘वाद’ शब्द जोड़ा जाता है तब वह आंदोलन का रूप धारण कर लेता है और इस प्रकार हिंदी और अंग्रेजी में अनेक आंदोलन चले हैं । अंग्रेजी में आधुनिक शब्द के तीन रूप हैं – Modern (आधुनिक), Modernity (आधुनिकता), Modernism (आधुनिकतावाद) । आधुनिक शब्द का प्रयोग विशेषण के रूप में होता है । जैसे – आधुनिक सभ्यता । आधुनिकता का तात्पर्य दृष्टि से है और आधुनिकतावाद का सम्बन्ध आंदोलन से है ।”

विवेच्य पुस्तक “हिंदी साहित्य का इतिहास” का चतुर्थ और अंतिम खंड “आधुनिक काल” है जिसका अंतिम सोपान “उत्तर आधुनिकतावाद-काल” सुनिश्चित किया गया । इसमें स्त्रीवाद, महानगरीय बोध, हिन्दू-मुस्लिम-एकता, मृत्युबोध जैसे गंभीर विषयों को प्रवृत्ति के रूप में दर्शाया गया है । गतिशील पूंजी के आकर्षक रूपों की विभीषिका पर केंद्रित पुस्तकों की तरफ लेखक ने इशारा किया है । शिल्प-प्रयोग और  भाषा की संरचना पर इतिहासकार आश्वस्त है । वैश्विक युग में विशुद्ध भाषा की अपेक्षा करना बेमानी है । भाषा प्रवाहित जल की तरह अपना स्वरूप बदलती है । पुस्तक में डॉ. तिवारी गंभीर से गंभीर दर्शन को जन की साधारण भाषा में व्यक्त करते हैं । पांडित्य प्रदर्शन लेस मात्र भी नहीं । यही कारण है कि इस पुस्तक के पाठकों की संख्या बढ़ती जा रही है।

डॉ. तिवारी का  666 पृष्ठों में सिमटा “हिंदी साहित्य का इतिहास” आकार में वृहद् तो है किंतु कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदुओं के लिए रिक्तता भी है । इस संदर्भ में लेखक की स्वीकारोक्ति है – “आपातकाल (1975) के बाद हिंदी साहित्य में एक नया मोड़ आता है और इस काल में आधुनिकतावादी प्रवृत्ति उत्तर आधुनिकतावाद के रूप में परिणत हो गई । “उत्तर आधुनिकतावाद” के अधिकांश लक्षण किसी न किसी रूप में आधुनिकतावाद में विद्यमान दिखाई पड़ते हैं । साहित्यिक घटना के रूप में “उत्तर आधुनिकतावाद” आधुनिकतावाद के बाद आया है और यह अभी उदीयमान अवस्था में है । इसमें स्थैर्य नहीं, नैरन्तर्य है ।” तिवारी जी की स्वीकारोक्ति तर्कसंगत है, क्योंकि समकालीन साहित्य संक्रमणकाल से गुज़र रहा है । विमर्शों के दौर में अभी कुछ स्पष्ट है । हाँ, साहित्य की तमाम विधाओं में समकालीन परिस्थितियां अपनी सुदीर्घ परंपरा और परिस्थितिजन्य रूपों में मौजूद अवश्य हैं । भूमण्डलीकरण में पूरी दुनिया एक गांव बन चुकी है । सूचनाओं का द्रुत रेला पल-पल मिल रहा है । इनके अलावा दूसरे देशों के  साहित्य-सृजन की खबरें सुनने और पढ़ने को मिल रही हैं ।

जुलाई-सितंबर, 2015 के अनुसार आज विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या 18 प्रतिशत है । वहीं दुनिया के दर्ज़नों विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य पर शोध कार्य हो रहा है । प्रवासी साहित्य अपने समाज और युगीन चेतना को बखूबी व्यक्त कर रहा है । अनंत का ‘लाल पसीना’, वेणीमाधव रामखेलावन का ‘और दीवार ढह गई’ और राम धुरन्धर का ‘पथरीला सोना’ जैसे उपन्यास काफी चर्चा में हैं । इन लेखकों के अलावा पुष्पिता अवस्थी और अनिल जनविजय जैसे दर्ज़नों समर्थ रचनाकार अपनी बेजोड़ कृतियों द्वारा हिंदी साहित्य को अधिक व्यापक और समृद्ध बना रहे हैं। कहने का निहितार्थ यह है कि आज ऐसे हिंदी साहित्य के इतिहास की आवश्यकता है जिनमें विश्व के कोने-कोने में बैठे लेखकों की कृतियों का मूल्यांकन हो सके। हम वहां के दर्शन, इतिहास, सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से परिचित हो सकें। यही बेचैनी  डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय की चर्चित पुस्तक ‘हिंदी का विश्व संदर्भ” में भी देखने को मिलती है। डॉ. उपाध्याय लिखते हैं, “अब हमें साहित्य में चल रहे विविध विमर्शों मसलन स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, साम्प्रदायिकता विमर्श तथा उत्तर आधुनिक विमर्श को ही अपने साहित्येतिहास में स्थान नहीं देना है अपितु देश के बाहर मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, ट्रिनिडाड, गयाना, संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, कनाडा, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, हंगरी, बुल्गारिया, रोमानिया, मध्य एशियाई देशों, इजराइल, खाड़ी देशों, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्ला देश, चीन, जापान तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य का अतिशय सावधानी से संकलन करना होगा । उनका सम्यक् विश्लेषण करते हुए गुण, सूचना, आवश्यक संदर्भ बदलते समय को चिन्हित करने वाले प्रयास आदि के आधार पर हिंदी साहित्य के इतिहास में उन्हें यथोचित स्थान देना होगा ।”

निष्कर्षतः डॉ. श्रीभगवान तिवारी उत्तर आधुनिकतावाद में “नैरन्तर्य” शब्द देकर अनंत सम्भावनाओं का द्वार खोल देते हैं । डॉ. तिवारी की यही विशेषता उनके “हिंदी साहित्य के इतिहास” में आद्यंत है, चाहे वह चिंतन की हो अथवा शिल्प की । सबमें उन्मुक्तता है, कहीं कोई बंधन नहीं, निषेध नहीं । मुझे विश्वास है कि आचार्य शुक्ल की तरह  डॉ. श्रीभगवान तिवारी की यह कृति भविष्य के साहित्येतिहास लेखकों के लिए प्रकाश स्तंभ बनेगी और इससे समूचा हिंदी जगत लाभान्वित होगा।

अस्तु।