28 C
Mumbai
Thursday, August 13, 2026
Home Blog Page 1027

महिला विश्वकपः कप्तान ने कहा-सेमीफाइनल का खिताब जीतना लक्ष्य

कोमल झा| Navpravah.com

इंग्लैंड और वेल्स में 24 जून से शुरू हो रहे महिला विश्वकप से पहले भारतीय टीम की कप्तान मिताली राज ने कहा है कि भारतीय टीम का पहला लक्ष्य सेमीफाइनल में पहुंचना होगा। उन्होंने पिछले महीने दक्षिण अफ्रीका में हुई चतुष्कोणिय सीरीज को बेहद अहम बताया और कहा कि टीम उसी प्रदर्शन को विश्व कप में भी जारी रखना चाहेगी।

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) की वेबसाइट के मुतबिक मिताली का कहना है कि “हमारा पहला लक्ष्य सेमीफाइनल में पहुंचने का होगा, लेकिन इसके लिए टीम को अच्छी क्रिकेट खेलने और अच्छी लय हासिल करने की जरूरत है।”

मिताली की मानना है कि भारतीय टीम दक्षिण अफ्रीका में किए गए अपने प्रदर्शन को इंग्लैंड में जारी रखेगी। हालांकि मिताली का मानना है कि इंग्लैंड में दक्षिण अफ्रीका से परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। कुल मिलाकर टीम को यहां नई शुरूआत करनी होगी। पढ़ेंः- महिला विश्वकप का इतिहास मिताली ने कहा- “विश्व कप बड़ा मंच है। इसके लिए चार साल से तैयारी करनी होती है। यह मेरा चौथा विश्व कप होगा। मैं अच्छा प्रदर्शन करना चाहूंगी।” आपको बता दें कि एक महीने तक चलने वाले इस टूर्नामेंट में आठ टीमें भाग लेंगी। टूर्नामेंट का फाइनल 23 जुलाई को लॉर्ड्स में होगा।

न्यूयॉर्क में अब शादी के लिए चाहिए 17 साल की उम्र

कोमल झा| Navpravah.com

अमेरिका के शहर न्यूयॉर्क में अब शादी करने के लिए कम से कम 17 साल की आयु होनी जरुरी है और 17 साल की उम्र में शादी करने के इच्छुक किशारों को अपने अपने माता पिता एवं न्यायाधीश से मंजूरी लेना आवश्यक होगा।

जी हाँ , अमेरिका में चौथे सर्वाधिक आबादी वाले राज्य न्यूयॉर्क में पहले 14 वर्ष में शादी कर सकते थे पर अब 14 वर्ष से कम की उम्र में शादी को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया है और पुराने कानून में संशोधन किया है।

डेमोक्रेट सदस्य गवर्नर एंड्रयू क्यूमो ने बताया है कि बच्चों की सुरक्षा एवं उनके जबरन विवाह को रोकने की दिशा में यह हमारा एक बड़ा प्रयास है और न्यूयॉर्क में बाल विवाह को खत्म करने वाले ऐसे कानून पर हस्ताक्षर करना मेरे लिये गौरव की बात है। कानून के तहत 17 वर्ष से नीचे के किशोरों के विवाह पर अब प्रतिबंध है।

अगर 17 साल की उम्र का कोई भी किशोर विवाह का इच्छुक है तो न्यायाधीशों को यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि यह शादी उसकी इच्छा के खिलाफ नहीं की जा रही है और इस शादी से उनकी मानसिक स्थिति, भावनात्मक या शारीरिक सेहत खतरे में नहीं पड़ेगी।

राजनीतिक अखाड़े में, ‘दलित’ दावपेंच’

Patna: Bihar Governor Ram Nath Kovind, NDA's presidential candidate, waves at the media as he leaves for Delhi, at Raj Bhavan in Patna on Monday. PTI Photo (PTI6_19_2017_000138B)

जटाशंकर पाण्डेय । Navpravah.com

लंबे इंतजार के बाद जब भारतीय जनता पार्टी ने अंततः अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित कर दिया है, तो अब उसपर नया विवाद शुरू हो गया। अत्यंत खोज बीन के बाद चुने गए राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का दलित होना, पलक झपकते ही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर महामारी से भी तेज़ गति से फैल गया। इससे पहले अधिकतर लोगों ने कभी उनका नाम भी न सुना होगा। यदि आप भी उनके भूतकाल से अपरिचित हैं, तो आपको बता दें कि माननीय कोविंद जी भारतीय जनता पार्टी के स्वच्छ छवि वाले एक नेता हैं। कोविंद राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं। गौर करने वाली बात यह है कि कोविंद राष्ट्रपति उम्मीदवार चुने जाने से पूर्व तक बिहार के राज्यपाल भी थे, पर तब किसी ने इस बात पर गौर क्यों नहीं किया था कि वे दलित हैं!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोविंद को राष्ट्रपति प्रत्याशी घोषित किए जाने पर पूरा देश चौक गया क्योंकि किसी को भी इसकी उम्मीद नहीं थी। उनके ऊपर किसी ‘आम-खास’ आदमी की नज़र ही नहीं थी। वैसे रामनाथ कोविंद एक साफ सुथरी छवि वाले राजनेता हैं। अपने राजनीतिक करिअर में उन्होंने कहीं से भी दाग नहीं लगने दिए हैं। अच्छे विचार और स्वच्छ राजनितिक करिअर के कारण इनका समर्थन भी कई पार्टियाँ कर रही हैं। समर्थनकर्ताओं में यदि गिनें तो राम विलास पासवान, नितीश कुमार, मायावती, मुलायम सिंह ने भी अपना समर्थन देने की बात कही है। उद्धव ठाकरे द्वारा पहले भाजपा का समर्थन न करने की बात सामने आई थी, क्योंकि उनकी नज़र में कोविंद के रूप में मोदी अपना ‘दलित’ वोट साध रहे थे। फिर अचानक पासा पलटा और शिवसेना द्वारा समर्थन की बात भी आ गई!

कांग्रेस ने कोविंद की टक्कर में पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को अपना प्रत्याशी बनाया है। उनके खेमे में भी ‘दलित’ मुद्दा गरमाया हुआ है। कई अन्य पार्टियाँ भी ‘दलित’ राजनीति की अंगीठी पर अपनी रोटियां सेंकती नज़र आ रही हैं। सभी टी वी चैनल, समाचार पत्रों को मसाला मिल गया है। लोग अपने अपने ढंग से शब्दों को पकड़ कर, तोड़ मरोड़ कर, उसका अर्थ ,भाव सब बदल बदलकर, थोड़ा मसाला वगैरह मिला कर जनता के सामने परोस रहे हैं। राजनीति एक ऐसी बला है कि इससे अछूते बहुत कम लोग हैं।

इस पूरे मामले में ध्यान देने लायक एक मजेदार बात है। जनता इस बात पर विशेष रूप से गौर करे कि जितने भी राजनितिक लोग हैं, उनमें से भी ज्यादातर लोगों ने,अधिकतर न्यूज़ चैनल वालों ने और समाचार पत्र वालों ने श्री राम नाथ कोविन्द को जगह-जगह दलित कह कर ही पुकारा है। रामविलास पासवान, मायावती नीतीश कुमार आदि अदि तमाम लोगो को ख़ुशी इस बात की है कि भाजपा ने किसी दलित को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार चुना है। अब यहाँ पर ‘दलित’ शब्द कोई उच्च सम्माननीय पदवी जैसा जान पड़ रहा है। परंतु मेरे विचार से ‘दलित’ शब्द किसी समय में ऐसे लोगों के लिए प्रयोग किया गया था, जो निचली जाति के लोग थे, उच्च जातियों द्वारा सताए गए थे, जिनको दो वक्त की रोटी सुलभ नहीं थी, तन पर कपड़े नहीं थे, साबुन का नाम कभी सुना नहीं था, दिन रात मेहनत करने पर भी जिनकी आँखे हमेशा नम ही रहती थीं। उनके मासूम बच्चे रूखी सूखी खा कर कही पेंड के नीचे अछूत बने पड़े रहते थे। ऐसे दीन दुखी लोगों को ‘दलित’ कहा गया था।

हिंदी के शब्दों को अगर मन से गुना जाए, तो शब्द दिल को छूते हुए भाव को महसूस कराते हैं। ‘दलित’ शब्द का अर्थ ही है अभाव में जी रहा व्यक्ति, समाज द्वारा कुचला हुआ, तिरस्कृत व्यक्ति। आज बड़े-बड़े गाड़ी बंगले वाले ‘दलित’ कहलाते हैं, जबकि ये मात्र राजनितिक ‘दलित’ हैं। वास्तव में ये पूर्णतः ‘फलित’ हैं। एक सामान्य आदमी को अगर ‘दलित’ कह दिया जाए, तो वह खून-खराबे को तैयार हो जाएगा, लेकिन राजनितिक मामले में किसी भी महान को, किसी भी धनवान,किसी भी बलवान को अगर दलित कहा जाए, तो वह सर झुका कर स्वीकार भले कर ले मंच पर, लेकिन उसके दिल में चुभेगा अवश्य। क्या कोविंद को उनकी उपलब्धियों की बजाय ‘दलित’ शब्द से पहचान पाना रास आया होगा? क्या किसी भी राजनीतिक दल को, किसी भी न्यूज़ चैनल को, किसी भी समाचारपत्र को यह अधिकार था कि वह एक सफल, उन्नत, प्रतिभावान व्यक्तित्त्व को उसकी प्रतिभा की बजाय, इस वजह से प्रसिद्ध कर दे, क्योंकि वे दलित हैं? क्या राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की उनकी योग्यता को उजागर करने से अधिक महत्त्वपूर्ण उनके दलित होने को उजागर करना था? इक बुद्धिजीवी व्यक्ति के लिए इनमें से प्रत्येक प्रश्न का उत्तर निश्चित ही ‘नहीं’ होगा।

किंग ख़ान ने ख़रीदी दक्षिण अफ्रीका की टी-20 टीम

कोमल झा| Navpravah.com

आईपीएल की दो टीमों के मालिक, जीएमआर और बॉलीवुड स्टार शाहरुख खान ने क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका, सीएसए की आठ टीमों की टी-20 ग्लोबल लीग में फ्रेंचाइजी खरीदी हैं जिसका आयोजन नवंबर-दिसंबर में होगा।

लोकप्रिय इंडियन प्रीमियर लीग में जीएमआर की दिल्ली डेयरडेविल्स टीम है जबकि शाहरुख खान कोलकाता नाइटराइडर्स के सहमालिक हैं। जीएमआर की टीम का बेस जोहानिसबर्ग में होगा।

जिसमें दक्षिण अफ्रीका के युवा तेज गेंदबाज कागिसो रबाडा मार्की खिलाड़ी होंगे जबकि शाहरूख खान की टीम का बेस केप टाउन होगा जिसके मार्की खिलाड़ी बायें हाथ के बल्लेबाज जेपी डुमिनी होंगे।

शाहरूख खान ने कहा कि कोलकाता नाइटराइडर्स की ओर से क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका को इस नई टी-20 ग्लोबल लीग को पेश करने के लिए बधाई देता हूं। हम खुश और शुक्रगुज़ार हैं कि आपने नाइटराइडर्स को इस नई लीग का हिस्सा बनाया।

कोलकाता नाइटराइडर्स के प्रबंध निदेशक वेंकी मैसूर ने कहा कि हम नाइटराइडर्स ब्रॉन्ड को पूरी दुनिया में बढ़ावा देना चाहते हैं और टी-20 ग्लोबल लीग में एक टीम खरीदना इसी का हिस्सा हैं। प्लेयर ड्राफ्ट 19 अगस्त को होगा जिसमें 10 देशों के करीब 400 खिलाड़ियों ने दिलचस्पी दिखाई है|

कोलकाता हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस सीएस कर्णन कोयम्बतूर से गिरफ़्तार

विकास कुमार तिवारी । Navpravah.com
कलकत्ता हाइकोर्ट में रहे जज और सुप्रीम कोर्ट के अवमानना में दोषी पाए गए सीएस कर्णन को तमिलनाडु से गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गिरफ्तार किया गया | कर्णन की गिरफ्तारी की पुष्टि उनके वकील पीटर रमेश ने की है। जस्टिस कर्णन को तमिलनाडु के कोयम्बटूर से गिरफ्तार किया गया है। कर्णन को भारत के मुख्य न्यायाधीश समेत शीर्ष न्यायालय के कई  न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के मामले में अवमानना का दोषी ठहराया गया है।
आपको बता दे, न्यायधीश कर्णन ने 20 पद पर काबिज सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था|  साथ ही इस संबंध में उन्होंने एक शिकायत भी सीबीआई से की थी। कर्णन ने सीबीआई को इस शिकायत की जांच करने का आदेश भी दिया था और जस्टिस कर्णन ने सीबीआई को निर्देश देते हुए इस जांच की रिपोर्ट संसद को सौंपने के लिए कहा था पर  मामला तब बिगड़ा जब इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए CJI ने इसे अदालत की अमनानना बताया था। इसके बाद 7 जजों की एक खंडपीठ का गठन किया गया, जिसने जज कर्णन के खिलाफ कोर्ट के आदेश की अवमानना से जुड़ी कार्रवाई शुरू की।
23 जनवरी  को जस्टिस कर्णन ने पीएम मोदी को भी खुला पत्र लिखा। इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 20 जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था और 8 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उनसे उनकी न्यायिक शक्तियां छीन ली थी|
बता दे कि, सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई को जस्टिस कर्णन को 6 महीने की सजा सुनाई थी, इसके बाद जस्टिस कर्णन फरार चल रहे थे | गिरफ्तार करने के बाद तमिलनाडु पुलिस उन्हें चेन्नई लेकर गई है।बता दें कि चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली सात जजों की एक बेंच ने जस्टिस कर्णन को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का दोषी पाया था| जिस पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट में कई बार हाज़िर होने के लिए भी कहा गया था, पर वह अभी तक प्रशासन को चकमा देकर फरार चल रहे थे|
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च को उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वॉरंट जारी किया। 9 मई को सुप्रीम कोर्ट ने कर्णन को अवमानना का दोषी ठहराते हुए 6 महीने जेल की सजा सुनाई।
गौरवतलब है कि इस तरह पहली बार हुआ, जब किसी पद पर बैठे हाई कोर्ट के जज को सुप्रीम कोर्ट ने मानहानि के मामले में जेल की सजा दी हो । जस्टिस कर्णन इसी महीने 12 जून को अपने पद से रिटायर हुए हैं |
 
 
 
 

पृथ्वी जैसे आकार वाले 10 नए उपग्रहों का नासा ने लगाया पता, जानें उपग्रहों के बारें में…

कोमल झा| Navpravah.com

नासा ने सोमवार को 10 नए पृथ्वी के आकार वाले ग्रहों का पता लगाया है. ये दस नए ग्रह सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा के समान दूरी पर सूर्य की परिक्रमा करते हैं.

नासा के अनुसार, केपलर ने अब तक ऐसे 4,034 खगोलीय पिंडों खोज निकाला है, जो ग्रह कहलाने की दावेदारी रखते हैं. इनमें से 2,335 पिंड हमारे सौर मंडल के बाहर हैं। केपलर ने अभी तक पृथ्वी के आकार के बराबर और जीवन की संभावना से भरे जिन संभावित ग्रहों को खोजा है, उनमें से 30 की तो पुष्टि भी हो चुकी है.

केपलर अनुसंधान वैज्ञानिक सुसान थॉम्पसन और नवीनतम अध्ययन के प्रमुख लेखक ने कहा, कि “यह सावधानीपूर्वक मापा जाने वाला कैटलॉग, खगोलशास्त्र के सबसे अधिक जटिल प्रश्नों का उत्तर है, कि हमारे पृथ्वी की तरह कितने ग्रह आकाशगंगा में हैं.

कैलिफ़ोर्निया में नासा के एम्स के अनुसंधान केंद्र में इस सप्ताह आयोजित होने वाले चौथे केपलर और k2 विज्ञान सम्मेलन में नवीनतम निष्कर्ष जारी किए गए थे. केप्लर टेलीस्कोप ग्रहों की उपस्थिति का पता लगाता है जो एक तारे की चमक में कम बूंदें दर्ज करता है, ऐसा तब होता है कि जब एक ग्रह उसके सामने जाता है.

नासा ने कहा कि ये अब तक की ग्रहों की नवीनतम सूची का सबसे संपूर्ण और विस्तृत सर्वेक्षण है, जो अब तक कम्पाइल नहीं हैं. एक सर्वेक्षण जो नासा ने कहा कि अब पूरा हो गया है, उसमें टेलीस्कोप ने सिग्नस नक्षत्र में 150,000 सितारों का अध्ययन किया है.

द मिशन 2013 में तकनीकी समस्याओं में भाग गया, जब अंतरिक्ष यान को चालू करने के लिए इस्तेमाल होने वाले यंत्र विफल हो गए थे, लेकिन दूरबीन ने अपने k2 परियोजना के हिस्से के रूप में ग्रहों की खोज जारी रखी है.

सौर मंडल के बाहर जीवन के संकेतों की तलाश में जुटे SETI संस्थान की एक वैज्ञानिक सुसेन थॉम्पसन ने बताया, ‘NASA द्वारा बेहद सचेत रहकर तैयार की गई यह लिस्ट खगोलशास्त्र के एक सबसे बड़े सवाल से सीधे-सीधे जुड़ी है। और वह सवाल है कि ब्रह्मांड में हमारी धरती जैसे कितने ग्रह हैं.

मीरा-भायंदर महानगरपालिका चुनाव: भाइंदर संघर्ष मोर्चा का गठन सियासी चाल या लॉलीपॉप

सिरीज़ 1-

ब्यूरो | Navpravah.com

राजनीति में एक कहावत है कि “न कोई बेवफा होता है न कोई बावफ़ा होता है ये सियासत का खेल है यहाँ केवल नफा होता है।” अगर बात मीरा भायंदर महानगरपालिका चुनाव की करें तो ये कहावत सच होती नजर आ रही है। मीरा भायंदर के वर्तमान विधायक नरेंद्र मेहता और भूतपूर्व आयुक्त शिवमूर्ति नाइक के कभी दोस्ती के किस्से गाये जाते थे और वही आज दोनों एक दूसरे के खिलाफ नजर आ रहे हैं। कहा जाता है कि शिवमूर्ति का राजनीति में पदार्पण नरेंद्र मेहता ने ही करवाया था और उन्हें बीजेपी में लेकर आये थे। शिवमूर्ति नाइक एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति है और शायद मेहता उनकी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं कर पाए और इसी से नाराज होकर नाइक ने अपने मीरा भाईन्दर संघर्ष मोर्चा का गठन किया है।

नाइक बीजेपी से नाराज लोगो को “महाराज” बनाने का दावा कर रहे हैं और इस कड़ी में बीजेपी से नाराज कई नेता उनके साथ जुड़ भी चुके हैं। जब हमने शिवमूर्ति नाइक से इस विषय में पूछा, तो उन्होंने इस बात की पुष्टि की। मीरा भाईन्दर संघर्ष मोर्चा के सचिव और तेजतर्रार नेता मिलन म्हात्रे से जब हमने बात की तो उन्होंने कहा कि “हम मीरा-भायंदर में भाजपा के भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ एकत्रित हुए हैं और आने वाले वक़्त में हमसे और भी लोग जुड़ेंगे। मीरा भाईन्दर संघर्ष मोर्चा सभी ९५ सीटों पर उमीदवार उतारने का दावा कर रही है।

लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस मोर्चा मोर्चे को शक की निगाहो से देख रहे है। मीरा-भाईन्दर के एक भूतपूर्व नगरसेवक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ये मोर्चा बीजेपी से बगावत करने वालो लोगो के लिए एक लॉलीपॉप है। उनके अनुसार नरेंद्र मेहता एक मझे हुए राजनीतिज्ञ है और वो जानते है की बीजेपी में इस समय एक अनार सौ बीमार की स्थिति है, और जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा, वो लोग पार्टी से बगावत करेंगे। इसीलिए मेहता ने नाइक के माध्यम से डमी मोर्चा का गठन किया है, ताकी नाराज लोग मोर्चे में जाए और अगर जीतकर आते हैं तो सत्ता में आने के लिए इनका इस्तेमाल किया जा सके।

जब इस बारे में हमने राजनीतिक जानकार और मीरा-भायन्दर की राजनीति की समझ रखने वाले प्रोफेसर दुर्गेश कुमार से पूछा तो उन्होंने बताया कि इस वक़्त मीरा भायंदर की राजनीति नरेंद्र मेहता के इर्द गिर्द घूमती है और पिछले १० सालों में नरेंद्र मेहता में अपनी सियासी समझ और सूझबूझ के दम पर ये मुकाम हासिल किया है, तो इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये मोर्चा मेहता की रणनीति का ही एक हिस्सा हो। और नरेंद्र मेहता को कम आंकना एक सियासी भूल हो सकता है।

कुल मिलाकर ये मोर्चा मीरा भाइंदर की राजनीति में एक नयी क्रांति की बात करता है और बीजेपी से नाराज लोगों को महाराज बनाने का दावा करता है। लेकिन अगर ये मोर्चा नरेंद्र मेहता की सियासी चाल हुई तो ये बीजेपी से आये लोगो के साथ-साथ जनता के साथ भी विश्वासघात होगा।

योग दिवस पर आतंकी हमले का अलर्ट, PM के दौरे से पहले लखनऊ में छापे

सौम्या केसरवानी । Navpravah.com
योग दिवस पर आतंकी हमले के मद्देनजर हाई अलर्ट जारी किया गया है। दिल्ली, यूपी, बिहार, हरियाणा और गुजरात के कई प्रमुख शहर आतंकियों के निशाने पर है। लखनऊ में योग दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रोग्राम आयोजित किया गया है, इसके मद्देनजर यूपी पुलिस ने कई जगह छापेमारी की है और संदिग्ध लोगों की गिरफ्तारी की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार योग दिवस पर लखनऊ में पीएम मोदी के कार्यक्रम को भी आतंकी निशाना बना सकते हैं, इसलिए पीएम के कार्यक्रम को लेकर राज्य की सुरक्षा एजेंसियां सतर्कता बरत रही हैं।
अलर्ट जारी करते हुए बताया गया है कि आतंकी ‘लोन वुल्फ’ अटैक भी कर सकते हैं। आतंकी दस्ते में आत्मघाती महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। इनका लक्ष्य कश्मीर में सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई का बदला लेना है। केंद्रीय खुफिया एजेंसी ने हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में आतंकी हमलों का अलर्ट जारी किया है।
‘लोन वुल्फ’ अटैक का मतलब ऐसा घातक हमला, जिसे बिना टीम के अंजाम दिया जाता है। इस हमले के मॉड्यूल में अकेला आतंकी ही ऐसे हमले को अंजाम दे सकता है। इस अटैक मे वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपना शिकार बना सकता है।
‘लोन वुल्फ’ अटैक का जिक्र खूंखार आतंकी संगठन ISIS की एक मैगजीन में है। ऐसे हमले में किसी अकेले आतंकी के काम करने का पता लगाना काफी मुश्किल होता है, ये हमले काफी कम खर्च में अंजाम दिए जाते हैं।
आज शाम 4:50 तक पीएम नरेंद्र मोदी लखनऊ एयरपोर्ट पर पहुंचेंगे। उनकी सुरक्षा में 26 एसपी, 51 एएसपी, 137 सीओ, 224 इंस्पेक्टर, 992 एसआई, 163 महिला एसआई होगी, इसके अलावा 295 हेड कांस्टेबल, 3700 कांस्टेबल, 480 महिला कांस्टेबल, 12 ट्रैफिक इंस्पेक्टर, 497 कांस्टेबल ट्रैफिक और 25 कंपनी पीएसी तैनात की जाएगी।
बीते दिनों यूपी की सीएम योगी आदित्यनाथ के काफिले पर हुए हमला हुआ था, इसलिए पीएम मोदी की सुरक्षा में कोई चूक न हो, इसके लिए यूपी पुलिस ने कमर कस ली है।

“पाठा : एक ऐसा क्षेत्र जहाँ डाकुओं को सरंक्षण देते है यहाँ के सफेदपोश ! लेकिन पीटे जाते हैं निर्दोष ग्रामीण”


रिपोर्ट – अनुज हनुमत 
Navpravah.com
अब ये बुन्देलखण्ड क्षेत्र को प्राप्त वरदान कहिये या अभिशाप की यहाँ हमेशा से अगर कोई  ज्यादा चर्चा में रहा है तो वो दो शख्स हैं – एक यहाँ का बेबस और लाचार किसान और दूसरा दशकों से खरपतवार की तरह उपज रहे डकैत । इन दोनों की आड़ पर जमकर राजनीति की जाती रही है और शायद यही कारण है कि न तो यहाँ के किसानों की जिंदगी बदली और न ही यहां से डकैतों का पूर्ण रूप से सफाया हुआ । इन दिनों बुन्देलखण्ड किसानों की बदहाल स्थिति के लिए खबरों में नही है बल्कि डकैतो के आतंक , सियासी जुगलबंदी और पुलिसिया कार्यवाही के लिए चर्चा में है ।
योगी सरकार के आते ही लोगो को लगा की अब दस्यु समस्या का खात्मा होगा लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि अभी और इन्तजार करना पड़ेगा ! पिछले एक महीने से पुलिस की कार्यवाही भी तेज हुई । खासकर चित्रकूट जिले के उन तमाम क्षेत्रो में जहाँ दस्युओं की ज्यादा समस्या है । महीने भर में डकैतो के खिलाफ कई बड़ी कार्यवाही की गई । कई बार मुठभेड़ भी हुई । लेकिन हालिया एक घटना ने इस दस्यु उन्मूलन में सियासी अड़चन के साथ पुलिसिया कार्यवाही को भी सिर्फ इसलिए सन्देह के घेरे में ला दिया है क्योंकि उसमें भी सियासत के हुक्मरानों को वोटबैंक की बू आ रही है । सही पूछें तो दस्यु इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए आगे कुआं है और पीछे खाईं जैसी हालत है । डकैतो को सरंक्षण नही देते तो समस्या और अगर दे दिया तो भी समस्या ।
पिछले चार दशक के लंबे समय में दस्यु ददुआ से लेकर ठोकिया और बबली कोल तक के मौजूदा समय में चुनाव के दौरान इन दस्युओं से सियासत के जुड़ाव की खबरें आती रही हैं ! चाहे वो समाजवादी पार्टी का शासनकाल रहा हो या बहुजन समाज पार्टी का या भाजपा या कांग्रेस का । इन सभी पार्टियों से जुड़े बड़े बड़े नेताओं का दस्यु कनेक्शन समय समय पर गाहे बगाहे सामने आता रहा है । खासतौर पर चुनाव के समय सबसे ज्यादा । ऐसे में आप इनके उन्मूलन की कप्लना कैसे कर सकते हैं । कुछ लोगो का तो यहाँ तक कहना है कि इनमे से अधिकांश दस्युओं की उपज सत्ता के संघर्ष का परिणाम है । यहाँ चुनाव के दौरान मूद्दे केंद्र में नही होते बल्कि झूठ , फरेब और दलबल ही काम आता है । जानकारों का तो यहाँ तक कहना है कि अगर किसी दस्यु गैंग का सफाया होता भी है तो वह उसका सियासी उम्र पूरी होने का नतीजा है न की सरकार की कोई बड़ी कार्यवाही ।
बहरहाल योगी सरकार के स्पष्ट आदेश हैं कि डकैतो के खिलाफ कार्यवाही में कोई भी दबाव पुलिस न महसूस करे और जल्द से जल्द उनका सफाया करे । लेकिन सबसे अहम प्रश्न ये है कि क्षेत्रीय स्तर पर प्रशासन के ऊपर सफेदपोशो द्वारा दस्यु उन्मूलन की कार्यवाही के नाम पर बनाये जाने वाले दबाव को ,कोई भी सरकार कैसे रोक सकती है ! बीते दिनों ऐसा ही एक मामला पाठा क्षेत्र से सामने आया था । जिसने देखते ही देखते प्रशासन और सियासत के हुक्मरानों को एक ही कठघरे में आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है ! जीत किसी की हो लेकिन हर आम जनमानस की ही होगी ।
आपको बता दें कि दिन रात डकैतों को पकड़ने के लिए जंगलो में खाक छानने वाली पुलिस की कार्यवाही पर तो गाहे बगाहे हमेशा ही प्रश्न चिह् लगे हैं लेकिन क्या हमेशा सन्देह करना उचित है ? ध्यान देने वाली बात यह है कि आखिर उन ग्रामीणों का क्या होगा जो इस सियासत ,प्रशासन और दस्युओं के बीच पिस जाती है । ग्राउंड जीरो पर जाकर जब हमने तहकीकात की तो पता लगा की इन तमाम दस्यु प्रभावित इलाकों में अगर ग्रामीण अपने गाँव घर में डकैतों को सरंक्षण नही देते हैं तो यही डकैत उनकी बेरहमी से पिटाई करते हैं और इसके बाद अगर गलती और दबाव के चलते सरंक्षण दे भी दिया तो पुलिसिया डण्डा कब चल जाये पता नही ।
 इन दोनों स्थितियो के बीच सियासी हुक्मरानों की जुगलबंदी भी देखने लायक होती है । विषय के तह तक न जाकर सिर्फ सतही तौर पर सियासी ड्रामा रच दिया जाता है । ग्रामीणों की स्थिति वैसी ही रहती है और पुलिसिया कार्यवाही भी उसी प्रकार दशकों से सन्देह के घेरे में रही आती है । विश्वस्त सूत्रों की मानें तो सबसे बड़ी बात ये है कि राजनीतिक सह मात के खेल में इन्ही डकैतों का प्रयोग चुनाव के दौरान किया जाता है लेकिन उस समय चारो ओर सन्नाटा पसर जाता है । लेकिन जैसे ही सत्ता में वापसी होती है वैसे ही इन्ही डकैतों के उन्मूलन की बात छेड़ दी जाती है । अब भला आप ही सोंचिये की कोई खुद के ही स्थापित अस्ति्त्व के आधारभूत ढांचे को कैसे गिरा सकता है !
 लगभग चार दशक तक पाठा समेत आस पास के क्षेत्रो में अपनी बादशाहत कायम रखने वाले खौफ के पर्याय दस्यु सम्राट ददुआ से ठोकिया और बलखड़िया तक इन सभी दस्युओं के साथ सियासत के न जाने कितने चेहरों की जुगलबंदी देखी गई ! कभी लखनऊ और दिल्ली की मंजिल तक पहुचाने वाले रास्ते पाठा के इन्ही बीहड़ो से होकर जाया करते थे । जिसकी आहट आज तक सुनाई देती है ।
मजे की बात तो ये है कि बसपा और सपा शासनकाल में मंत्री , सांसद और विधायक रहे कई सफेदपोश नेताओ पर पूर्व में आसपास के कई थानों में आज भी दस्यु गैंगों से संपर्क रखने के कारण केस दर्ज है । अब आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि इस समूचे पाठा क्षेत्र में इन तमाम दस्यु गैंगों से सियासत के सफेदपोशों का जुड़ाव आम लोगो के लिए कितना परेशानी का सबब बनता होगा । यही सफेदपोश इस खौफ के आतंक के सरक्षणदाता , मददगार होते हैं और पीटी जाती है निर्दोष जनता । चुनाव के बाद समस्याएं भी खत्म नही होती हैं और ऊपर से गाहे बगाहे इन डकैतो द्वारा बेरहमी से पिटाई कर दी जाती है । ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि पाठा वासी जाएं तो कहाँ जाये ? यहाँ के दस्यु प्रभावित गांव के ग्रामीणों की जिंदगी आगे कुआं पीछे खाईं जैसी स्थिति की द्योतक है । इस समस्या को खत्म करना मौजूदा योगी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी !

फ़िल्म ‘इन्दु सरकार’ के लिए भंडारकर को गांधी परिवार से NOC लेने की ज़रूरत नहीं -पहलाज निहलानी

विकास कुमार तिवारी । Navpravah.com

पिछले कुछ समय से बॉलीवुड को संस्कारी बनाने में लगे सेंसर बोर्ड के अध्‍यक्ष पहलाज निहलानी ने अपकमिंग फ़िल्म  ‘इन्दु सरकार ‘ को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा है कि
‘इन्दु सरकार’ को कांग्रेस या गांधी परिवार में किसी से एनओसी लेने की जरूरत नहीं है।

पहलाज निहलानी ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से कहा, मैंने मधुर के ट्रेलर को देखा और मैं उन्हें भारतीय राजनीति के सबसे शर्मनाक अध्यायों में से पर्दा हटाने के लिए बधाई देना चाहता हूं। यह पुरी दुनिया में देश को शर्मसार करने वाला समय था। बहुत से बड़े नेताओं को इस दौरान जेल जाना पड़ा। भारतीय लोगों के मनोबल को कुचला गया था।

पहलाज निहलानी के इस टिप्पणी से इमर्जेंसी की पृष्‍ठभूमि पर फिल्‍म बना चुके निर्माता मधुर भंडारकर काफी सुकून में हैं। यूं तो पहलाज निहलानी अक्‍सर फिल्‍म मेकर्स को एनओसी लेने को कहते हैं, लेकिन उनके इस उदार व्‍यवहार से सब चकित है कि उनका इतना उदार व्यवहार क्यों है?

आपको बता दे कि वास्तविक घटनाओं और परिस्थितियों पर बनने वाली फिल्मों को संबंधित लोगों से एनओसी लिए बिना पास नहीं किए जाने का नियम सेंसर बोर्ड का ही है। जब यह नियम का प्रश्न पहलाज निहलानी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ‘इंदु सरकार किसी का नाम नहीं है। इंदिरा गांधी या संजय गांधी या किसी और का ट्रेलर में कोई जिक्र नहीं है।आप केवल शारीरिक समानता की वजह से फिल्म में उन लोगों के उल्लेख का अनुमान लगा रहे हैं। मैंने ट्रेलर में किसी के नाम का जिक्र नहीं सुना। अगर फिल्म में उनका उल्लेख किया गया है, तो हम देखेंगे। फिलहाल, मुझे खुशी है कि किसी ने इमर्जेंसी पर एक फिल्म बनाई है। यह हमारे राजनीतिक इतिहास में ‘काला धब्बा’ है’।

यह टिप्पणी इसलिए भी चौंकाने वाला है, क्योंकि पहलाज अक्सर कानून नियमों और संस्कार का हवाला देकर फिल्मों को बैन और सीन कटवाते रहते है। हाल ही में महिलाओं पर केंद्रित फिल्‍म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’, को सेंसर बोर्ड ने भारत में बैन कर दिया था। निर्माता प्रकाश झा की इस फिल्‍म को दुनियाभर में काफी सराहा जा रहा है और इसे कुछ पुरस्‍कारों के लिए भी चुना गया है।