उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिकन्दरपुर कस्बे में रविवार को मोहर्रम जुलूस के दौरान पथराव व आगजनी हुई। दो पक्षों में हुए बवाल के बाद इलाके का माहौल ख़राब हो गया और शांति व्यवस्था कायम करने में प्रशासन शुरू में नाकाम रहा।
सूबे के डीएम सुरेंद्र विक्रम ने बताया कि सिकन्दरपुर कस्बे में मोहर्रम जुलूस के दौरान शरारती तत्वों ने पथराव व आगजनी की घटना को अंजाम दिया। इस दौरान 3 बाइक को आग के हवाले कर दिया गया और कुछ मकानों में भी तोड़फोड़ की गई।
सुरेन्द्र विक्रम ने आगे बताया कि इलाके में धारा 144 का कड़ाई से अनुपालन कराया जा रहा है,
स्थिति पर पैनी नजर रखी जा रही है, प्रशासन किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है।
लोगों से शांति बहाल करने के लिए अपील की जा रही है और पुलिस को धारा 144 का कड़ाई से पालन कराने का निर्देश दिया गया है।
सिकन्दरपुर कस्बे में प्रशासन ने सोमवार को स्थिति सामान्य होने का दावा किया है, रविवार को मुहर्रम जुलूस के दौरान आगजनी व पथराव की घटना के बाद कस्बे में अघोषित कर्फ्यू जैसी स्थिति हो गयी थी।
पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार ने बताया कि कस्बे में स्थिति तेजी से सामान्य की ओर बढ़ रही है, शरारती तत्वों को गिरफ्तार किया जा रहा है।
अभी तक डेढ़ दर्जन से अधिक उपद्रवी पकड़े जा चुके हैं, पर्याप्त मात्रा में पुलिस व पीएसी बल भी लगाया गया है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन पर प्रदेश के गवर्नर राम नाईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ मे हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा का माल्यार्पण किया। इस दौरान उन्होंने स्कूली बच्चों की मंडली के साथ मिलकर ‘रघुपति राघव राजा राम’ का भजन गायन भी किया।
बापू को श्रद्धांजलि देने के बाद गवर्नर राम नाईक और सीएम योगी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रतिमा से स्वच्छता मैराथन का शुभारंभ किया, इस मौके पर सीएम योगी और गवर्नर राम नाईक के अलावा मंत्री आशुतोष टंडन और डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा भी मौजूद रहे।
कार्यक्रम मे सीएम योगी ने कहा कि देश के पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक नई शुरुआत कर रहा है, पीएम मोदी ने एक लक्ष्य निर्धारित किया है कि जब गांधी जी की 150वीं जयंती मना रहे होंगे, तब देश मे स्वच्छता रहे, इसमें सिर्फ सरकार का ही काम नहीं बल्कि एक जनांदोलन बनाकर स्वछ्ता साहित कई क्षेत्रों में सिद्धि तक पहुंचाए।
उन्होंने आगे कहा कि जब 2022 में देश आज़ादी के 75 साल पूरा करेगा तो भारत गंदगी से मुक्त, आतंकवाद से मुक्त, गरीबी से मुक्त होगा। हमे ऐसा ही संकल्प लेना चाहिए।
सीएम ने शपथ दिलाई कि महात्मा गांधी ने जिस भारत का सपना देखा था, उसमें केवल राजनितिक आज़ादी ही नहीं थी बल्कि एक स्वच्छ और विकसित देश की कल्पना भी थी। इसलिए मैं हर वर्ष 100 घंटे यानि हर सप्ताह 2 घंटे स्वच्छता रखूंगा। मैं अपने मोहल्ले और गांव से शुरू करके स्वच्छता का कार्य करूंगा। न गंदगी करूंगा, न किसी को करने दूंगा। मैं आज जो शपथ ले रहा हूं, अन्य 100 लोगों से भी दिलवाऊंगा।
पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। जम्मू एवं कश्मीर के पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर सोमवार को पाकिस्तानी सेना की ओर से की जा रही भारी गोलाबारी में 10 साल के बच्चे व एक लड़की की मौत हो गई। अभी तक गोलीबारी में 9 लोग घायल हो गए हैं।
मृतक बच्चे की पहचान असरार अहमद के रूप में की गई है। पाकिस्तानी सेना ने कर्नी क्षेत्र में सोमवार सुबह 6.30 बजे गोलाबारी और गोलीबारी शुरू की। पुलिस ने बताया, “घायल लोगों को अस्पताल ले जाया गया है।” रक्षा सूत्रों के मुताबिक, “भारतीय सेना इन हमलों का बड़ी मुस्तैदी से जवाब दे रही है लेकिन अभी भी गोलीबारी जारी है।”
सूत्रों के मुताबिक, “पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय चौकियों पर बिना किसी कारणवश गोलाबारी शुरू की गई। भारतीय सेनाएं इनका बखूबी जवाब दे रही हैं।” सूत्रों का कहना है कि कुपवाड़ा के तंगधार में भी 5-7 घुसपैठिये दिखाई दिए हैं। वहीं, केरन सेक्टर में सुरक्षा बलों ने घुसपैठ की कोशिश को नाकाम किया है। सुरक्षा बलों ने एक घुसपैठिए को मार गिराया है। सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है। इससे पहले हाल ही में जम्मू के ही अरनिया सेक्टर में पाकिस्तानी रेंजर्स की गोलीबारी में बीएसएफ का एक जवान शहीद हो गया था। वहीं, बीएसएफ के जवानों ने पाकिस्तानी रेंजर्स को मुंहतोड़ जवाब दिया था।
आप को बता दें, इससे पहले बीते गुरूवार को पाकिस्तानी रेंजर्स ने अखनूर और पुंछ सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर सीजफायर तोड़ा था। सीमा पार से की गई इस गोलीबारी में बीएसएफ के दो जवान समेत पांच लोग घायल हो गए थे। पाकिस्तानी फायरिंग का भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब दिया था। इसमें अखनूर सेक्टर में दो पाकिस्तानी रेंजर्स ढेर हो गए थे।
अमेरिका के लास वेगास में बड़े पैमाने पर फायरिंग हुई. एक शूटर ने मांडले बे रिसॉर्ट में कसीनो पर हमला बोल दिया है. यहां कंट्री म्यूजिक फेस्टिवल हो रहा था उसी दौरान शूटर ने मशीनगन से अंधाधुंध फायरिंग की. इस हमले में 20 लोग घायल हो गए हैं और 100 से ज्यादा घायल हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, नजदीकी अस्पतालों में गोली लगने से जख्मी दर्जनों लोगों का इलाज चल रहा है. लास वेगास की पुलिस ने पुष्टि की है कि एक संदिग्ध को मार गिराया गया है. उन्होंने लोगों को मांडल बे कैसिनो के आस-पास के इलाके में न जाने की सलाह दी है. पुलिस ने इलाके को घेर रखा है गोलीबारी अभी जारी है
पुलिस ने कहा है कि वे मांडले बे रिजॉर्ट और कैसिनो पर एक सक्रिय शूटर की जांच कर रहे हैं. लॉस वेगास मेट्रोपोलिटन पुलिस ने ट्विटर पर लिखा, ”हम मांडले बे कैसिनो के आसपास एक सक्रिय शूटर की मौजूदगी की रिपोर्ट्स की जांच कर रहे हैं. कृपया सभी उस इलाके से दूर रहें.” रूट 91 हार्वेस्ट कंट्री म्यूजिक फेस्टिवल में मौजूद लोगों ने फायरिंग की आवाज सुनी. ट्विटर पर वीडियो में दिख रहा है कि कंसर्ट में लोग चीख-पुकार रहे हैं और इधर-उधर भाग रहे हैं. पुलिस ने एहतियात ट्रॉपिकाना से रसेल रोड तक का इंटरस्टेट 15 फ्री-वे बंद कर दिया है.
लास वेगास पुलिस ने लोगों से मांडले बे कसीनो की तरफ न जाने की अपील की है. लोगों का कहना है कि घटनास्थल पर एक शूटर के होने की संभावना है. होटल के बाहर कई स्वाट टीमें भेजी गईं हैं. पुलिस ने कहा है कि उन्होंने होटल के 29वें फ्लोर तक पहुंच बना ली है और 32वें फ्लोर तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं.
नॉएडा में 5 साल की बच्ची के साथ की गई दुष्कर्म की कोशिश
कोमल झा | Navpravah.com
हरियाणा में ऑनर किलिंग का मामला सामने आया है| जहां अपनी झूठी इज़्ज़त बनाये रखने के लिए अपने ही परिजनों ने युवती की बेरहमी से हत्या कर दी| जिसके कुछ ही समय बाद आनन फानन में युवती का दाह संस्कार भी कर दिया गया| मृतका एक युवक के साथ प्रेम संबंध थी| पुलिस इस मामले की जांच कर रही है|
मामला पानीपत के जोशी गांव का है| 18 वर्षीय युवती गांव के ही रहने वाले एक युवक के से प्यार करती थी| उसके परिवार वाले अपनी बेटी के इस रिश्ते से बेहद नाराज थे| कई बार इस मामले को लेकर परिवार में विवाद भी हुआ था| कुछ दिनों पहले अपने परिवार वालो से नाराज होकर युवती अपने प्रेमी के साथ गांव छोड़कर चली गई थी|
इस घटना से तीन दिन पहले ही युवती अपने गांव वापस लौटी थी| युवती को देखकर उसके परिजन और ज्यादा भड़क गए| गुस्साए परिजनों ने उसे मौत के घाट उतार बेरहमी से दिया| आनन-फानन में उसके शव को शमसान ले जाकर दाह संस्कार भी कर दिया गया| गांव के एक अज्ञात व्यक्ति से इस बात की सूचना पुलिस को दी|
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची| जब तक युवती का अंतिम संस्कार किया जा चुका था| जिसके बाद पुलिस ने एफएसएल टीम को सूचना दी| गांव के शमशान घाट पहुंची एफएसएल टीम ने चिता की राख और अस्थियों का सैंपल लेकर जांच के लिए भेज दिया| फिलहाल पुलिस केस दर्ज कर इस मामले की जांच में जुट गई है|
महात्मा गांधी स्वयं में एक युग थे। ऐसा युग जो अतीत के दरख्त़ से जीवन-रस ग्रहण करता हुआ भविष्य की भयावहता के लिए मधुरिम फल हो। अपने स्वाद और सुगंध में लाज़वाब। बेहतरीन इतना कि देश और काल की सीमा भी न रोक सके। दुनिया का हर कलाकार, विचारक, वैज्ञानिक और चिंतक जिसे पाने के लिए बेचैन हो। जिसकी छवि में विश्वात्मा दिख जाय। ऐसे युगपुरुष बार-बार जन्म नहीं लेते, क्योंकि उनके विचार सनातन और शाश्वत होते हैं। उनके बहिर्दर्शन के अनुयायी कोटि-कोटि जन होते हैं। यही बात सोहनलाल द्विवेदी लिखते हैं – “युग हँसा तुम्हारी हँसी देख, युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख।”
गांधी जी ने किसी नये सत्य का उद्घाटन नहीं किया था, बल्कि सदियों से जमीं धूल को साफ-सूफ करके दुनिया के सामने रखा। पूज्य ग्रंथों (उपनिषद्, रामायण, गीता आदि) में कैद ज्ञान को अपने व्यवहार में उतारा था। उन्होंने “आत्मवत् सर्वभूतेषु” को जिया था। उनके लिए ईश्वर का साक्षात्कार ‘प्राणिमात्र का दर्शन’ था। यही कारण है कि वे ‘अहिंसा’ के प्रबल पक्षधर थे। एक बार गांधी और सावरकर का आमना-सामना लंदन के किसी समारोह में हुआ। सावरकर ने अपने वक्तव्य में कहा कि राम ने रावण पर विजय पाने के लिए शक्ति का आराधन किया था। यह जरूरी नहीं है कि स्वाधीनता संग्राम के लिए ‘अहिंसा’ का ही रास्ता अपनाया जाय। महात्मा गांधी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में अहिंसा का पक्ष लेते हुए कहा कि राम शक्ति के साथ-साथ करुणा के भी प्रतीक हैं। सनातन मूल्य के वे संवाहक हैं, अहिंसा तो सनातन परम्परा के मूल में है। इस प्रकार समर्पित और ईमानदार क्रांतिकारियों को उन्होंने उस रास्ते पर चलने से मना किया जो मानवता के हित में न हो।
गांधी का किसी से कोई बैर-भाव नहीं था। सबके लिए उनके अंतःकरण से सद्भावना की नदियाँ फूटती थीं। प्रभु ईसा मसीह की तरह वे उन्हें भी क्षमा करने के लिए तैयार थे, जो भारत का अहित सोचते थे। ऐसा विराट व्यक्तित्त्व भला विश्व-मनीषा की नज़र से कैसे बचता ? सबने मुक्त-कंठ से बापू का गुणगान किया। मूर्तिकला, चित्रकला, चिंतन, कविता, राजनीति, विज्ञान, फिल्म आदि से जुड़े शीर्षस्थ लोगों ने गांधी को अपनी-अपनी दृष्टि से जांचा-परखा और अपनी सर्जना में ढाला। इस संत की सादगी, सत्य, संकल्प, साहस, समर्पण, करुणा, विद्रोह, सहनशीलता, अहिंसा, आध्यात्मिकता आदि ने दुनिया की महान विभूतियों को उनकी तरफ आकृष्ट किया। सबने महसूस किया कि ‘गांधी-दर्शन’ ही सच्चे अर्थों में ‘विश्व-दर्शन’ है।
भारत की स्वतंत्रता के लिए गांधी ने कभी साधन और साध्य के बीच अंतर नहीं माना। ऐसा करना व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्तर पर दोहरा मापदंड अपनाना था। हिंसा के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति उन्हें कदापि स्वीकार्य न थी। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति को वृक्ष मान लिया जाय, तो उसका माध्यम निश्चित रूप से बीज होगा। इनमें असंतुलन आना विषमताओं का कारण बनता है। यही बात महात्मा गांधी भारतीय क्रांतिकारियों को समझाना चाहते थे। इस सूत्र को न समझ पाने के कारण दुनिया के अनगिनत क्रांतिकारियों और विचारकों ने मुंह की खाई। इनमें से एक उदाहरण एम्मा गोल्डमैन का देना जरूरी है। एम्मा का जन्म रूस में उस समय हुआ था, जब वहाँ ज़ार की आतंकवादी गतिविधियाँ चरम पर थीं। उसी समय इस महिला ने अपना देश छोड़कर अमेरिका में बसने का निर्णय लिया। बाद में अमेरिका की किसी नीति में हस्तक्षेप करने के कारण उन्हें दंडित किया गया। १९१९ में अमेरिकी सरकार ने एम्मा को उनके देश रूस भेज दिया। यहाँ आकर वह बहुत खुश थीं। बोल्शेविक क्रांति हो चुकी थी। उनको लगा कि साम्यवादी समाज स्थापित होगा, किन्तु थोड़े ही दिनों में मोह भंग हो गया। स्थितियां असामान्य बनी रहीं, गोल्डमैन ने महसूस किया कि इन सबका कारण मार्क्सवाद चिंतन है, जिसमें साधन और साध्य में विसंगति है। क्रांति और हिंसा की इस समर्थक ने अपनी पुस्तक ‘माइ दिस एल्यूज़नमेंट इन रसा’ में खुले दिल से इस भूल को स्वीकार किया है। एम्मा ने गांधी के नमक सत्याग्रह की वकालत अपनी दूसरी पुस्तक ‘नो ह्वेवर एट होम’ में की है। वहां उसने साधन और साध्य को भारत के लिए समीचीन बताया।
गांधी जी निडर और निर्भीक थे। उन्हें नैतिकता का अमोघ अस्त्र प्राप्त था, किंतु थे निःशस्त्र मसीहा (unarmed prophet) | यह ‘नंगा फकीर’ जब राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में भाग लेने लंदन पहुंचा तो लार्ड मरे ने तीन पंक्तियों से इनका परिचय कराया था –
‘He is a man whom gun cannot frighten,
To whom money cannot buy
To whom woman cannot seduce.’
गाँधी का विश्व-क्षितिज पर आना एक चमत्कारिक घटना थी। इस बात पर एल्बर्ट आइन्स्टीन ने हैरानी जताते हुए कहा था, “आने वाली पीढ़ी आश्चर्य करेगी, वे विस्मयपूर्वक पूछेंगी, क्या ऐसा कोई हाड़-मांस वाला व्यक्ति कभी इस धरती पर चलता-फिरता भी था ? वे मुश्किल से यह विश्वास करेंगी कि आदमी के ऐसे शरीर में देवता, संत अथवा देवदूत का होना कभी संभव हुआ।” अद्भुत व्यक्तित्त्व था महात्मा का, जिसमें न तो पूरी तरह राम अँट सके और न ही कृष्ण। उनकी वैचारिक ऊष्मा इतनी प्रखर और सुहावनी थी कि स्वतः ही महावीर, बुद्ध, फ्रांसिस, ईसा आदि से जुड़ जाती। एक तरफ अमेरिकी चिन्तक डॉ. जे. एच. होम्स गाँधी की तुलना ईसा से करते थे, तो दूसरी ओर डॉ. रूफ़स जोम्स उन्हें संत फ्रांसिस मानते थे। मार्टिन लूथर ने अपने संघर्षों में वैचारिक साथी के रूप में महात्मा गांधी के नाम की घोषणा की थी। वे अपने मिशन (अश्वेतों के अधिकारों की लड़ाई) के लिए सदैव महात्मा के प्रसाद के अभिलाषी रहे। इस बात को मार्टिन ने एक कविता में इस प्रकार स्वीकारी थी –
“कैसी थी उनकी लड़ाई !
जिसमें विद्वेष-घृणा के लिए
कोई जगह नहीं थी।
हड्डियों के उस ढांचे में
कैसा था वह आत्मबल !
मैं सर्वदा उनके प्रसाद का अभिलाषी रहा
हूँ और रहूंगा |”
गांधी के ‘स्वराज’ का स्वरूप विराट था, उसमें मात्र अंग्रेजों की दासता से मुक्ति ही शामिल नहीं थी, बल्कि मुक्ति के बाद का ‘ब्लू प्रिंट’ भी था। वे नहीं चाहते थे कि ‘अंग्रेजी शासन बिना अंग्रेजों के चलता रहे’। परिवर्तन जरूरी था। अतः उन्होंने ‘स्वराज’ के नए आयाम खोले। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता ( उद्योगों का विकेंद्रीकरण), सांस्कृतिक स्वतंत्रता (इंडिया की जगह ‘हिन्द’ का प्रयोग) और आत्मानुशासन पर बल दिया। फ्रेड डलमायर और रूसो ने तो ‘आत्मानुशासन’ को लोकतंत्र का केंद्रीय तत्त्व माना। बिना इसके इच्छाएँ रक्तबीज की तरह जन्म लेती हैं और राष्ट्र में गृहयुद्ध जैसे हालात बन जाते हैं। कुल मिलाकर इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उपजी अनेकानेक समस्यायों का निदान है गांधी के स्वराज में। भारत पर सांस्कृतिक हमले बदस्तूर जारी हैं, अंग्रेजों के बाद यह वीणा अमेरिका ने उठाया है। उनके पोषित बुद्धिजीवी (एम्बेडेड इंटेलेक्चुअल्स) अमेरिकी वर्चस्व को पूरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं। दूसरे देशों में राजनीतिक, सैनिक और आर्थिक हस्तक्षेप को ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ बताया जा रहा है। इस वैचारिक परंपरा (पश्चिम का अहंकार और दंभ) के वाहक रूप में सैमुअल हटिंगटन और फ्यूकोयामा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वर्त्तमान में भी सोशल मीडिया पर कुछ पश्चिमी विचारकों के लेख वायरल हो रहे हैं, जिसमें भारत की अस्मिता पर प्रहार किया जा रहा है। इस दुष्प्रचार में हमारे पड़ोसी देशों की सरकारी मीडिया भी शामिल है। ऐसी स्थिति में गाँधी का स्वराज-दर्शन वरेण्य है। अधकचरी जानकारी से लैस ऐसे चिंतकों को माकूल जवाब मिलना चाहिए।
हिंसा-प्रतिहिंसा की भंवर में उलझा विश्व हथियारों की खरीद-फरोख्त में विवेकशून्य हो गया है। जलवायु-संकट गहराता जा रहा है, पेरिस-सम्मलेन का संतोषजनक हल नहीं निकला। उत्तर कोरिया की परमाणु धमकी दुनिया की धड़कनों को तेज कर दी है। आतंकवाद की ज़द में समूचा विश्व समाया है, रासायनिक हथियार तबाही मचाने के लिए तैयार हैं। निर्माण की मात्रा कम किंतु ध्वंस के सामान अधिक हैं। आखिर, विश्व-मनीषा इतनी लाचार क्यों है ? इस समय प्रेम, सद्भावना, करुणा, अहिंसा, सत्य, सहयोग और सहानुभूति की सर्वाधिक आवश्यकता महसूस हो रही है | ऐसे में उम्मीद की एकमेव चमकीली किरण गाँधी-दर्शन है। इसे अपनाकर दुनिया को स्वर्ग बनाया जा सकता है। भविष्य की ऐसी ही भयावह स्थिति को भांपकर जापान के संत कवि तोशियो साका ने लिखा है –
“जब तक इस धरती का
एक भी व्यक्ति उदास है दुखी है
गांधी उसकी उदासी, उसके दुःख में
हिस्सा बंटाने के लिए
बराबर आते रहेंगे
वे आवागमन से न कभी मुक्त होंगे
और न होना चाहेंगे।”
बाज़ार और शक्ति का पूरी दुनिया पर वर्चस्व है। ऐसी स्थिति में युद्ध की संभावना बढ़ती जा रही है। आवश्यकता है गांधी के विचारों की प्रबल पुनर्वापसी हो। हम इसे अपने व्यवहार में उतारें, जिससे भारत विश्व-मंच पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए। धरती पर अमन-चैन स्थापित करने में ‘आर्यावर्त’ नेतृत्त्व की भूमिका में आए। ध्यान रहे इस बड़ी मुहिम की शुरुआत ‘स्व’ से करनी होगी। संदेश का स्वतः भूमंडलीकरण हो जाएगा। अस्तु |
” देश की सुरक्षा मात्र सैनिकों की ज़िम्मेदारी नहीं है, सम्पूर्ण राष्ट्र का सशक्त होना आवश्यक है।” सम्पूर्ण भारत को सशक्तिकरण का मूल मंत्र देने वाले, देश को ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देने वाले, अत्यंत साधारण जीवन और अतुलनीय कर्मनिष्ठा से भरे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 114वीं जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन अर्पित करते हुए आइये जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ प्रेरणादायक बातें –
लालबहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तरप्रदेश के मुगलसराय नामक क्षेत्र में हुआ था। जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं और उनका बचपन अपने ननिहाल में बीता। वे भाई बहनों में सबसे छोटे थे, इसलिए घर में सब उन्हें ‘नन्हे’ कहकर बुलाते थे।
उनकी उच्च शिक्षा को ध्यान में रखकर बाद में उन्हें उनके चाचा के यहाँ वाराणसी भेज दिया गया। सर्दी, गर्मी, बरसात, हर मौसम की भीषणता के बावजूद वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर विद्यालय जाते थे। शास्त्री का स्कूल गंगा की दूसरी तरफ था। उनके पास नाव से गंगा नदी पार करने के लिए फेरी के पैसे नहीं होते थे। इसलिए वह दिन में दो बार अपनी किताबें सिर पर बांधकर तैरकर नदी पार करते थे और स्कूल जाते थे।
शास्त्री जी जातिवाद के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की और यह उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द ‘श्रीवास्तव’ हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया।
बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि शास्त्री जी महज़ 17 साल की उम्र में, ‘असहयोग आंदोलन’ में भागीदारी के चलते पहली बार जेल गए थे, हालांकि महज़ 17 वर्ष का होने के नाते उन्हें बाद में छोड़ दिया गया था।
1927 में जब उनका विवाह ललिता देवी से हुआ, और उनके ससुराल पक्ष ने दहेज के विषय में पूछा, तब दहेज के नाम पर शास्त्री जी ने मात्र एक चरखा एवं खादी का कपड़ा लिया। दहेज़ के सख्त विरोधी शास्त्री जी ने इस प्रकार दहेज लेकर भी देश को स्वदेशी अपनाने का एक संदेश दिया।
1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा की। शास्त्री भी उनके इस अभियान में जी जान से लग गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान शास्त्री जी कई बार जेल गए। वे अत्यंत ही अनुशासनप्रिय थे। उनके जेल में रहने के दौरान उनकी बेटी बहुत बीमार थी। उसकी देख रेख के लिए उन्हें 15 दिनों के परोल पर घर भेजा गया। दुर्भाग्यवश उनकी उस बिटिया का देहांत हो गया। शास्त्री जी ने उसका अंतिम संस्कार किया और फिर जेल लौट गए, हालांकि परोल के 15 दिन पूरे भी नहीं हुए थे।
जेल में रहने के दौरान उनके परिवार को 50 रुपये की पेंशन दी जाती थी। उनकी पत्नी ने एक बार उन्हें सूचित किया कि इस माह उन्होंने अपने खर्च में से पूरे 10 रुपये की बचत की है, शास्त्री जी ने तुरंत संबंधित संगठन को पत्र लिखकर कहा कि उनकी पेंशन 10 रुपये कम कर दी जाए व किसी जरूरतमंद को दी जाये क्योंकि उनके परिवार का खर्च 40 रुपये में भी चल सकता है।
शास्त्री जी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री; परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे। उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही थी। एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। देश एवं संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की। उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी।
शास्त्री ने युद्ध के दौरान देशवासियों से अपील की थी कि अन्न संकट से उबरने के लिए सभी देशवासी सप्ताह में एक दिन का व्रत रखें। उनकी इस अपील पर देशवासियों ने वाक़ई सप्ताह में एक दिन व्रत रखना शुरू कर दिया था।
बनारस के हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान शास्त्री जी से साइंस प्रैक्टिकल में इस्तेमाल होने वाला एक बीकर टूट गया था। स्कूल के चपरासी देवीलाल ने उनको देख लिया और उन्हें जोरदार थप्पड़ मार दिया था। रेल मंत्री बनने के बाद 1954 में एक कार्यक्रम में भाग लेने आए शास्त्री जी जब मंच पर थे, तब देवीलाल उनको देखते ही सकुचा कर बगल में हट गए। शास्त्री जी ने उन्हें पहचान लिया और मंच पर बुलाकर गले लगा लिया।
उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान एक बार उनके बेटे को बिना वजह पदोन्नति दिए जाने पर उन्होंने स्वयं उस पदोन्नति के आदेश को ख़ारिज करा दिया था। प्रधानमंत्री रहते हुए भी अपने बेटे के कॉलेज एडमिशन फॉर्म पर उन्होंने अपना पद ‘प्रधानमंत्री’ न बताते हुए, एक ‘सरकारी कर्मचारी’ बताया।
शास्त्री जी स्वतंत्र भारत के ऐसे पहले मंत्री थे जिन्होंने अपने परिवहन मंत्री रहने के कार्यकाल के दौरान पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन में महिला वाहन चालकों व कंडक्टरों की नियुक्ति की थी।
शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए 5000 रुपये के लोन पर एक फिएट कार खरीदी थी। दुर्भाग्यवश 11th Jan 1966 को ताशकंद समझौते के दौरान रहस्यमय ढंग से उनकी मृत्यु हो गई। तब तक पंजाब नेशनल बैंक से लिया गया उनका यह लोन चुकता नहीं हो पाया था। उनकी पत्नी ललिता गौरी ने उस लोन को शास्त्री जी की पेंशन से भरे जाने का निर्णय किया और उस कार का पूरा लोन चुकाया गया। शास्त्री जी भारत के ऐसे इकलौते प्रधानमंत्री होंगे, जिनके पास कार लेने तक के पैसे नहीं थे। अपना तन, मन, धन, सम्पूर्ण जीवन अपने देश को समर्पित करने वाले इस इकलौते ‘निर्धन’ प्रधानमंत्री को एक बार पुनः समूचे भारत देश का कोटि कोटि नमन।
Now every doctor in the country will have a unique registration number- MCI
शिखा पाण्डेय |Navpravah.com
अलग-अलग बीमारियों के स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स की तलाश में अब आपको इस अस्पताल से उस अस्पताल के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। साथ ही किसी भी फ़र्ज़ी डॉक्टर की भेंट भी न चढ़ना होगा, क्योंकि अब ‘मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया(एमसीआई)’ ने देश के सभी मेडिकल प्रैक्टिशनर्स को ‘यूनीक परमानेंट रजिस्ट्रेशन नंबर’ देकर सिंगल डिजिटल सिस्टम के तहत लाने का फैसला लिया है। अब देश भर के डॉक्टरों का ब्योरा अब आपको एक ही जगह पर मिल सकेगा।
एमसीआई का कहना है कि ड्यूप्लिकेट रजिस्ट्रेशन्स, फर्जी अस्पतालों पर रोक लगाने और मेडिकल प्रैक्टिस का नियमन करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। मेडिकल से जुड़ी संस्थाओं ने इस कदम का स्वागत किया है। इससे महाराष्ट्र के उन डॉक्टरों को भी राहत मिलेगी, जिन्हें हर 5 साल पर अपना रजिस्ट्रेशन रीन्यू कराना पड़ता था।
औरंगाबाद स्थित इंडियन मेडिकल असोसिएशन के अधिकारी रमेश रोहिवाल ने कहा कि यूनिफॉर्म रजिस्ट्रेशन नंबर सिस्टम से उन डॉक्टरों को मदद मिलती है, जो स्थान बदल लेते हैं। रोहिवाल ने बताया, “इससे पहले दूसरे राज्य में जाने पर डॉक्टरों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि वे किसी अन्य राज्य की मेडिकल काउंसिल में रजिस्टर्ड होते थे। यूनिक परमानेंट रजिस्ट्रेशन नंबर से ऐसे डॉक्टरों को मदद मिलेगी। इसके अलावा डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन की जानकारी हासिल करना भी आसान हो सकेगा।”
रोहिवाल ने कहा कि महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल के नियम के तहत डॉक्टरों को रजिस्ट्रेशन रीन्यू कराने से पहले एक साल और दो साल का बॉन्ड पूरा करना होता था। यह सुविधा उन डॉक्टरों के लिए है, जिन्होंने अपनी ग्रैजुएशन, पोस्ट-ग्रैजुएशन और सुपर स्पेशियलिटी डिग्री 1980 से 2000 के बीच सरकारी मेडिकल कॉलेज से पूरी की है। रोहिवाल ने कहा है कि ऐसे तमाम डॉक्टर हैं, जिन्होंने कभी भी बॉन्ड पूरा नहीं किया और प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं। इस प्रकार यूनीक परमानेंट रजिस्ट्रेशन नंबर की मदद से मेडिकल क्षेत्र की ऐसी तमाम धांधलियों को रोकने में मदद मिलेगी।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ का चुनाव घोषित हो गया है, जिसके बाद छात्र नेताओं ने प्रचार प्रसार में पूरी ताकत लगाना शुरू कर दी है, विश्वविद्यालय प्रशासन भले ही चुनाव आचार संहिता की दुहाई दे रहा होगा, लेकिन छात्र नेता आचार संहिता का उल्लंघन आराम से कर रहे हैं।
विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन सहित जिला प्रशासन की भी तैयारियां जोरों पर है, लेकिन छात्र नेताओं पर फर्क नहीं पड़ रहा। विश्वविद्यालय कैम्पस सहित आस पास और शहर के सभी प्रमुख स्थानों और चौराहों पर संभावित प्रत्याशियों ने अपने होल्डिंग और बैनर से पूरे इलाके को पाट दिया है।
छात्रसंगठन भी राजनीतिक दलों की तरह छात्र-छात्राओं से विश्वविद्यालय से जुड़े मुद्दों पर वादे करते घूम रहे हैं। छात्रनेता छात्रों का हक दिलाना और उनके हक की लड़ाई लड़ने के बड़े-बड़े वादों के साथ प्रचार कर रहे हैं। छात्र संघ चुनाव भी विधान सभा और लोक सभा की तरह लड़े जा रहे है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से छात्र संघ चुनाव एक बार लड़ने की बाध्यता के कारण जितने वाले प्रत्याशी छात्र हित के मुद्दों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों और जवाबदेही को नहीं समझते है और वह अपनी जीत के बाद अपनी धुन में जी रहे है, अगर बीते दो कार्यकाल की बात करे तो पदाधिकारियों का ज्यादा समय विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ लड़ाई में ही बीत रहा है।
साध्वियों से दुष्कर्म मामले में सजायाफ्ता डेरा सच्चा सौदा का मुखी गुरमीत राम रहीम की खास राजदार हनीप्रीत इंसां अब तक पुलिस को गच्चा देकर गायब है। उसको पकडऩे के लिए पुलिस ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है, लेकिन कुछ रसूखदार उसे अपने चरित्र की कलई खुलने के डर से बचा रहे हैं।
डेरा सूत्रों का दावा है कि हनीप्रीत को फरार करवाने में कुछ बड़े रसूखदार लोगों का हाथ है, क्योंकि उसके पकड़े जाने से कई दिग्गजों के चरित्र की कलई खुल सकती है। एक आरोप यह भी है कि राम रहीम के समधी और कांग्रेस के विधायक रहे हरमिंदर सिंह जस्सी ही हनीप्रीत को बचा रहा है। इस बात को तब और अधिक बल मिला था जब हनीप्रीत की तलाश के दौरान हरमिंदर सिंह के सिक्योरिटी में तैनात जवान राजस्थान के श्रीगंगानगर में देखे गए थे। मीडिया को देखने के बाद बंदूकों से लैस इन जवानों ने अपनी गाडिय़ां वहां से दौड़ा दी। श्रीगंगानगर में राम रहीम का पैतृक घर है उसका वहां भी बड़ा साम्राज्य फैला हुआ है.
अब हनीप्रीत को भगोड़ा घोषित करने की तैयारी की जा रही है। हालांकि हाल ही में हनीप्रीत अपना हुलिया बदलकर दिल्ली के लाजपत नगर में वकील प्रदीप आर्या के ऑफिस पहुंची थी। वहां उसने दिल्ली हाईकोर्ट से ट्रांजिट अग्रिम जमानत के लिए अर्जी के लिए वकील से सलाह-मशवरा किया और फिर से गायब हो गई। हाईकोर्ट ने बीते दिनों उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। वहीं, हरियाणा पुलिस भी उसको भगोड़ा घोषित करने वाली है। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर देश की राजधानी में होने के बावजूद हनीप्रीत को पुलिस क्यों नहीं पकड़ पाई?
सीबीआई कोर्ट ने जज ने जब बाबा राम रहीम को 28 अगस्त के दिन दोषी ठहराया तो उसे हेलीकॉप्टर से रोहतक जेल ले जाया गया। इस दौरान हनीप्रीत भी उसके साथ थी, मगर इसके बाद हनीप्रीत डेरा के कुछ लोगों के साथ आसानी से सबके सामने निकल गई, जबकि सिरसा में कफ्र्यू लगा हुआ था।
वहां से हनीप्रीत राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली समेत कई जगहों पर ठिकाने बदलती रही, लेकिन पुलिस उसकी लोकेशन बदलने के बाद मौके पर पहुंचती थी. आखिरी बार दिल्ली में वकील से मिलने के बाद हनीप्रीत की लोकेशन एनसीआर के ग्रेटर कैलाश की एक कोठी में मिली, मगर पुलिस के पहुंचने से पहले ही वह फरार हो गई।