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Wednesday, August 5, 2026
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“मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ, मेरी मृत्यु की अफ़वाह फैला रहे हैं लोग” :गृहमंत्री अमित शाह

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में गृहमंत्री अमित शाह की बीमारी और सम्भावित मृत्यु की झूठी खबरें अराजक तत्वों द्वारा फैलाई जा रही थीं। जिसका खंडन स्वयं गृहमंत्री ने अपने सोशल मीडिया के माध्यम से किया है:

“पिछले कई दिनों से कुछ मित्रों ने सोशल मिडिया के माध्यम से मेरे स्वास्थ्य के बारे में कई मनगढ़ंत अफवाए फैलाई हैं। यहाँ तक कि कई लोगों ने मेरी मृत्यु के लिए भी ट्वीट कर दुआ मांगी है।

देश इस समय कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ रहा और देश के गृह मंत्री के नाते देर रात तक अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण मैंने इस सब पर ध्यान नहीं दिया। जब यह मेरे संज्ञान में आया तो मैंने सोचा कि यह सभी लोग अपनी काल्पनिक सोच का आनंद लेते रहें, इसलिये मैंने कोई स्पष्टता नहीं की।

परन्तु मेरी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओ और मेरे शुभचिंतकों ने विगत दो दिनों से काफी चिंता व्यक्त की और उनकी चिंता को मैं नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता। इसलिए मैं आज स्पष्ट करना चाहता हूँ, कि मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हूँ और मुझे कोई बीमारी नहीं है।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ऐसा मानना है कि इस तरह की अफवाह स्वास्थ्य को और अधिक मज़बूत करती हैं। इसलिए मैं ऐसे सभी लोगों से आशा करता हूँ कि वो यह व्यर्थ की बातें छोड़ कर मुझे मेरा कार्य करने देंगे और स्वयं भी अपने काम करेंगे।

मेरे शुभचिन्तक और पार्टी के सभी कार्यकर्ताओ का मेरे हालचाल पूछने और मेरी चिंता करने के लिए उनका आभार व्यक्त हूँ। और जिन लोगों ने यह अफवाएं फैलाई है उनके प्रति मेरे मन में कोई दुर्भावना या द्वेष नहीं है। आपका भी धन्यवाद्।”

बिहार: पुलिसकर्मी ने की डॉक्टर की पिटाई, चिकित्सकों ने किया हड़ताल

पुलिसकर्मी ने की डॉक्टर की पिटाई
पुलिसकर्मी ने की डॉक्टर की पिटाई

केशव मेहता | navpravah.com

दरभंगा के जाले प्रखंड स्थित सरकारी अस्पताल से एक गंभीर मामला सामने आया है। दरभंगा ज़िले के जाले थाना क्षेत्र के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने पुलिस वाले को मास्क पहन लेने को कहा। डॉक्टर के इस बात से गुस्सा पुलिसवाले ने पहले तो बहस किया, फिर चिकित्सक के साथ मारपीट की। गुस्से में चिकित्सकों की टीम ने काम ठप कर दिया, जो कि लॉक डाउन के समय में एक बड़ी समस्या की ओर संकेत देती है।

दरभंगा के इस इलाके में डॉक्टर के साथ पुलिस वाले की झड़प का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। लॉक डाउन के समय में जब लोगों में भय का माहौल है, ऐसे में सरकारी अस्पताल के बंद होने से स्थिति और गंभीर होती जा रही है। चिकित्सकों में सुरक्षाकर्मियों के प्रति भारी रोष है।

जानकारी के मुताबिक़, चिकित्सक इस बात से तनाव में हैं कि ऐसे समय में जब हम रिस्क लेकर सबकी जान बचा रहे हैं, तब सबकी सुरक्षा करने वाली पुलिस ही हम पर हमला कर रही है। हम किस पर भरोसा करके काम शुरू करें।

सोशल मीडिया में CCTV फुटेज वायरल हो चुकी है। और अब सारे चिकित्सक हड़ताल पर है। हालाँकि पुलिस के आला अधिकारी इस मामले का हल निकालने में लगे हैं, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में किसी तरह की अड़चन न आए।

दुनिया की पहली बोलती फ़िल्म: “द जैज़ सिंगर”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk

विश्व में सिनेमा ने अपने लिए एक महत्वपूर्ण जगह बना ली है। हमारे देश में फ़िल्में बहुत प्रचलित हैं और लोगों की मान्यताओं और उनके व्यवहार पर , इनका गहरा असर रहा है। लेकिन विश्व के अन्य देशों में ये असर हमारे देश से कहीं ज़्यादा रहा है। 1937 में जब मुसोलिनी और उनके बेटे विट्टोरियो, सिनेसिटा फ़िल्म स्टूडियो का उद्घाटन कर रहे थे, इटली में, तब उनका स्लोगन था, “Il cinema è l’arma più forte” (“Cinema is the most powerful weapon”) ( सिनेमा सबसे सशक्त हथियार है।) मात्र चालीस साल पहले शुरू होकर, सभ्यता के शुरुआत से चले आ रहे साहित्य और संगीत जैसी विधाओं के रहते हुए, यह स्थान पा लेना, सिनेमा के बारे में, उसकी प्रसिद्धि के बारे में, बहुत कुछ बताता है।

Jakie Rabinowitz (Jack Robin) as ‘Al Jolson’ in film

मूक फ़िल्मों को देखकर भी, पूरी दुनिया में लोग उत्साहित थे और समय बीतने के साथ सामाजिक और साहित्यिक आंदोलनों का प्रभाव भी सिनेमा पर पड़ने लगा था। श्रवण और चाक्षुष, दोनों स्तर पर प्रभाव डाल पाने के कारण, सिनेमा की अभिव्यक्ति, अन्य माध्यमों से ज़्यादा प्रभावकारी थी। 1915 म आई “द बर्थ ऑफ़ ए नेशन” को लेकर इतने विवाद हुए कि ग्रिफ़िथ, जो कि फ़िल्म के डायरेक्टर थे, अगले ही साल, “इनटॉलरेंस”, ले कर आए और अपनी नाराज़गी जताई।  मूक फ़िल्मों ने शोर पैदा कर दिया था।

शांति और सद्भावना की स्थापना के लिए, संगीत के सुरों की आवश्यकता थी और ये पूरी हुई, 1927 में आई, दुनिया की पहली सवाक् और संगीतमयी फ़िल्म, “द जैज़ सिंगर” के द्वारा।

सिनेमा हॉल के आगे लगी भीड़ (PC- The Guardian)

इस फ़िल्म का निर्माण, वॉर्नर ब्रदर्स के बैनर तले हुआ और इसके निर्देशक थे, ऐलेन क्रोसलैंड। ये पहली फ़िल्म थी जिसमें किरदार बोलते थे और संगीत भी था। फ़िल्म के लिऐ, संगीत, पहले ही रिकॉर्ड कर लिया गया था। फ़िल्म के मुख्य कलाकार, ओल जॉलसन ने 6 गाने गए।

” फ़िल्म की कहानी, एक ऐसे लड़के की है जो यहूदी है और उसके पिता, उसे साइनेनेगॉग का पुजारी बनाना चाहते थे और वो गायक बनना। इसी बात से प्रेरित होकर, फ़िल्म की बाक़ी घटनाएं, एक दूसरे से मिलती रहती हैं और गायक बनने के फ़ैसले के सही साबित होने तक, कहानी को बढ़ाती हैं। फ़िल्म, इसी नाम के एक नाटक से प्रेरित रही है, जो सैमसन रफ़ैलसन ने लिखी थी। “

ये एक 96 मिनट लंबी फ़िल्म थी और पूरी दुनिया सवाक् फ़िल्में देखकर न केवल आवाक् थी बल्कि उसका स्वागत भी कर रही थी। ऐसा नहीं था कि इस फ़िल्म के तुरंत बाद मूक फ़िल्में बंद हो गईं या सिर्फ़ सवाक् फ़िल्में बनने लगीं, लेकिन बिना कुछ कहे, ये तो साबित हो गया था कि भविष्य की फ़िल्में टॉकी यानि सवाक् ही होंगी। परिवर्तन के इस दौर को कुछ फ़िल्म कंपनियों ने ख़ूब भुनाया, मसलन, 1930 में जब “ऐना क्रिस्टी” आने वाली थी तब महान अभिनेत्री ग्रेटा गार्बो के बारे में, पोस्टरों पर लिखा जाता था, “गार्बो टॉक्स”।

1996 में इस  फ़िल्म के 70 साल पूरे हुए और इसे “नैशनल फ़िल्म रजिस्ट्री” में संरक्षित कर लिया गया। चूंकि ये पहली टॉकी फ़िल्म थी और इसमें संगीत भी था, सिनेमा पढ़ने, बनाने और देखने वाले लोगों को, इसे देखना चाहिए।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

भूली हुई यादें- “टुनटुन ”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

बहुत मुश्किल होता है बरक़रार रखना तबस्सुम, अगर ज़िंदगी, पेश न आ रही हो अदब से, जब मुलायम न गुज़र रही हों शामें और शजर भी न दिखता हो नज़दीक कड़ी धूप में, दो कदम चलना भी सहल न रह जाता है। या तो इतना रो लें, कि सब से दिलासा पा जाएं, या इतना हंस लें, हंसा लें अपने आस पास सब को कि एक झूठी कहानी लगे, ग़मों का होना ज़िंदगी में। हंसते रहना ही चुना, उमा देवी खत्री उर्फ़ टुनटुन ने। एक अदद ज़िंदगी और उसमें सहूलियत की तलाश ने टुनटुन को मुसाफ़िर ही रखा ताउम्र और जब सब मिला तो हसरतें न थीं।

टुनटुन

अमरोहा में, अलीपुर नाम के एक गांव में टुनटुन का जन्म, 1923 में हुआ और जब ये बस दो या ढाई साल की थीं, इनके मां, बाप और भाई की, ज़मीन के विवाद में, हत्या हो गई। अकेली टुनटुन का बचपन अपने चाचा के साथ, मथुरा में बीता। बचपन में जब टुनटुन रेडियो पर गाने सुना करती थीं तो न केवल गाने, गायक और म्यूज़िक डायरेक्टर के नाम भी इन्हें याद हो जाया करते थे और इनकी नकल में वे गाती भी थीं।

रेडियो के लिए गाती हुई टुनटुन

रेडियो के साथ, उनकी अलग दुनिया थी। उस ज़माने में ज़्यादातर लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता था और इस कुरीति का शिकार टुनटुन भी हुईं। लेकिन इनकी एक सहेली थी जो दिल्ली में रहती थी और कभी कभी मथुरा भी आती थी। टुनटुन उससे, शहर की बातें सुनती थीं। इस दोस्त के कुछ जानने वाले मुंबई में थे और फ़िल्मों में काम भी करते थे। टुनटुन ने उन सभी जानने वालों के लिए, अपने दोस्त से चिट्ठी लिखवाई, और मुंबई भाग गईं।

” कई बार ये भी कहा जाता है कि कोई, अब्बास काज़ी साहब थे, जो टुनटुन को पसंद करते थे और उनके कहने पर ही वे मुंबई गयीं। जो भी बात रही हो, जब ये मुंबई पहुंचीं, इनकी उम्र 23 साल की थी। वहाँ पहुंचते ही ये सीधे नौशाद साहब के यहां गईं और उनसे कहा, कि या तो वे इन्हें गाने का मौक़ा दें, या वे समंदर में कूद कर जान दे देंगी। “

नौशाद साहब, ख़ुद भी ग़ुरबत में ही खिले हुए गुल थे, सो उन्होंने, टुनटुन की बेचैनी और लाचारी को समझा। उन्होंने गाना सुनाने को कहा और पाया कि टुनटुन ठीक गा लेतीं हैं। इसके बाद नौशाद साहब के कहने पर एक दो छोटी फ़िल्मों में इन्होंने गाया। ये सब 1946 में हो रहा था।

एक फ़िल्म में टुनटुन और सुन्दर

अगले ही साल, हिन्दुस्तान आज़ाद हुआ और ए० आर० करदार की फ़िल्म, “दर्द” आई। इस फ़िल्म में अदाकारा, मुनव्वर सुल्ताना पर फ़िल्माए गए सभी गाने ज़बरदस्त मशहूर हुए, ख़ासकर “अफ़साना लिख रही हूँ, दिले बेक़रार का” ये गाना उमा देवी उर्फ़ टुनटुन ने ही गाया था। इसके बाद तो इन्होंने नौशाद साहब के निर्देशन में सुरैया के साथ भी गाया। “बेताब है दिल, दर्दे मोहब्बत के असर से” इसी गाने में सुरैया के साथ उमा देवी उर्फ़ टुनटुन की भी ख़ूब तारीफ़ हुई। इसके बाद इन्होंने महबूब ख़ान की फ़िल्मों म भी गाया। बतौर गायक, टुनटुन की शोहरत हो चुकी थी और 1948 में “जेमिनी फ़िल्म्स, मद्रास” की फ़िल्म “चन्द्रलेखा” में, इन्होंने 7 गाने गाए। शोहरत का आलम ये था कि “अफ़साना लिख रही हूँ, दिले बेक़रार का” ये गाना सुनकर दिल्ली में एक साहब इतने दीवाने हुए कि मुंबई आ पहुंचे और कुछ दिनों के इंतज़ार के बाद टुनटुन से शादी कर ली। टुनटुन इन्हें मोहन बुलाती थीं।

अब दौर बदल रहा था और लता मंगेशकर, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर जैसे कमाल कलाकार, पूरी तैयारी के साथ फ़िल्मों में आ रहे थे, सो नौशाद साहब ने टुनटुन से कहा कि वे अब ऐक्टिंग के बारे में सोचें क्योंकि गाने में अब जगह बनाए रखना, आसान न रह गया था। फ़कीर जैसे अंदाज़ में, टुनटुन ज़िद कर बैठीं कि ऐक्टिंग करेंगी तो दिलीप कुमार के साथ। ये दिल की बहुत साफ़ थीं सो नौशाद साहब मना न कर पाए और 1950 में आई “बाबुल” में टुनटुन नज़र आईं और भारत को उसकी पहली महिला कॉमेडियन मिल चुकी थी। इस फ़िल्म में एक सीन था, जिसमें दिलीप कुमार को टुनटुन के साथ लड़ते हुए एक खटिए पर गिरना था। जैसे ही ये सीन ख़त्म हुआ, दिलीप कुमार ज़ोर से बोले, “इस लड़की का नाम टुनटुन रख दो”। ये नाम इतना मक़बूल हुआ कि हर मोटी लड़की को इसी नाम से बुलाया जाता था।

टुनटुन ने 198 फ़िल्मों में, अपने दौर के लगभग सभी बड़े सितारों के साथ काम किया। हिन्दी के अलावा और भी भाषाओं की फ़िल्मों में काम किया। 1990 में आई, “क़सम धंधे की” इनकी आख़िरी फ़िल्म थी। सन् 2003 में इनका देहांत हो गया।

पितृसत्तात्मक समाज में रहते हुए, दुखों को झेलते हुए, इस महिला ने अपनी पहचान बनाई, कई लोगों की मुस्कुराहट की वजह बनी। चमकदार फ़िल्म उद्योग से यही उम्मीद है कि वो अपनी पहली महिला कॉमेडियन को इज़्ज़त बख़्शे।

टुनटुन के जज़्बे और खुशमिज़ाजी को हमारा सलाम।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

लखनऊ: साईकिल से छत्तीसगढ़ जा रहे मज़दूर दम्पति की सड़क हादसे में मौत

लखनऊ: साईकिल से छत्तीसगढ़ जा रहे मज़दूर दम्पति की सड़क हादसे में मौत
लखनऊ: साईकिल से छत्तीसगढ़ जा रहे मज़दूर दम्पति की सड़क हादसे में मौत

सौम्या केसरवानी | navpravah.com

उत्तर प्रदेश | लखनऊ में एक सड़क हादसे में 45 वर्षीय मजदूर और उसकी पत्नी की दर्दनाक मौत हो गई। दंपति अपने दो बच्चों को लखनऊ से साइकिल से लेकर छत्तीसगढ़ जाने के लिए निकला था, रास्ते में एक अज्ञात वाहन ने साइकिल को टक्कर मार दी, एक्सीडेंट में दंपति की मौत हो गई और दोनों बच्चे मामूली रूप से घायल हो गये।

लखनऊ पुलिस के अनुसार, घटना कल देर रात की है, मृतकों के नाम कृष्णा साहू और प्रमिला साहू हैं। आस पास के लोगों ने पुलिस को इसकी सूचना दी, पुलिस जब मौके पर पहुंची, तो कृष्णा और प्रमिला जमीन पर खून से लथपथ पड़े थे। साइकिल की हालत देखकर टक्कर का अंदाजा लगाया जा सकता था कि टक्कर कितनी तेज मारी गयी थी। पुलिस दोनों को लेकर नजदीकी अस्पताल पहुंची, लेकिन उन्हें नहीं बचाया जा सका।

पुलिस ने बताया कि कृष्णा लखनऊ में बतौर मजदूर काम करता था। लॉकडाउन की वजह से परिवार के लिए रोजी रोटी कमाना मुश्किल हो गया था, इसलिए दोनों अपने बच्चों सहित गांव जा रहे थे, लेकिन रास्ते में ही ये हादसा हो गया।

पुलिस टक्कर मारने वाले वाहन के बारे में पता लगा रही है, ऐसे में प्राथमिक उपचार के बाद बच्चों को उनके चाचा के सुपुर्द कर दिया गया, दंपति के दोनों बच्चें पांच वर्ष से कम उम्र के बताए जा रहे हैं।

VIZAG गैस काण्ड: “NGT ने एलजी पॉलिमर्स को 50 करोड़ रुपये जमा करने के निर्देश दिए, 5 सदस्यीय जाँच समिति का गठन

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

राष्ट्रीय हरित अभिकरण ने आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम गैस लीक कांड में स्वतः संज्ञान लिया है और मामले की सुनवाई भी शुरू कर दी गई है।

अभिकरण ने मामले की जांच करने के लिए पांच सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हुए, 10 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट अभिकरण के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

मामले की सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय हरित अभिकरण ने एलजी पॉलीमर कंपनी को ₹50 करोड़ विशाखापट्टनम जिला न्यायाधीश के पास जमा करने के निर्देश दिए हैं।

अभिकरण ने निर्देश दिए हुए कहा, “जीवन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान को ध्यान में रखते हुए, प्रथम दृष्टया तथ्यों के संबंध में, हम एलजी पॉलिमर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को निर्देश देते हैं कि वह जिलाधिकारी विशाखापट्टनम के पास 50 करोड़ रुपये की प्रारंभिक राशि जमा करे, जो कि अभिकरण के आगामी आदेशों का पालन करेंगे।”

न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ; न्यायमूर्ति श्यो कुमार सिंह, न्यायिक सदस्य और डॉ. नागिन नंदा, ने 5 सदस्यीय समिति, जिसमें न्यायमूर्ति बी.शेषनारायण रेड्डी, पूर्व न्यायाधीश, ए.पी. उच्च न्यायालय; प्रो. वी. वी. रामचंद्र मूर्ति, पूर्व कुलपति, आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम; प्रोफेसर पुलिपति राजा, रसायन इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख, आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम; सदस्य सचिव, सीपीसीबी; निदेशक, सीएसआईआर-भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान; और हेड, एनईईआरआई, विशाखापत्तनम शामिल हैं, को निर्देश दिया गया है कि, “जल्द से जल्द साइट का निरीक्षण करें और अगली तारीख से पहले अपनी रिपोर्ट दें।”

ख़राब तबीयत के चलते मुलायम सिंह यादव अस्पताल में कराए गए भर्ती

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के अस्पताल में भर्ती होने की खबर आई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मुलायम सिंह यादव यूरिन और पेट संबंधी समस्या से परेशान चल रहे हैं जिसके चलते उन्हें लखनऊ के मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती कराना पड़ा है।मेदांता के डाइरेक्टर डॉ. राकेश कपूर ने बताया कि बुधवार शाम सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव को भर्ती कराया गया। उनका पेट फूल रहा था। कई दिन से दस्त नहीं हो रही थी। जांच में पाया गया कि बड़ी आंत में समस्या है।

80 वर्षीय मुलायम सिंह यादव की हालत अब पहले से बेहतर बताई जा रही है। उन्हें मेदांता हॉस्पिटल में रूटीन चेकअप के लिए लाया गया था लेकिन डॉक्टरों ने सलाह दी की उन्हें भर्ती करा दिया जाये।

मुलायम सिंह यादव के पुत्र उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, छोटे भाई व पूर्व मंत्री शिवपाल यादव और पार्टी के अन्य नेता ना उनका हालचाल जानने अस्पताल पहुंचे और साथ ही मुलायम सिंह यादव के स्वस्थ होने की पार्टी प्रवक्ता द्वारा पुष्टि की गई है।

औरंगाबाद: मालगाड़ी ने घर लौटते मजदूरों को कुचला, 16 की मौत

न्यूज़ अपडेट | Navpravah Desk

औरंगाबाद महाराष्ट्र में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है जहाँ रेल की पटरी पर प्रवासी मजदूरों को एक मालगाड़ी ने कुचल दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार औरंगाबाद के जालना रेलवे लाइन के पास ये हादसा हुआ है, जिसमें 16 मजदूरों की मौत हो गई है जबकि कई अन्य मजदूर घायल बताए जा रहे हैं। ये हादसा औरंगाबाद-जालना रेलवे लाइन पर शुक्रवार सुबह 6.30 बजे के करीब हुआ है. रेल मंत्री ने इस घटना के जांच के आदेश दिए हैं.

ये सभी प्रवासी मजदूर अपने घर पैदल जा रहे थे, जिस दौरान ये हादसा हुआ. घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और रेलवे के अधिकारी मौके पर पहुंचे हैं.

ये सभी मजदूर मध्य प्रदेश के रहने वाले थे, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मृतक मजदूरों के परिवार वालों को 5-5 लाख रुपये का मुआवजा देने का ऐलान किया है. उन्होंने रेल मंत्री से बात कर घायलों की सहायता करने को कहा है.

रेलवे की ओर से बयान जारी:

चीफ पब्लिक रिलेशन ऑफिसर, सदर्न सेंट्रल रेलवे का कहना है कि औरंगाबाद में कर्माड के पास एक हादसा हुआ है, जहां मालगाड़ी का एक खाली डब्बा कुछ लोगों के ऊपर चल गया है। आरपीएफ और स्थानीय पुलिस मौके पर मौजूद है।

भारतीय रेलवे की ओर से इस हादसे को लेकर जो बयान जारी किया गया है, उसमें कहा गया है कि औरंगाबाद से कई मजदूर पैदल सफर कर आ रहे थे, कुछ किलोमीटर चलने के बाद ये लोग ट्रैक पर आराम करने के लिए रुके, उस वक्त मालगाड़ी आई और उसकी चपेट में कुछ मजदूर आ गए।

लॉकडाउन का जब पहली बार ऐलान हुआ था, उसके बाद से ही लाखों की संख्या में मजदूर जहां पर थे, वहां फंस गए थे. खाने, रोजगार की चिंता में लिप्त मजदूर पैदल ही अपने गांवों की ओर चल दिए थे, इसके पहले भी रास्ते में हुए कुछ एक्सिडेंट में प्रवासी मजदूर अपनी जान बीते दिनों गंवा चुके हैं.

गौरतलब है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में अब राज्य सरकारों की ओर से की गई सिफारिश पर स्पेशल श्रमिक ट्रेन चलवाई जा रही है। इस दौरान राज्य सरकारों की ओर से जो लिस्ट दी जा रही है उन्हें ही ट्रेन में सफर करने की इजाजत दी जा रही है।

विश्व सिनेमा की पहली पूर्ण अभिनेत्री: “लिलियन गिश”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk

विश्व सिनेमा ने जिस पैमाने पर मानव सभ्यता को प्रभावित किया है, शायद ही किसी और माध्यम ने कभी किया। आज पूरे विश्व के लगभग हर देश में फ़िल्में बनती हैं और हर तरीके की फ़िल्में बनती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात तो ये है कि हर तरीके की फ़िल्मों के दर्शक भी हमेशा होते हैं। ठीक कहती थीं लिलियन गिश कि “छापेखाने के बाद, सबसे प्रभावशाली आविष्कार, फ़िल्म विधा है।”

लिलियन गिश (PC-Masslive)

लिलियन गिश, जिसका सौन्दर्य अप्रतिम था, मिस लिलियन जो यादगार क़िस्सों का हिस्सा थी, लिलियन जो सिनेमा के साथ ही पैदा हुई, लिलियन डायना गिश, जो विश्व सिनेमा की पहली वास्तविक अभिनेत्री थी।

“वास्तविक अभिनेत्री” इसलिए क्योंकि पहली फ़ीचर फ़िल्म, जो 12 रील और 3 घंटे की थी, वो डेविड ग्रिफ़िथ की, 1915 में आई “द बर्थ ऑफ़ ए नेशन” थी और यही वो पहली फ़िल्म थी, जिसे वाईट हाउस में प्रदर्शित किया गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने कहा था कि ये फ़िल्म, “विद्युत से लिखित इतिहास” है। हालांकि ये मूक फ़िल्म थी और इसमें लिलियन के अलावा और अभिनेत्रियां भी थीं, लेकिन इनका रोल बड़ा था और यही याद भी रहीं।

The Birth of a Nation (1915) में लिलियन गिश

लिलियन गिश ने ठीक अगले ही साल, ग्रिफ़िथ की ही फ़िल्म, “इनटॉलरेंस”, बहैसियत हिरोइन की। लिलियन की मां, रंगमंच पर काम करती थीं और थोड़ा बड़ा होने पर लिलियन और उनकी बहन डॉरोथी ने भी मंच पर काम करना शुरू कर दिया। डॉरोथी भी आगे चलकर मशहूर अभिनेत्री बनीं। लिलियन ने कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली थी अभिनय की, लेकिन इतने ईमानदारी और मेहनत से काम किया कि उनकी ख्याति, पूरे विश्व में फैली।

The Wind (2018) में लिलियन गिश

जब सवाक् फ़िल्मों का दौर आया, तो धीरे धीरे इन्होंने फ़िल्मों से किनारा किया और टेलीविज़न पर काम किया। लिलियन ने फ़िल्म  की पेचीदगी भरी बारीकियां ख़ुद सीखीं।

“1930 के दशक में कई अभिनेत्रियां आईं जिनके ख़ूबसूरती की चर्चा आज भी होती है, लेकिन हॉलीवुड के विशेषज्ञों की मानें तो, ” इन सभी ग्लैमर कन्याओं की संपूर्ण सेक्स अपील पर लिलियन की उंगलियों का क्लोज़ अप भी भारी था।” लिलियन बेहद ख़ूबसूरत थीं।”

फ़िल्मों में क्लोज़ अप और फ़ेड आउट तकनीक के साथ काम करने वाली वे पहली अभिनेत्री थीं। रॉबर्ट एल्टमैन ने अपनी 1978 में आई फ़िल्म, ” ए वेडिंग ” में लिलियन को फ़िल्मों की सौवीं भूमिका एक श्रदधापूर्ण भेंट के रूप में दी।

जीवन के दो क्षणों में लिलियन

लिलियन, रंगमंच से सिनेमा में आईं, सिनेमा से टेलीविज़न होते हुए वापस रंगमंच पर चली गईं। वे लगभग सौ साल ज़िंदा रहीं, जिसमें से 75 साल सिनेमा और अभिनय को दिए । 1992 में, लिलियन चल बसीं।

विश्व सिनेमा की प्रथम अभिनेत्री को सादर प्रणाम।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

भूली हुई यादें- “नाज़िर हुसैन”

डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk

हर शख़्स बुलबुला है, इस फ़ानी दुनिया में, हस्ती बस बनने और ग़ायब होने के बीच के वक़्फ़े में है। इन्हीं थोड़े से लम्हात में कुछ कर गुज़रना होता है। कुछ शख़्स ये जानते हैं और असर पैदा कर के रुख़सत होते हैं यहां से। उनके जाने के बाद भी उनकी यादें आती हैं और किसी मशहूर क़िस्से के किरदार की तरह हमारे ख़यालों की किताबों में, उनका आना जाना लगा रहता है। नाज़िर हुसैन भी ऐसे ही एक किरदार का नाम है, जो कई बार हमें ज़िंदगी के रंग दिखाता रहा। कभी ज़ुबान बदली, तो कभी लिबास और हर वो रंग बांट कर गया, जो उसे ज़िंदगी ने दिए थे।

नाज़िर हुसैन (PC-Cinestaan)

1922 में, ऊसिया गांव, जो कि ग़ाज़ीपुर में है, दिलदारनगर से थोड़ी दूर पर, नाज़िर हुसैन, साहबज़ाद ख़ान के यहां पैदा हुए। ग़ाज़ीपुर की महान धरती से, अदब और अदाकारी की दुनिया की अज़ीम शख़्सियतों का राबता रहा है और चाहे डॉ० राही मासूम रज़ा हों, युनुस परवेज़ हों या कुबेरनाथ राय हों या और भी कई नामों में से कोई हो, सबने संस्कारों की पताका और मिट्टी की ख़ुशबू को साथ ही रखा है और पूरी दुनिया में अमन और तरक्क़ी का पैग़ाम पहुंचाया है।  नाज़िर हुसैन के वालिद, रेलवे में गार्ड की नौकरी करते थे और उनका ज़्यादातर समय लखनऊ में बीता, सो इन्होंने भी अवध की चाशनी में अल्फ़ाज़ों को डुबाना, वहाँ सीख लिया। थोड़े बड़े हुए तो रेलवे में नौकरी भी लग गई नाज़िर हुसैन साहब की, बतौर फ़ायरमैन। लेकिन ये सिलसिला लंबा न चला। ज़िंदगी और भी तजुर्बे देना चाहती थी इन्हें। दूसरा जंग-ए-अज़ीम दुनिया पर क़हर बन कर टूटा था और ब्रिटिश सेना, जंग के मैदान में जो ख़ून बहा रही थी, उनमें से ज़्यादातर, हिंदुस्तानी सैनिकों का था। नाज़िर भी सेना में भर्ती हुए और इन्हें मलेशिया और सिंगापुर में लड़ाई के लिए भेज दिया गया। वहाँ ये बंदी बना लिए गए, और भी कई सैनिकों के साथ। जब आज़ाद हुए वहाँ से, तो आंखों में आज़ाद हिन्दुस्तान के सपने लिए, नेता जी के आज़ाद हिन्द फ़ौज में भर्ती हो गए।

फ़िल्म ‘आया सावन झूम के’ में धर्मेन्द्र,बिंदु के साथ नाज़िर हुसैन (PC-Cinestaan)

आज़ाद हिन्द फ़ौज और नेता जी के साथ यहाँ के सियासतदानों ने क्या किया, ये एक अलग कहानी है, लेकिन जिस देश के लिए, उस फ़ौज के साथ नाज़िर लड़े, उसी देश में एक अदद नौकरी को तरस गए, क्योंकि, उस दौर में, आज़ाद हिन्द फ़ौज से किसी भी सूरत में जुड़े रहे लोगों से दूरी बना कर रहते थे। नाज़िर हुसैन के लिए, ये सूरत-ए-हाल, सितारों की एक ख़ूबसूरत साज़िश साबित हुई और इन्होंने बी०एन० सरकार के साथ मिलकर नाटक करना शुरू किया। यहीं उनकी मुलाक़ात, महान बिमल रॉय से हुई।

“50 का दशक शुरू हो चुका था और जंग के बाद फिर से दुनिया अपने ऊपर लगे धूल को झाड़कर उठ जाने को बेचैन थी। ये बेचैनी, नाज़िर हुसैन के दिल में भी थी। वे सब कुछ बताना चाहते थे, उस फ़ौज के बारे में, उस आज़ादी की दीवानगी के बारे में, जिसे इन्होंने जीया था। बिमल रॉय के साथ, 1950 में, इन्होंने एक फ़िल्म बनाई, जिसका नाम था, “पहला आदमी”। इस फ़िल्म में न केवल ऐक्टिंग की, पटकथा और डायलॉग भी लिखे नाज़िर हुसैन ने। “

इसके बाद नाज़िर हुसैन, बिमल रॉय की, “दो बीघा ज़मीन” और “देवदास” में भी नज़र आए। सुबोध मुखर्जी, जो कि उस ज़माने के बड़े निर्माता थे, उनके साथ देव आनंद की फ़िल्म, “मुनीम”, में भी ये नज़र आए। देव आनंद की कई फ़िल्मों में इन्होंने काम किया। नाज़िर हुसैन ने अपने दौर के हर बड़े सितारे के साथ काम किया। इन्होंने न केवल ऐक्टिंग की, निर्देशन भी किया, लेखन भी किया।

फ़िल्म ‘ज्वेल थीफ़’ के एक दृश्य में देवानंद और नाज़िर हुसैन (PC-Cinestaan)

इनकी अदाकारी, इतनी सहल अंदाज़ थी कि चाहे गांव का मजबूर किसान बनना हो, चाहे रिक्शा खींचने वाला या अमीर ज़मींदार, हर किरदार में ये ज़बरदस्त दिखते थे। इनके चेहरे पर जो भाव उभरते थे, वो इतने सच्चे दिखते थे कि ये तुरंत दर्शकों से जुड़ जाते थे। इन्होंने 500 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया।

तत्कालीन राष्ट्रपति, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद से कई बार चर्चा कर के, इन्होंने भोजपुरी फ़िल्म उद्योग की रूप रेखा बनाई और इस सपने को साकार भी किया। 1962 में आई पहली भोजपुरी फ़िल्म, “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो”, इन्होंने ने ही लिखी थी। इसके बाद भी, “हमार संसार” और “बलम परदेसिया”, जैसी फ़िल्मों के निर्माण, निर्देशन और लेखन में, ये सक्रिय रहे। इसी कारण इन्हें, भोजपुरी फ़िल्मों का “पितामह” भी कहा जाता है।

पार्श्वगायक मो.रफ़ी और नाज़िर हुसैन

नाज़िर हुसैन ने भोजपुरी फ़िल्मों को वो मुक़ाम दिया था कि मो० रफ़ी और लता मंगेशकर जैसे महान कलाकार भी भोजपुरी फ़िल्मों में ख़ुशी से गाते थे। “लिपस्टिक” वाले गाने से भोजपुरी को जोड़कर पूरी दुनिया में इसकी मानहानि कराने वाले लोग, “ठीक है” और “बगलवाली” को पूरी भोजपुरी कला मानने वाले लोग, भिखारी ठाकुर और महेन्द्र मिश्रा की विरासत को भूल जाने वाले लोग, बहुत पीछे धकेल चुके हैं उस सपने को जो नाज़िर हुसैन ने देखा था। आज भोजपुरी, पिछड़ेपन और मज़ाक वाली भाषा बनकर रह गई है। नाज़िर हुसैन को सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में हम ये वादा दे सकते हैं कि हम फिर से याद दिलाएंगे दुनिया को कि हमारी बोली में जादू है, जो एक पल में किसी को अपना बना लेती है।

1987 में नाज़िर हुसैन साहब चल बसे, आज अगर वे होते तो भोजपुरी फ़िल्म उद्योग फूहड़पन से काफ़ी दूर पूरी दुनिया में बहुत ऊंचे मुक़ाम पर होता।

नाज़िर साहब, आप हमारी यादों में ज़िंदा रहेंगे।

(लेखक जाने-माने साहित्यकार, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)