28 C
Mumbai
Monday, August 10, 2026
Home Blog Page 1089

यूनाइटेड नेशन्स के हेडक्वार्टर में होगी फ़िल्म ‘पिंक’ की स्पेशल स्क्रीनिंग

शिखा पाण्डेय,

बिग बी अमिताभ बच्चन की हाल में आयी फिल्म ‘पिंक’ को यूनाइटेड नेशन्स के हेडक्वार्टर, न्यूयॉर्क में स्क्रीनिंग के लिए आमंत्रित किया गया है। अमिताभ बच्चन ने खुद अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करके यह खबर अपने फैन्स को दी है।

16 सितंबर को रिलीज हुई पिंक को अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने निर्देशित किया था। इस फिल्म में अमिताभ के अलावा एक्ट्रेस तापसी पन्नु, एंड्रिया तरंग और कृति कुल्हारि ने काम किया है। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कलेक्शन करते हुए एक हफ्ते में कुल 35.91 करोड़ की कमाई की थी।

अमिताभ ने लिखा, “पिंक को स्पेशल स्क्रीनिंग के लिए यूएन हेडक्वार्टर, न्यूयॉर्क में आमंत्रित किया गया है… असिस्टेंट सेक्रेटरी जनरल द्वारा… गौरवांवित।” भले ही फिल्म 100 करोड़ क्लब में शामिल नहीं हो सकी है, लेकिन फिर भी आंकड़ों के मुताबिक ऐसा लगता है कि यह एक अच्छी फिल्म है और लोग इसे पसंद कर रहे हैं।

फिल्म की कहानी दिल्ली में रहने वाली 3 लड़कियों के इर्द गिर्द घूमती है, जो आत्मरक्षा के प्रयास में एक मंत्री के भतीजे को घायल कर देती हैं। इस मामले में कानूनी दाव-पेंच में फंसने के बाद अमिताभ बच्चन उनकी मदद करते हैं। समाज में महिलाओं के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार और लैंगिक हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर बनाई फिल्म के निर्माता शूजीत सरकार हैं।

एक और सरकारी झटका, 1 दिसंबर के बाद बंद हो सकती है गैस सब्सिडी!

सौम्या केसरवानी,

पेट्रोलियम कंपनियों ने 1 दिसंबर से उन उपभोक्ताओं को सब्सिडी वाला गैस सिलेण्डर सप्लाई ना करने का निर्णय किया है, जो केवाईसी सत्यापन के बिना चल रहे हैं। 1 दिसंबर से ऐसे उपभोक्ताओं को मल्टीपल सिंलेडर की श्रेणी में मानकर, इनका सब्सिडी सिलेंडर का कोटा बंद कर दिया जाएगा।

अगर आप भी अभी तक बिना केवाईसी सत्यापन के गैस सिलेण्डर इस्तेमाल कर रहें हैं, तो 30 नवंबर तक अपने बैंक अकाउंट से आधारकार्ड जुड़वा लें। जिन ग्राहकों के आधार कार्ड बैंक खाते और एजेंसी के कंज्यूमर नंबर के लिंकअप हो चुके हैं, उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है।

मालूम हो कि लखनऊ में कुल 7.83 लाख एलपीजी उपभोक्ता हैं। सर्वे में सामने आया है कि इनमें से 2.5 से 3 फीदसी ने अब तक आधार लिंकअप नहीं कराया। आकड़ों के मुताबिक अभी लखनऊ में 22 हजार एलपीजी उपभोक्ता बगैर आधार लिंकअप ही सब्सिडी कोटे का फायदा उठा रहे हैं। इन 22 हजार एलपीजी कनेक्शन में से 11 हजार से अधिक कनेक्शन इंडियन ऑयल एजेंसी के हैं। वहीं, 5800 से अधिक कनेक्शन हिंदुस्तान पेट्रोलियम के हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आधार को बैंक अकाउंट से लिंकअप न कराने वाले एलपीजी उपभोक्ताओं को नोटबंदी के कारण समस्या हो सकती है। आधार लिंकअप कराने आने वाले ग्राहकों को बैंक कर्मचारी व्यस्तता बताकर चलता कर रहे हैं। वहीं आईओसी निदेशक ने बताया कि ‘उज्जवला योजना’ के तहत गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन अगले महीने से मिल सकेंगे। जिसमें 15 हजार से अधिक लाभार्थियों को कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया है।

जन-धन खातों में जमा हुई रकम में यूपी नंबर 1

सौम्या केसरवानी,

नोटबंदी के बाद ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि लोग अपने जमा पैसों को भिन्न-भिन्न तरह से जमा करने की कोशिश करेंगे। इनमें प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा शुरू की गयी जन-धन योजना का इस्तेमाल इतने बड़े पैमाने पर होगा, इसका अंदाजा शायद ही किसी ने लगाया होगा। आपको बता दें कि नोटबंदी के बाद जन-धन खाते में देश भर से जमा हुये रूपये का आंकड़ा 64,252.15 करोड़ हो गया है।

जन-धन खातों में नोटबंदी के बाद सबसे ज्यादा पैसा जमा होने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। उत्तर प्रदेश में जन-धन खातों में 10,670 करोड़ रुपए जमा हुए हैं। यह जानकारी वित्त राज्य मंत्री संतोष गंगवार ने लिखित जवाब में लोकसभा सदन में दी।

पहले स्थान पर उत्तर प्रदेश, दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल, तीसरे स्थान पर राजस्थान है। वित्त राज्य मंत्री संतोष गंगवार द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार 25.58 करोड़ प्रधानमंत्री जन धन एकाउंट्स में 16 नवंबर तक 64,252 करोड़ रुपए जमा हुए हैं।

उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 3.79 करोड़ खातों में सबसे अधिक 10,670 करोड़ की राशि जमा हुई। पश्चिम बंगाल के 2.44 करोड़ खातों में 7,826 करोड़ रुपये जमा हुए हैं। राजस्थान के 1.89 करोड़ खातों में 5,345.57 करोड़ रुपए जमा हुये हैं। 25.58 करोड़ जन धन खातों में से 5.98 करोड़ खाते जीरो बैलेंस वाले हैं।

परिवार से अलग अब जाकर नोटबन्दी पर जाया ने खोली ज़बान, कहा,” मोदी स्वर्गवासी बना देंगे”

शिखा पाण्डेय
नोट बंदी पर देश की तमाम जनता के साथ कई बॉलीवुड हस्तियों ने अपना समर्थन व्यक्त किया था, जिनमें बिग बी अमिताभ बच्चन सबसे पहले नज़र आये थे। उसके बाद बेटे अभिषेक व बहू ऐश्वर्या ने भी अपना समर्थन दिया था, लेकिन शीर्ष अभिनेत्री रहीं पत्नी जया, जो सपा से राज्यसभा सदस्य भी हैं, उन्होंने अब जाकर परिवार से अलग अपनी स्वतंत्र राय दी है।
जया का कहना है कि प्रधानमंत्री का फैसला गलत नहीं है, उसे लागू करने का तरीका बिलकुल गलत है। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गए इस फैसले पर व्यंग बाण चलाते हुए यह भी कहा कि प्रधानमंत्री 50 दिनों में देश को स्वर्ग बना देंगे और देशवासियों को स्वर्गवासी। इस बयान से साफ़ है कि यह बयान किसी मनोरंजन जगत से जुड़े शख्स से अधिक एक विरोधी पार्टी के राजनेता के तौर पर दिया गया है।

​मैं पहले नक्सल, फिर इन्टरनेट हिन्दू और फिर संघी बनाया गया: विवेक अग्निहोत्री (फिल्मकार)

आनंद रूप द्विवेदी,

मशहूर फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने गोवा में “इंडिया आइडियाज कॉन्क्लेव-2016” को संबोधित करते हुए पत्रकारिता जगत पर अपने विचार व्यक्त किए। अपनी बेबाक छवि के लिए प्रसिद्द विवेक अग्निहोत्री ने बेहद संजीदगी से “मीडिया, फिल्म जगत और समाज के हित में इनके योगदान” से सम्बंधित कुछ सवालिया निशान खड़े किये।
पत्रकारों और फिल्म जगत के सामाजिक सरोकार पर बोलते हुए विवेक ने अपनी बात की शुरुआत बेहद दिलचस्प अंदाज़ में कॉलेज के दिनों से की। उन्होंने बताया कि अपने छात्र जीवनकाल में कैसे कॉलेज प्रशासन द्वारा नेताओं की जी हुजूरी किये जाने की खिलाफत करने पर उन्हें “नक्सल” करार दे दिया गया था।
मीडिया और फ़िल्मी जगत के रवैये का जिक्र करते हुए विवेक ने कहा कि, “2014 में नरेंद्र मोदी की चुनावी दौड़ के विरोध में नामचीन फ़िल्मी हस्तियों और विद्वानों द्वारा एक कैम्पेन चलाया गया था। एक लेटर लिखा गया, जिसमें फासीवादी सरकार चुनी जाए इसका विरोध करना चाहिए ये मूल मुद्दा था।

सबके पास इसमें हस्ताक्षर किये जाने के लिए भेजा गया, लेकिन जब मेरे पास ये लेटर आया तो मैंने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और ऐसा करने वाला मैं पहला व्यक्ति था।
एक चैनल ndtv जो बरखा द्वारा संचालित है, उन्होंने मुझे 9 बजे एक शो में आमंत्रित किया, जिसके पैनल में नंदिता दास, आनंद पटवर्धन, जैसे दिग्गज मौजूद थे जोकि बीसियों सालों से मोदी विरोधी, आरएसएस विरोधी बातें करने के लिए जाने जाते हैं। मेरा राजनीति से कोई लेना देना नहीं और मैं केवल ऐसा व्यक्ति था, जिसने उपरोक्त लेटर में हस्ताक्षर किये थे बाकी सब पहले ही हस्ताक्षर कर चुके थे। चूंकि मैं ऐसे टीवी डिशकशन के लिए एकदम नया था और सभी ने मुझपर अचानक अपने शब्दों से हमला शुरू कर दिया। ऐसे में मैंने एक पलटवार किया और बरखा से कहा, “आप सभी किसी इंटेलेक्चुअल माफिया जैसा बर्ताव क्यों कर रहे हैं?” और वो अंतिम दिन था जब मैं ndtv में गया और अगले 30 मिनट तक किसी ने मुझे बोलने के लिए माइक तक नहीं दिया।”
आगे अपने अनुभवों के बारे में बात करते हुए विवेक ने कहा कि, “कुछ वर्षों के बाद पिछले वर्ष ही जब कन्हैया एपिसोड शुरू हुआ मैंने उन्ही बरखा दत्त को ये चिल्लाते हुए सुना कि “सभ्यता के लिए स्थान का संकुचन हो रहा है।” ये सुनकर मैंने अनायास कहा, “वाह, ये बेहद प्रतिभाशाली बात है।” इसीलिए मैं कहता हूँ कि मेरी मतभिन्नता आपकी मतभिन्नता से कहीं बेहतर है। मेरी इन्ही बातों की वजह से फिल्म जगत में काम करने के मेरे अवसरों में कमी हो गई। सोशल मीडिया पर किसी ने मुझे “इन्टरनेट हिन्दू” करार दे दिया। उस दिन से मैं नक्सल से इंटरनेट हिन्दू हो गया।
जब देश में असहिष्णुता और अवार्ड वापसी का दौर चला, तब अनुपम खेर ने मुझे अपने कैम्पेन में शामिल होने के लिए कहा लेकिन राजनीति में मेरी अरुचि के कारण कैने मन कर दिया। मैंने टीवी में देखा अवार्ड वापसी की अगुवाई शीर्ष विद्वान अशोक बाजपेई कर रहे हैं। मुझे अचानक याद आया 1974- 75 में अशोक बाजपेई, जिन्होंने स्वयं शरद जोशी और दुष्यंत कुमार जैसे साहित्यकारों को सस्पेंड कर दिया था, क्योंकि इन दोनों ने एक समारोह में सम्मिलित होने से मना कर दिया था। समारोह में इंदिरा आने वाली थीं। ये इमरजेंसी के कुछ महीनों पहले की बात है। 1975 में दुष्यंत कुमार की हार्ट अटैक के कारण मृत्यु हो गई, और शरद जोशी जी मृत्यु अभाव के चलते हो गई। ये असली चेहरा है, इमरजेंसी का जब रचनात्मक लोग इस तरह मारे जाते हैं। जब अशोक बाजपेई को मैंने अवार्ड वापसी की अगुवाई करते हुए देखा तो फिर मेरे मुह से निकला, “वाह”। तब मैंने अनुपम खेर से उनके कैम्पेन में शामिल होने के लिए कहा। उस दिन से सबने मुझे “संघी” कहना शुरू कर दिया और मैं एक संघी हो गया।
मेरी तथाकथित फिल्म “बुद्धा इन द ट्रैफिक जाम” जिसे JNU के मीडिया स्टडी सेंटर के डीन ने प्रदर्शित करने से मना कर दिया। ये कन्हैया वाली घटना का समय था, जब देश के सभी दिग्गज पत्रकार चिल्ला रहे थे कि देश में मतभिन्नता के लिए स्थान संकुचित हो रहा है। उसी समय एक बेहद आवश्यक फिल्म आई, आवश्यक इसलिए नहीं क्योंकि ये मेरी फिल्म थी बल्कि इसलिए, क्योंकि ये पहली ऐसी फिल्म है जिसमें इस सम्भावना का जिक्र किया गया है कि मीडिया, NGOs, और नक्सलवाद (नक्सल-अकादमिया-इंटेलेक्चुअल-मीडिया नेक्सस) के बीच में सम्बन्ध है, ये सत्य हैकि सम्बन्ध है। कोई एक पत्रकार भी सामने नहीं आया, जिसने फिल्म को सपोर्ट किया हो। जादवपुर विश्वविद्यालय में मेरी कार पर हमला हुआ, मेरा कन्धा टूट गया, मैं मदद की गुहार लगाता रह गया, लेकिन आपको जानकार आश्चर्य होगा कि मेरी मदद के लिए कौन सामने आया, ये भारत के साधारण छात्र थे।”
विवेक अग्निहोत्री मीडिया की सहभागिता पर बात करते हुए कहते हैं, “जब मैं इन छात्रों-पत्रकारों से बात करता हूँ, तो वो पूछते हैं कि हम इतनी मेहनत करते हैं, जिसका उचित पारिश्रमिक भी नहीं मिलता फिर भी हमें “prestitutes” जैसे शब्दों का सामना क्यों करना पड़ता है? मेरे मत में आज का बड़े से बड़ा पत्रकार स्वयं को सही साबित करने में लिप्त रहता है।

अगर आप फिल्मों की ही बात करें तो साठ के दशक तक की फिल्मों का पत्रकार समाज के हित के लिए लड़ता हुआ दिखाया जाता था। वहीं आज के समय में इस परिस्थिति में भारी परिवर्तन आया है, जब वही पत्रकार एक शहरी व्यक्ति हो चुका है, जो जींस पहनता है और लड़कियों के साथ कभी कभार गाना भी गा लेता है, लेकिन समाज के हित से उसका अब कोई सरोकार नहीं रहा। वो अब समाज के लिए नहीं बल्कि अपने लोगों के लिए लड़ता है। आज फिल्मों में पत्रकार को भ्रष्ट, अमीर, गंदगी से भरे हुए व्यक्ति के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। आज के मीडिया ने सभ्य होने की पात्रता को खो दिया है। अब पत्रकार केवल TRP का भूखा होता है। ऐसे में कोई एलियन आकर ही उसे समझा सकता है कि आम आदमी और समाज के हित की पत्रकारिता का क्या महत्त्व है।

क्यूबा के दिग्गज क्रन्तिकारी नेता फिदेल कास्त्रो का लंबी बीमारी के बाद निधन, दुनिया भर के नेताओं ने जताया शोक

शिखा पाण्डेय

लागभग 50 वर्षों तक क्यूबा की सत्ता संभालने वाले वहां के पूर्व दिग्गज नेता व पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो का निधन हो गया है। वे 90 साल के थे। क्यूबा के मौजूदा राष्ट्रपति और फिदेल के भाई राउल कास्त्रो ने राज्य के टेलीविजन पर उनके निधन की जानकारी दी। कास्‍त्रो क्‍यूबा के 17वें राष्‍ट्रपति थे। वे लंबे समय से अस्‍वस्‍थ चल रहे थे। दुनियाभर के नेताओं ने कास्‍त्रो के निधन पर शोक जताया है।

क्‍यूबा के एक राष्‍ट्रीय न्‍यूज चैनल ने राष्‍ट्रपति राउल कास्‍त्रो के हवाले से फिदेल कास्त्रो के निधन की पुष्टि की है। फिदेल कास्त्रो क्यूबा के राष्ट्रपति और पीएम दोनों रह चुके थे। कास्त्रों ने लगभाग 50 साल तक क्यूबा की सत्ता संभालने के बाद 2008 में अपने भाई राउल को आगे कर दिया। वह 1959 से 1976 तक क्यूबा के प्रधानमंत्री रहे और 1976 से 2008 तक वहां के राष्ट्रपति रहे। मौजूदा राष्ट्रपति राउल ने टीवी पर कहा, “क्यूबा क्रांति के नेता का शुक्रवार 22.29 पर निधन हो गया।”

2008 में उन्‍होंने राजनीति से सन्‍यास भले ले लिया था, लेकिन वे एक राजनीतिक सलाहकार के रूप में सरकार से जुड़े थे। इसी साल अगस्‍त में फिडेल कास्‍त्रो ने अपना 90वां जन्‍मदिन मनाया था। आपको बता दें कि फिदेल कास्‍त्रो अमेरिका और क्‍यूबा के संबंधों को लेकर काफी सुर्खियों में रहे थे। क्‍यूबा में 1959 में हुई क्रांति से उपजे फिडेल कास्‍त्रो ने अमेरिका को कड़ी चुनौती दी थी। पड़ोसी होने के बावजूद दोनों देशों के संबंधों में काफी खटास थी। हाल ही में ओबामा ने इस दूरी को पाटने का भरसक प्रयास भी किया। 

ट्रम्प के जीतते ही हिजाब पहनने वाली महिलाओं का जीना हुआ दूभर, सारे आम बुलाई जा रहीं आतंकवादी!

शिखा पाण्डेय

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जीत से जिस साम्प्रदायिकता के भड़कने का खतरा भाँपा जा रहा था, वह सही होता नज़र आ रहा है।अब डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद मुस्लिमों को निशाने पर लिया जा रहा है। भेदभाव की ऐसी एक घटना न्यू मैक्सिको में घटी। वहां के एक स्टोर में हिजाब पहनी एक महिला को एक अन्य ग्राहक ने आतंकवादी कहकर संबोधित किया और हिजाब पहनी महिला को देश से बाहर चले जाने को कहा। 

सीबीएस से संबद्ध केआरक्यूई टीवी ने खबर दी है कि घटना न्यू मेक्सिको में अलबुकर्क के स्मिथ्स स्टोर की है। यह नई घटना है जिसमें डोनाल्ड ट्रंप के जीतने के बाद हिजाब पहनी महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। अमेरिकी टीवी स्टेशन ने स्मिथ्स के प्रबंधक से बुधवार को हुई घटना के बारे में पूछा तो उन्होंने भी इस घटना की पुष्टि की।

बर्नी लोपेज नाम के एक चश्मदीद ने बताया, ‘‘मैं सोडा लेने के लिए नीचे गलियारे में गया था और अचानक से मैंने किसी को एक हिजाब पहनी महिला पर चिल्लाते सुना।’’ उन्होंने कहा, ‘‘उसे कहा जा रहा था ‘हमारे देश से चले जाओ’, तुम यहां के नहीं हो। तुम आतंकवादी हो।’’ लोपेज ने कहा कि उस वक्त सब लोग ठहर से गए और हिजाब पहनी महिला के बचाव के लिए दौड़ पड़े।

लोपेज ने हिजाब पहनी महिला पर चिल्लाने वाली महिला की तस्वरी खींच ली है, जिसमें महिला ने एक टोपी पहनी हुई है और उसने धूप का चश्मा लगाया हुआ है। उन्होंने बताया कि कर्मचारी चिल्लाने वाली महिला को स्टोर से बाहर ले गए लेकिन चिल्लाने वाली महिला हिजाब पहनी महिला का पार्किंग स्थल पर इंतजार करने लगी। उन्होंने कहा कि स्मिथ्स के सभी कर्मचारी महिला के चारों ओर इकट्ठा हुए और उसे उसकी कार तक छोड़ा तथा उसका सामान उसकी गाड़ी में रखा। 

संविधान दिवस: जानें क्यों है भारतीय संविधान सबसे ख़ास 

रिपोर्ट- अनुज हनुमत,

संपादन- आनंद रूप द्विवेदी,

आज 26 नवंबर के दिन भारत अपना संविधान दिवस मना रहा है। दरअसल संविधान दिवस की शुरुआत मौजूदा सरकार के द्वारा 2015 से हुई, जब ड्राफ्टिंग कमेटी के अगुवा डॉ अम्बेडकर के जन्मवर्ष को 125 साल पूरे हुए। भारतीय संविधान विश्व का वृहत्तम संविधान है, जिसे बनाने में 2 साल 11 महीने 18 दिन लगे।

डॉ अम्बेडकर ने अपनी अस्वस्थता के चलते हुए इस समय अंतराल में बतौर ड्राफ्टिंग कमेटी अध्यक्ष संविधान का मसौदा डॉ राजेन्द्र प्रसाद को आज की तारीख (26 नवंबर 1949) पर ही सौंप दिया था। इसी दिन को हम संविधान दिवस के रूप में मनाते हैं।

क्या है गणतंत्र दिवस:  2 महीने बाद जब 26 जनवरी 1950 को संविधान पारित हुआ और गणतंत्र दिवस की शुरुआत हुई।

विशेषता: 25 भागों वाले इस वृहत्तम संविधान में 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियाँ और 101 संशोधन शामिल हैं। हाल में ही GST को लेकर संशोधन किया गया था।

क्या है प्रस्तावना और उसका उद्देश्य?

संविधान कि शुरुआत प्रस्तावना से होती है। दरअसल प्रस्तावना महज एक नोट नहीं है, बल्कि इसके हर शब्द में भारत गणतंत्र की आत्मा को समाहित किया गया है। इसके माध्यम से संविधान का सार, अपेक्षाएं, उद्देश्य तथा लक्ष्य का निर्धारण किया गया है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है। इसी कारण यह ‘हम भारत के लोग’ – इस वाक्य से प्रारम्भ होती है।

केहर सिंह बनाम भारत संघ के वाद में कहा गया था कि संविधान सभा भारतीय जनता का सीधा प्रतिनिधित्व नही करती, अत: संविधान विधि की विशेष अनुकृपा प्राप्त नही कर सकता, परंतु न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए संविधान को सर्वोपरि माना है, जिस पर कोई प्रश्न नही उठाया जा सकता है।संविधान की प्रस्तावना 13 दिसम्बर 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा पास की गयी। प्रस्तावना को आमुख भी कहते हैं।

संविधान की प्रस्तावना:

“हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।“

भारतीय संविधान के प्रति सम्पूर्ण आस्था देशवासियों का प्रथम कर्तव्य है। कुछ लोग अपने मूल अधिकारों के प्रति अति सचेत होते हैं, किन्तु अपने मूल कर्तव्यों के प्रति असंवेदनशील पाए जाते हैं। स्पष्ट है कि किसी भी मूल अधिकार के पात्र आप तभी बनेंगे जब आप कर्तव्य का निर्वहन करें।

संविधान की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह निरर्थक है, क्योंकि इसे हम मामूली साहित्य समझने की भूल न करें। लोकतंत्र कि कल्पना एक सुदृढ़ संविधान के बिना कल्पना और फंतासी मात्र है। समस्त देशवासियों को गर्व होना चाहिए कि संसार में सबसे अधिक मूल अधिकार, स्वतंत्रताएं उन्हें अपने संविधान द्वारा ही प्रदत्त हैं।

“एक चुटकी ‘समाजवादी नमक’ की कीमत तुम क्या जानो मोदी बाबू”!

शिखा पाण्डेय,

भावनाओं से भरा भारत देश ‘एक चुटकी नमक का क़र्ज़’ के नाम से बड़ा इमोशनल हो जाता है। हिंदी फिल्मों में भी नमक का क़र्ज़ चुकता करने के किस्से अक्सर भारतीय जनता को भावुक कर जाते हैं। अब समाजवादी पार्टी ने भी जनता को इसी ‘नमक’ के एहसान तले दबाकर, उनके वोट बटोरने का सुपर प्लान बनाया है और इसके तहत सपा समाजवादी पेंशन, समाजवादी लैपटॉप, समाजवादी स्मार्टफोन, समाजवादी एंबुलेंस के बाद अब लेकर आ गई है ‘समाजवादी नमक’।

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शुक्रवार को यही ‘समाजवादी नमक’ लांच किया। समाजवादी नमक को पायलेट प्रोजेक्ट के तौर पर 10 जिलों में लौंच किया जायेगा। हालांकि यह सरकारी योजना का हिस्सा है, जिसके तहत गरीब लोगों को आयोडीन युक्त नमक मुहैया कराया जाना है, लेकिन मौसम चुनावी है। इसलिए इसे राजनीतिक नजरिये से देखा जाना स्वाभाविक है।

पहले चरण में जिन 10 जिलों में  60 हजार मीट्रिक टन ‘समाजवादी नमक’ बांटा जाएगा, वे हैं लखनऊ, सिद्धार्थनगर, मुरादाबाद, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, हमीरपुर, फैजाबाद, संतकबीरनगर, मऊ। यूपी सरकार की ओर से इसके लिए 48.52 करोड़ की अनुदान राशि हर साल दी जा रही है। इसका लाभ 46.02 लाख राशन कार्ड वाले धारक उठाएंगे।

आयरन और आयोडीन युक्त नमक के शुभारम्भ पर बोलते हुए सीएम अखिलेश ने कहा, “हमारी सरकार लगातार अच्‍छे कामों की कोशिश कर रही है। आने वाली पीढ़ी का स्‍वास्‍थ्‍य बेहतर हो, ये हमारी सरकार की जिम्‍मेदारी है। समाजवादियों की कोशिश होगी कि यूपी के लोगों का स्‍वास्‍थ्‍य और उनकी शिक्षा बेहतर हो।”

सीएम इस मौके पर भी मोदी सरकार पर निशाना साधना नहीं भूले। उन्होंने कहा कि कालाधन रखने वाले अमीरों को इससे कोई नुकसान नहीं है, सिर्फ गरीब ही परेशान हो रहा है। आपको बता दें कि 32 लाख 59 हजार बीपीएल और अंत्योदय कार्ड धारकों को 3 रुपए प्रति किलो की दर से नमक दिया जाएगा। वहीं, एपीएल कार्ड धारकों को 6 रुपए प्रति किलो की दर से नमक दिया जाएगा।

नितीश ने नोट बंदी मामले में फिर से की मोदी की तारीफ़, राजनीतिक गलियारे में चर्चा तेज़

आशीष पाण्डेय,

नोटबंदी के बाद से हो रहे बड़े बड़े बदलावों में एक बड़ा बदलाव यह भी देखने को मिल रहा है कि अक्सर नरेंद्र मोदी के सख्त खिलाफ रहने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार प्रधानमंत्री के इस फैसले का समर्थन करते नहीं थक रहे। नीतीश ने एक बार फिर कहा है कि नोटबंदी पीएम मोदी का साहसिक कदम है, इससे देश को फायदा होगा।

जहां तमाम विरोधी पार्टियां मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल खड़ी हैं, वहीं नीतीश कुमार नोटबंदी के फैसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े दिख रहे हैं। अपने पिछले बयान में भी उन्होंने कहा था कि पीएम मोदी का यह फैसला बाघ की सवारी करने जैसा है। नीतीश के अनुसार जनता नोटबंदी के साथ खड़ी है।

नीतीश ने कहा, “नोटबंदी का विरोध महागठबंधन के किसी दल ने नहीं किया है। महागठबंधन के दल इसके क्रियान्वयन के तरीके का विरोध कर रहे हैं।” उन्होंने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के लगातार विरोध के लिए भी परोक्ष रूप से सफाई देते हुए कहा,” महागठबंधन में तीन दल हैं, तो विचार और नीतियां भी अलग-अलग होंगीं, लेकिन, हमलोग कोई भी फैसला आपसी सहमति से ही लेते हैं।”