ऑनलाइन पेमेंट वॉलेट ‘पेटीएम’ अब जल्द ही पेमेंट बैंक के रूप में आपके लिए उपलब्ध होगा। जी हां! आरबीआई ने पेटीएम को पेमेंट बैंक बनाने की औपचारिक मंजूरी दे दी है। देश की पहली ‘पेटीएम बैंक ब्रांच’ फरवरी में नोएडा में खुलने जा रही है।
पेटीएम संस्थापक व सीइओ विजय शेखर शर्मा (वन97 कम्युनिकेशंस के संस्थापक) ने एक ब्लॉग स्पॉट के ज़रिये बताया कि यह पेमेंट बैंक पूरी तरह से भारतीय बैंक के रूप में कार्य करेगा। इसमें जमा राशि पर ग्राहकों को ब्याज उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही ग्राहकों को उसी प्रकार से क्रेडिट, डेबिट कार्ड, चेक बुक, डिमांड ड्रॉफ्ट उपलब्ध कराया जाएगा, जैसा अन्य बैंकों की ओर से कराया जाता है।
इसके अतिरिक्त उन्होंने बताया कि पेमेंट बैंक के माध्यम से लोगों को लाइफ इंश्योरेंस, जनरल इंश्योरेंस सहित अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। नोएडा में पहली शाखा खुलने के बाद पेटीएम पेमेंट बैंक उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों की ओर रुख करेगा। इसके बाद पेटीएम पेमेंट बैंक को नार्थ-ईस्ट की ओर लेकर जाएंगे।
पेटीएम पेमेंट बैंक में ग्राहक का अकाउंट उसके पेटीएम वॉलेट से जुड़ा रहेगा, जिसमें 14.5 फीसदी का इंटरेस्ट मिलेगा। कंपनी का मकसद हर भारतीय को बैंक की सहूलियत देना और टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के दम पर बैंकिंग की दुनिया में अपनी पैठ बनाना है। पेटीएम पेमेंट बैंक में विजय शेखर शर्मा का 51 फीसदी हिस्सा होगा। बाकी हिस्सेदारी वन97 कम्युनिकेशंस के पास होगी।
दरअसल पेटीएम को पिछले साल दिवाली में ही बैंक का परिचालन शुरू करना था। 2015 में रिजर्व बैंक ने विजय शेखर शर्मा को इसके लिए ‘सैद्धान्तिक मंजूरी’ दे दी थी। उन्हें 10 अन्य के साथ भुगतान बैंक की स्थापना की मंजूरी मिली थी। बाद में तीन इकाइयां टेक महिंद्रा, चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी और दिलीप सांघवी, आईडीएफसी और टेलीनार फाइनेंशियल सर्विसेज का गठजोड़ भुगतान बैंक लाइसेंसिंग से पीछे हट गया था। फिलहाल सिर्फ एयरटेल ने भुगतान बैंक परिचालन शुरू किया है। आदित्य बिड़ला पेमेंट बैंक 2017 की पहली छमाही में परिचालन शुरू करेगा।
बुधवार को राष्ट्रपति भवन में न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर ने बतौर भारत के 44वें मुख्य न्यायाधीश शपथ ग्रहण की. जे.एस. खेहर भारत के पहले सिख मुख्य न्यायाधीश हैं. जस्टिस खेहर क कार्यकाल २७ अगस्त २०१७ तक है. मंगलवार को जस्टिस टी.एस. ठाकुर सेवानिवृत्त हो गये जिन्होंने जस्टिस खेहर को नामित किया.
जस्टिस खेहर का जन्म २८ अगस्त १९५२ में हुआ. उन्होंने चंडीगढ़ से स्नातक करने के पश्चात पंजाब यूनिवर्सिटी से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की. जस्टिस खेहर ने एलएलएम में प्रथम स्थान प्राप्त किया. अपनी वकालत की शुरुआत उन्होंने १९७९ से की. प्रमुखतः वो पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रेक्टिस करते थे.
१९९९ में जस्टिस खेहर हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने. २००९ में वो उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस बने. उन्हें बतौर चीफ़ जस्टिस कर्नाटक हाईकोर्ट में भी नियुक्त किया गया.२०११ में जस्टिस खेहर सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त किये गये.
बतौर न्यायाधीश जस्टिस खेहर ने बेहद प्रेरणादायी काम किया. जजों की नियुक्ति की नई व्यवस्था देने वाले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून को रद करने वाली पीठ के मुखिया जस्टिस खेहर ही थे. 2G स्पेक्ट्रम घोटाले में बतौर जज उन्होंने सरकार को चेताया था कि प्राकृतिक संसाधनों का
‘कौन सच्चा सिख है?’ इस सवाल पर पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस खेहर ने कहा था, “धर्म की अवधारणा वैसी ही होनी चाहिए जिस बुनियाद पर धर्म है, न कि वैसी जैसा हम चाहते हैं कि धर्म हो.” प्रधानमन्त्री पर आरोपों को लेकर दायर याचिका में जस्टिस खेहर ने वकील प्रशांत भूषण को जमकर फटकार लगाई थी.
भारतीय न्यायपालिका में जस्टिस खेहर की बतौर मुख्य न्यायाधीश नियुक्ति पारदर्शिता और कानून व्यवस्था के हित में एक अहम दौर साबित होगा.
नए साल के जश्न के मौके पर बेंगलुरु के एमजी रोड पर लड़कियों के साथ हुई छेड़छाड़ की घटना पर महाराष्ट्र सपा प्रमुख अबू आजमी ने जो बयान दिया है, उससे चारों तरफ हड़कंप मच गया है। अबु आज़मी का कहना है कि छेड़छाड़ की वजह लड़कियों के तंग और छोटे कपड़े हैं। आज़मी के इस बयान पर राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा ताबड़तोड़ एक्शन भी ले लिया गया है।
आजमी ने महिलाओं के साथ हुई बदतमीज़ी के विषय में कहा, “आज के मॉडर्न जमाने में जितनी औरत नंगी नजर आती है, उसे उतना फैशनेबल कहा जाता है। अगर मेरी बहन-बेटी सूरज डूबने के बाद गैर मर्द के साथ 31 दिसंबर मनाए और उस वक्त उसके साथ उसका भाई या पति नहीं है तो यह ठीक नहीं।” अपने इस सुलगते बयान की लपटों का पहले ही अंदाज़ा लगा चुके आजमी ने लगे हाथ यह भी स्वीकार कर लिया कि उनके इस बयान से बवाल ज़रूर मचेगा।
आजमी ने लड़के और लड़कियों की तुलना पेट्रोल और आग से की है और उन्हें एक दुसरे से दूर रहने की सलाह दी है। उनका कहना है कि अगर कहीं शक्कर गिरी होगी तो चीटिंयां अपने आप आएंगी उन्हें निमंत्रण देने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि इस विवादित बयान के बाद आजमी ने यह भी कहा कि वे सरकार से इस बात की अपील करते हैं कि छेड़छाड़ जैसी हरकत करने वालों पर सरकार सख्त कार्रवाई करे। उधर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम ने बताया, “हमने कर्नाटक के गृहमंत्री और अबू आजमी को समन भेजा है।”
बता दें कि इससे पहले भी अबू आजमी अपने विवादित बयानों के कारण हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। आजमी के इस तरह के विवादित बयान पर एक बार उनकी बहु ने भी आपत्ति जताया था जब रेप को लेकर उन्होंने शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने वाली महिलाओं को फांसी की सजा देने की वकालत की थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने 19 जुलाई 2016को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल 2016 को मंजूरी दी थी। भारत सरकार की कोशिश इस बिल के जरिए एक व्यवस्था लागू करने की थी, जिससे किन्नरों को भी सामाजिक जीवन, शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में आजादी से जीने के अधिकार मिल सके, लेकिन तमाम कानून और व्यवस्थाओं के लागू होने के बावजूद ट्रांसजेंडर्स को समाज द्वारा स्वीकारा नहीं जा रहा है। इसी अस्वीकृति की शिकार हुई हैं देश की पहली ट्रांसजेंडर प्रिंसिपल मानबी बंडोपाध्याय।
मानबी बंडोपाध्याय पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर वुमन्स कॉलेज की प्रिंसिपल हैं। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। मानबी ने इस्तीफे के पीछे कॉलेज के कुछ टीचर और छात्रों को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि कॉलेज के स्टाफ ने उन्हें सहयोग नहीं किया। मानबी का कहना है कि उनके पदभार संभालने के बाद से ही कॉलेज में उनके खिलाफ खेमेबाजी शुरू हो गई थी, जिस कारण कॉलेज का माहौल खराब हो गया। अपने खिलाफ घेराव और लगातार हो रहे प्रदर्शनों से तंग आकर मानबी ने आखिरकार 23 दिसंबर को अपना इस्तीफा दे दिया। मनाबी ने डेढ़ साल पहले प्रिंसिपल का पद संभाला था। मानबी वह देश की पहली ट्रांसजेंडर हैं, जो किसी शैक्षणिक संस्थान की प्रिंसिपल बनीं।
मानबी ने बताया, “मैंने 23 दिसंबर को डीएम को अपना इस्तीफा भेज दिया। मेरे सारे सहकर्मी और स्टूडेंट्स मेरे खिलाफ थे। मैंने कॉलेज में अनुशासन और स्वस्थ वातावरण बहाल करने की कोशिश की, लेकिन मेरी कोशिश नाकाम रही।”
दूसरी ओर, टीचर्स ने भी मानबी पर यही आरोप लगाए थे, जिसके चलते कॉलेज का माहौल तनावपूर्ण हो गया था। इस विवाद को सुलझाने के लिए पिछले दिनों प्रशासन ने अफसरों की एक टीम को कॉलेज का दौरा करने भेजा था। टीम ने प्रिंसिपल-टीचर्स से बात भी की थी। मामले पर संज्ञान लेते हुए नादिया के डीएम सुमित गुप्ता ने कहा कि प्रिंसिपल मानबी का इस्तीफा उन्हें मिल गया है और उसे बुधवार को उच्च शिक्षा विभाग को भेज दिया गया है। आगे की कार्रवाई विभाग करेगा और जल्द कोई फैसला लिया जाएगा। आपको बता दें कि वुमन्स कॉलेज की प्रिंसिपल बनने से पहले मानबी विवेकानंद सतोवार्षिकी महाविद्यालय में बांग्ला की एसोसिएट प्रोफेसर थीं।
समाजावादी परिवार का घमासान अब पार्टी चुनाव चिन्ह ‘साइकिल’ पर आकर अटक गया है। मुलायम और अखिलेश खेमा चुनाव चिन्ह पर अपना कब्जा पाने की कोशिश में लगा हुआ है। वहीं चुनाव आयोग से मुलाकात के बाद प्रो, रामगोपाल ने दावा किया कि असली सपा अखिलेश यादव की है। उन्होंने अखिलेश खेमे की तरफ से आज चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रखा।
सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने आज चुनाव आयोग से मुलाकात की। यहां उन्होंने चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रखा। चुनाव आयोग से बाहर निकलने के बाद उन्होंने कहा कि सपा अखिलेश यादव की है। आयोग को बताया दिया गया है कि अखिलेश के पक्ष में 90 प्रतिशत विधायक हैं। इसलिए उन्हें उनकी पार्टी को मान्यता मिलनी चाहिए।
उन्होंने यहां अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया और कहा, उन्हें 1 जनवरी को सर्वसम्मति से राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है। इस बैठक में राम गोपाल के साथ नरेश अग्रवाल और अभिषेक मिश्रा भी मौजूद थे।
गौरतलब है कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह सोमवार शाम को चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रख चुके हैं। बताया जा रहा है कि यह बैठक उनके लिए काफी सकारात्मक रही।
हालांकि अभी तक उन्होेंने इस संबंध में कुछ भी साझा नहीं किया है। मुलाकात के बाद आज वह लखनऊ वापस लौट आए हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि यहां मुलायम सिंह इस संबंध में कॉन्फ्रेस करेंगे।
मोदी सरकार के नोटबन्दी के फैसले को आज 56 दिन हो रहे हैं और इस फैसले के पहले दिन से ही विपक्ष लगातार सरकार पर हमला करता आ रहा है । विपक्ष का आरोप है कि पीएम मोदी ने तानाशाही फैसला लेते हुए गरीबों और मजदूरों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया है । वहीं दूसरी ओर सरकार का कहना है कि इस फैसले से भ्रस्टाचार और कालेधन पर रोक लगेगी । लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी यही है कि जिन लोगों को अभी तक कैश की दिक्कत हो रही है उसके लिए जिम्मेदार कौन है ।
नोटबन्दी के फैसले पर केंद्रीय इस्पात मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा था कि नोटबंदी जैसे फैसला 56 इंच से भी बड़े सीने वाला व्यक्ति ले सकता है। कोई भी कमजोर पीएम ऐसा फैसला नहीं ले सकता। इसके सकारात्मक परिणाम अगले कुछ दिनों में आएंगे।
आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने 8 नवंबर को नोटबंदी का ऐलान करते हुए 500 और 1000 रुपया के पुराने नोट को चलन से बाहर कर दिया था। अब बाजार में 500 और 2 हजार रुपये का नया नोट आ चुका है। इन छप्पन दिनों में देखा जाए तो नोटबंदी के बाद भारत कैशलेश इंडिया की तरफ बढ़ रहा है। डिजिटल पेमेंट को लेकर पहले के मुकाबले 300 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। एक तरफ जहां सोने के दामों में गिरावट आई है तो दूसरी तरफ प्रॉपर्टी के रेट भी सस्ते हुए है। लेकिन अभी भी सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि उन सुदूर गांवों तक ये व्यवस्था कैसे पहुचेंगी जहाँ दूर दूर तक बैंक ,एटीएम और इंटरनेट नही है । कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार ने फैसला तो सही लिया लेकिन इसे लागू करने में जल्दबाजी हो गई जिसके कारण देश में नोटों को लेकर अव्यवस्थायें फ़ैल गयी हैं ।
क्या रहा नोटबंदी का प्रभाव?
-महंगाई हुई कम
-सब्जी की कीमतें 50 फीसदी हुई कम
-कार बाईक की कीमतें कम
-डिजिटल वॉयलेट कंपनियों में रोजगार बढ़ा
-डिटिजल पेमेंट में 300 फीसदी का इजाफा
-प्रॉपर्टी की कीमत सस्ती हुई
-खाने की चीजें 18 फीसदी सस्ती
-सोने के दामों में गिरावट
-3300 करोड़ रुपए का कालाधन जब्द
-बैंकों में करीब 300 फीसदी नगदी बढ़ी
-नोटबंदी के बाद बैंक में 13 लाख करोड़ रुपए जमा
-400 करोड़ रुपये के जाली नोट का कारोबार बंद
-6 लाख करोड़ के नए नोट बाजार में आए
अगर हम नोटबंदी के बाद की उम्मीदों की बात करें तो –
-ब्याज दरौ में कटौती हो सकती है
-लोगों को सस्ते लोन का फायदा मिल सकता है।
-रियल एस्टेट में 25 से 30 फीसदी कीमती कम होंगीं ।
अगर हम नोटबंदी के बाद से लेकर 1 जनवरी 2017 तक इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और जांच एजेंसियों की बात करें तो हमने स्पष्ट रूप से देखा कि सभी लगातार सक्रिय थे । इसी का नतीजा है कि इस बीच 1,100 मामलों में कार्रवाई हुई। इस दौरान 556 सर्वे, 253 छापेमारी और 289 मामले कैश जब्त करने के सामने आए। अगर हम इनकम टैक्स सोर्सेज की मानें तो इस अवधि में आयकर विभाग ने कुल 562 करोड़ रुपये जब्त किए। इस रकम में 110 करोड़ रुपये के नोट नई करंसी के रूप में थे। इसके अलावा 1 जनवरी तक 4,663 करोड़ रुपये की अघोषित आय का भी इनकम टैक्स विभाग ने खुलासा किया। साल के पहले दिन तक इनकम टैक्स विभाग ने वेरिफिकेशन के लिए 5062 लोगों को नोटिस जारी किया।
इनमें से 500 मामले सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के हवाले किए गए।
नोटबन्दी के बाद सबसे ज्यादा दिक्कत उन परिवारों को भी हुई जिनके घर में शादियां थी । नवंबर-दिसंबर में शादियों का सीजन भी था, इसलिए रियल एस्टेट को छोड़कर सराफा-ऑटोमोबाइल व रेडीमेड गारमेंट्स बाजार में ग्राहकी की उम्मीद धूमिल हो गई। अगर हम रियल एस्टेट की बात करें तो पहले 250 रजिस्ट्रियां प्रतिमाह होती थी लेकिन मौजूदा समय में 30-40 रजिस्ट्रियां ही हुई हैं नवंबर-दिसंबर तक । इसी तरह अगर हम ऑटोमोबाइल की बात करें तक पहले हर माह लगभग 02 करोड़ का कारोबार था लेकिन अब 01 करोड़ कारोबार रह गया नवंबर में । कुल मिलाकार इन दोनों क्षेत्रों को नोटबन्दी के कारण भारी मुसीबत झेलनी पड़ रही है ।
सरकार ने डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के लिए देश के सभी जिलों में कैशलेस का प्रशिक्षण कराने की पूरी रूपरेखा तैयार करके कार्य शुरू कर दिया है जो कि टेढ़ी खीर है क्योंकि अधिकांश जिलों में पढ़ें लिखे लोगो की संख्या कम है जिसमे महिलाओं की स्थिति तो और भी ख़राब है । ऐसी स्थिति में तो ये प्रशिक्षण एक नामुमकिन कार्य लगता है लेकिन पीएम मोदी के इस पावन यज्ञ में अगर सभी अपना योगदान दें तो यह कार्य जरूर सफल हो सकता है । अगर हम उदाहरण के लिए भिंड जिले की बात करें तो यहाँ कुल 62 फीसदी लोग ही पढ़े लिखे हैं जिसमें पुरुष 40 फीसदी और महिलाएं 22 फीसदी शिक्षित हैं। इसके अलावा यहाँ अब भी 38 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो पढ़ना लिखना ही नहीं जानते हैं।
सच्चाई तो ये है कि बैंक से नोट मिल नहीं रहे हैं, जितने रुपए बंटे, वह बैंक में वापस नहीं लौट रहे। बाजार में रोजाना पीओएस मशीन की डिमांड है लेकिन बैंक पीओएस मशीन नहीं दे पा रही हैं। जिससे कैशलेस ट्रांजेक्शन की मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। एक तरफ सरकार सभी से अपील कर रही है कि ज्यादा से ज्यादा कैशलेस व्यवस्था अपनाए वहीं दूसरी ओर सरकार द्वारा पीओएस मशीन की उचित व्यवस्था न कर पाने के कारण वो खुद आलोचना के केंद्र में है ।
नोट बंदी के बाद से ही सरकार का पूरा ध्यान कैशलेस सिस्टम पर है। जब बाजार में कैश की अभाव नहीं होगा लोग कैशलेस का पालन करेंगे नहीं। इसलिए लोगों को अब कैशलेस ट्रांजेक्शन की आदत डाल लेनी चाहिए । कांग्रेस का कहना है कि नोटबंदी पर पीएम मोदी की ओर से 50 दिनों की दी गई मियाद पहले ही पूरी हो चुकी है, लेकिन देशभर में कैश की किल्लत खत्म नहीं हुई है। आज भी लोग बैंक और एटीएम के बाहर लाइन में खड़े होने को मजबूर है। बैंक में लोगों को देने के लिए प्रयाप्त पैसे नहीं हैं, एटीएम के बाहर नो कैश का बोर्ड लगा है। हालांकि सरकार ने एटीएम से कैश निकालने की सीमा बढ़ी दी है। लेकिन कैशलेस लोगों की मुश्किलें बरकरार है।
इस मुद्दो को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच घमासान भी जोरों पर है। सरकार नोटबंदी को देश के विकास के तुरूप का पत्ता बताने में जुटी है। वहीं विपक्ष इस आम गरीब जनता खिलाफ मोदी सरकार की मुहिम बता रहा है। इन सबके बीच इस मुद्दे के लेकर कांग्रेस के तेवर लगातार तल्ख होते जा रहे हैं। कांग्रेस ने नोटबंदी को स्वतंत्र भारत का अबतक का सबसे बडा़ घोटाला करार दिया है। कांग्रेस के मुताबिक पीएम मोदी ने देश के चंद 50 बिजनेसमैन और अपने दोस्तों को फायदा पहुंचान के लिए नोटबंदी का फैसला किया और आम गरीब लोगों को सड़कों पर ला दिया है, उनका रोजगार छीन लिया है। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक नोटबन्दी के कारण पूरे देश में अब तक सैकड़ों लोगो की जान गई है। विपक्ष ने आरोप लगाते हुए कहा है कि इसके लिए सिर्फ और सिर्फ पीएम मोदी ही जिम्मेदार हैं । उन्हें नैतिक रूप से अपनी गलती मानते हुए पद से इस्तीफा दे देना चाहिए ।
बहरहाल ,कुछ भी हो लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी ने समूचे विपक्ष को अपना 56′ का सीना दिखाते हुए जिस प्रकार से नोटबन्दी का ऐतिहासिक फैसला लिया और उसके बाद जब आज इस फैसले को 56 दिन हो रहे हैं तब भी वह अपने फैसले को सही मान रहे हैं । उनका कहना है कि मेरे साथ देश की सवा सौ करोड़ जनता है । ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि नोटबन्दी का फैसला देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगो को कितना फ़ायदा पहुंचा पायेगा लेकिन अभी इस फैसले का मिला जुला असर ही देखने को मिल रहा है ।
हॉलीवुड के सुप्रसिद्ध स्टार और ‘रॉक’ के नाम से मशहूर WWE के पूर्व चैम्पियन रेसलर ‘ड्वेन जॉनसन’ सिर्फ़ अपनी ताकतवर कद काठी, अभिनय के लिए ही नहीं बल्कि उदारता के कारण भी अक्सर चर्चा में रहते हैं.
हाल ही में क्रिसमस के दौरान ड्वेन ने अपने पिता रॉकी जॉनसन को एक चमचमाती मंहगी फोर्ड एसयूवी कार गिफ्ट की. दरअसल ड्वेन जॉनसन इससे पहले भी अपनी माँ को और दस साल की सेवा पूरी करने वाली अपनी घर कि नौकरानी को फोर्ड चार गिफ्ट कर चुके हैं. अपने फैन्स में भी उदार कामों के कारण अक्सर चर्चा में बने रहते हैं.
अपने इन्स्टाग्राम में ड्वेन ने एक फोटो शेयर की जिसमें उन्होंने अपने पिता के संघर्षों की बेहद हृदय विदारक बात का ज़िक्र भी किया. बकौल ड्वेन जॉनसन, “ मेरे पिता का जीवन बेहद मुश्किलों भरा रहा है. उन्होंने कभी मुझसे बहोत ज्यादा की मांग नहीं की. हमेशा थोड़े में ही संतुष्ट रहने वाले मेरे पिता की कहानी बेहद भावनात्मक और संघर्ष से भरी हुई है. जब मेरे पिता रॉकी जॉनसन महज़ १३ साल के थे तब उनके पिता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनकी माँ अपने बॉयफ्रेंड के साथ रहने लगी.”
आगे अपने पिता के संघर्ष का ज़िक्र करते हुए ड्वेन ने कहा, “ एक दिन क्रिसमस की शाम जब उनकी माँ का बॉयफ्रेंड शराब पीकर आया तो उसने मेरे पिता के खाने पर पेशाब कर दी. मेरे पिता बाहर गए और एक फावड़ा लेकर उन्होंने बर्फ़ से ढकी जमीन पर एक लाइन खींच कर कहा कि अगर तुमने इस लाइन को पार किया तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगा. शराब के नशे में धुत्त उस आदमी ने लाइन को क्रॉस किया तो मेरे पिता ने उसपर बर्फ़ के टुकड़े से वार कर दिया. पुलिस को फोन किया गया. उन्होंने मेरे पिता की माँ से कहा कि जब उनका बॉयफ्रेंड होश में आयेगा तो वो उनके बेटे की हत्या कर सकता है, इसलिए उसे घर से जाना होगा. पूरे परिवार के सामने उनकी माँ ने मेरे पिता को घर से बाहर चले जाने को कहा. महज़ १३ साल की आयु में मेरे पिता एक बेघर इंसान थे. ये दुःख भरी कहानी १९५४ में कनाडा की है. तब भी मेरे पिता को थोड़े में गुजारा करने की आदत थी और आज भी है. आज मैंने अपने पिता के लिए बड़ा सा घर बनाया है. उन्हें बड़े ट्रक्स दिए हैं जिन्हें वो बड़े शौक से चलाते हैं. मैं अपने पिता की हर इच्छा पूरी करूंगा लेकिन वो मुझसे कुछ नहीं मांगते. हर क्रिसमस में मुझे उनके १३ साल की उम्र से शुरू हुए संघर्ष की बात भावुक कर देती है. जब मैं १३ साल का हुआ तो उन्होंने मुझसे जिम में कड़ी मेहनत करवाई. वो हमेशा कहते थे यदि तुम्हे कुछ पाना है तो बाहर निकलो, लेकिन यदि तुम्हे सिर्फ़ रोना है तो घर जाओ अपनी माँ के पास. तब मैं इस बात से घृणा करता था लेकिन आज मैं जो कुछ हूँ इसकी वजह से. उन्होंने मुझे काबिल इंसान बनाया वो भी बिना मेरे खाने में पेशाब किये हुए. मेरा ये तोहफा केवल उनका धन्यवाद करने का माध्यम है.मैरी क्रिसमस.”
द्वापर युग इस बात का गवाह है कि कंस जब युवा हुआ तो उसने अपने पिता महाराज उग्रसेन को बंदी बना लिया और खुद राजगद्दी पर बैठ शासन करने लगा। इतिहास में भी पढ़ने को मिलता है कि औरंगज़ेब जैसे कई मुग़ल शासक अपने ही पिता को कैद कर या वध कर खुद राजगद्दी पर बैठ गए। आज कलयुग की चरम सीमा पर एक बार फिर वही नज़ारा उत्तर प्रदेश की सुलगती राजनीति में ‘समाजवादी खानदान’ के ज़रिये देखने को मिल रहा है।
समाजवादी पार्टी के संस्थापक, पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने 1992 में बिलकुल शून्य स्तर से पार्टी की स्थापना की थी। अपने समय में उन्होंने काफी मेहनत करके इस पार्टी को सजाया संवारा और उसे एक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाया। तीन बार वे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे और चौथी बार 2012 में फिर चुनाव जीत कर अपने युवराज अखिलेश यादव को सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री बनाया। अखिलेश भी एक पढ़े लिखे उच्च नेतृत्व वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने पार्टी का नेतृत्व अच्छा किया। उन्होंने राज्य के लिए काम भी अच्छा किया।
पिता-पुत्र का रिश्ता कभी दशरथ और राम का हुआ करता था। कई राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय सभाओं में मंच पर मुलायम ने अखिलेश को भरी सभा में फटकार तक लगा दी, चुप करा दिया, लेकिन अखिलेश ने कभी जुबां से उफ़ तक नहीं की। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि कहानी में ट्विस्ट आ गया और रामायण का संस्कारी पुत्र ‘राम’ मुग़ल-ए-आज़म का ‘सलीम’ उर्फ़ ‘शेख़ू’ बन गया? इस संस्कारी कहानी में सामने आये तीन अन्य महत्त्वपूर्ण किरदार, शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव और अमर सिंह। फिर क्या था, देखते- देखते समाजवादी पार्टी अंदर ही अंदर दो खेमों में बंट गई। एक तरफ मुलायम-शिवपाल-अमर सिंह, तो दूसरी तरफ अखिलेश- रामगोपाल।
2017 का विधानसभा चुनाव मुंह पर आ गया है और उधर पारिवारिक कलह इस कदर बढ़ गयी है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह द्वारा मुख्यमंत्री अखिलेश व पार्टी महासचिव रामगोपाल का झट निष्कासन, पट निष्कासन रद्द, फिर झट निष्कासन, पट निष्कासन रद्द, ऐसा तिकड़मी खेल जारी है। इसके बावजूद भावुक पिता यह तय नहीं कर पा रहे कि बेटे की इस बगावत के बाद अंततः निकाल ही दूं, या पार्टी में रख लूं। इसी कश्मकश में हालात ऐसे हो गए कि अखिलेश ने रामगोपाल के साथ मिलकर विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन बुला लिया और सरे आम अपने पिता को ही अध्यक्ष की कुर्सी से उतार कर पार्टी की कमान अपने हाथों में लेने का फरमान जारी कर दिया! पिता को बना दिया सिर्फ मार्गदर्शक!
जब से पिता पुत्र के बीच घमासान शुरू हुआ है, पिता का पक्ष धीरे धीरे कमज़ोर होता गया है और पुत्र का मज़बूत। अंततः जैसा परिणाम आप देख रहे हैं, पुत्र की मजबूत सेना ने पिता को परास्त कर दिया। पिता द्वारा बुलाई मीटिंग में पहुँचे सिर्फ 10 विधायक, बाक़ी सारे जा मिले ‘बागी गुट’ से। अपने-अपने क्षेत्र की सीमाएं कुछ सैनिकों के साथ अलग हो गईं।
अब लड़ाई वाहन की रह गई। ‘साइकिल’ है एक, पक्ष हैं दो। दोनों ही पक्ष उसी साइकिल की सवारी करना चाहते हैं। दोनों में छीना-झपटी लगी है। अब यह साइकिल किसके हाथ लगेगी भगवान जाने। ये दोनों पक्ष अपनी अपनी दावेदारी ले कर चुनाव आयोग के पास दुहाई लगा रहे हैं। अब चुनाव आयोग इस साइकिल का हैंडल किसके हाथ पकड़ाता है और पैडल मार कर साइकिल दौड़ा ले जाने का मौका किसे मिलता है, यह तो जनता आगे देखेगी ही। वैसे कयास लगाये जा रहे हैं कि अखिलेश ‘ट्रैक्टर’ पर भी सवार हो सकते हैं या ‘हल’ को भी अपना शस्त्र चुन सकते हैं।
कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यह समाजवादी पार्टी का रचा रचाया एक ‘समाजवादी’ ड्रामा है, जो सिर्फ और सिर्फ पब्लिक का ध्यान अपने पर ही केंद्रित रखने के उद्देश्य से सियासी मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा है। पुत्र अखिलेश और पिता मुलायम, यही 2 विकल्प जनता की नज़रों में ठूंस ठूंस कर भर दिए जा रहे हैं, ताकि जनता की नज़र में ‘हाथी’, ‘पंजा’ या ‘कमल’ कतई समा ही न पाएं। अब राजनीतिक विशेषज्ञों द्वारा भले ही इसे सोची समझी साजिश करार दे दिया गया हो, लेकिन पुत्र द्वारा अपनी ही बनी-बनाई साख हथिया लिए जाने का दर्द एक पिता से बेहतर कौन समझ सकता है भला!
सारी कथा का निचोड़ यह है कि समय चुनावी है और इस चुनावी भवसागर को पार करने के लिए सपा के दोनों पक्षों के पास ‘साइकिल’रुपी एक ही नाव है, जिसमें दोनों ही पक्ष सवार होकर इस भवसागर को पार करना चाहते हैं। बस कहानी में अगले ट्विस्ट की थोड़ी सी प्रतीक्षा करनी होगी।
पिछले कुछ समय से फरहान अख्तर के साथ अफेयर को लेकर चर्चा में रही एक्ट्रेस श्रद्धा कपूर ने अंततः इस मामले में चुप्पी तोड़ दी है। हाल ही में खबरें आई थीं कि श्रद्धा अपना घर बार छोड़ कर फरहान के घर में शिफ्ट हो गई हैं और उनके साथ लिव इन रिलेशन में हैं।
इसके बाद ये खबरें भी आईं कि फरहान के घर से एक्ट्रेस के पापा शक्ति कपूर उन्हें खींचते हुए घर ले गए और उस दौरान मौसी पद्मिनी कोल्हापुरी भी शक्ति कपूर के साथ थीं। इन तमाम ख़बरों पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए श्रद्धा ने कहा है, ” हां, मैं लिव इन में रह रही हूँ, अपने पैरेंट्स के साथ।” श्रद्धा ने इन सारी बातों की सच्चाई पर सवाल उठाने के बाद बड़ी सफाई से ऐसे जवाब दिए, जिसमें ‘हाँ’ भी नहीं थी और न ही ‘ना’।
बॉलीवुड लाइफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक श्रद्धा का कहना है, “मेरा नाम आदित्य रॉय कपूर के साथ भी कुछ समय तक जोड़ा गया था। एक्टर्स का नाम हमेशा किसी न किसी के साथ जोड़ा जाता रहता है, लेकिन जब परिवार को इसमें घसीटा जाता है, तब अति हो जाती है।”
श्रद्धा से जब पूछा गया कि क्या वे कभी लिव इन में रहेंगी तो इसपर एक्ट्रेस ने कहा,”मेरा जन्म और पालन-पोषण इस घर में हुआ है। मैं अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रह रही हूं। मेरा एक अलग घर है जहां मैं मीटिंग्स और अपना फालतू का सामान रखती हूं। मेरा अपने पैरेंट्स के घर को छोड़कर अपने घर में शिफ्ट होने का कोई इरादा नहीं है।” उन्होंने कहा,” लिव इन के बारे में सामान्य तौर पर बात करुं तो मुझे इस पर विश्वास है। अगर यह किसी को अच्छा लगता है और उसे सूट करता है तो यह बिल्कुल ठीक है।”
गौरतलब है कि श्रद्धा के पिता शक्ति कपूर ने श्रद्धा और फरहान के लिंकअप की खबरों को और श्रद्धा पर बंदिशें लगाये जाने की ख़बरों को खारिज किया था। उन्होंने कहा था कि वो अपनी बेटी को अपनी जिंदगी बिना किसी बंदिश के जीने देते हैं। वहीं अपनी पत्नी अधुना भबानी से तलाक लेने की प्रकिया से गुजर रहे एक्टर फरहान अख्तर ने इस मामले पर अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है।
पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन ‘DAWN’ में प्रकाशित खबर के मुताबिक़ इस्लामाबाद में नए साल की शाम एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म का घिनौना मामला सामने आया है.
अखबार के अनुसार 31 दिसम्बर कि शाम इस्लामाबाद के बहावलनगर की आमना (काल्पनिक नाम) जो पेशे से दर्जी पति के साथ घुआरी कसबे में रहती है, के साथ नौकरी के बहाने बुलाकर 4 लोगों ने गैंग रेप किया.
पुलिस में दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक़ आमना को एक हफ्ते पहले एक शख्स मिला था, जिसने उसे एक मोबाइल नम्बर दिया और कहा कि वो सिहाला में एक स्कूल चलाता है. आमना की पारिवारिक आमदनी बेहद कम होने के कारण वो नौकरी की तलाश में थी. आमना ने उस स्कूल चलाने वाले आदमी को फोन करके इन्टर्व्यू देने के लिए कहा. आमना जब 31 दिसम्बर की शाम 4 बजे उसे आदमी पास इंटरव्यू देने पहुंची तो वह आदमी, आमना को एक घर में ले गया. घर ले जाकर उसने आमना से जोर जबरदस्ती करनी शुरू की और उसे शराब पीने के लिए भी विवश किया. जल्द ही तीन और लोग भी आये और सबने लाचार आमना के साथ बारी-बारी से दुष्कर्म किया. उन तीन व्यक्तियों ने खुद को सरकारी मुलाज़िम बताया, जिसमें से एक ने खुद को पुलिस SHO, एक ने न्यायाधीश तो तीसरे ने स्वयं को MNA बताया. तीनों ने शराब पी और आमना के साथ बलात्कार किया.
शाम के 6 बजे जब सभी सो गए तब आमना वहां से भाग निकलने में सफल हुई. शुरुआती चिकित्सकीय जांच के बाद सबूतों को आगामी जांच के लिए इस्लामाबाद पॉलीक्लिनिक हॉस्पिटल भेज दिया गया है. चारों आरोपियों के विरुद्ध मामला दर्ज कर, मुख्य अभियुक्त को हिरासत में ले लिया गया है. अखबार ने पीड़िता को काल्पनिक नाम “आमना” तो दिया है लेकिन आरोपियों के नामों को छिपाया गया है.