कर्नाटक: सीएम येदियुरप्पा पर सिद्धारमैया ने की विवादित टिप्पणी
“भूमिका (1977) ” -स्त्री हृदय के विशाल और अथाह स्वरूप को दर्शाती फ़िल्म
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Cinema Desk
स्त्री को शक्ति की संज्ञा देकर, निश्चिंत हो चुके मानव समाज को बहुत सी आशाएं होती हैं उससे। हमारे देश में यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि शक्ति का स्वरूप मानी गई स्त्रियों पर ही सबसे अधिक शक्ति प्रयोग किया जाता रहा है और इस अत्याचार से प्रभावित और प्रताड़ित स्त्री जब अपनी सुरक्षा और सुविधा के लिए कोई कदम उठाती है तो इसके फलस्वरूप जो कठिनाई होती है और समस्या होती है, उसके लिए भी स्त्री को ही उत्तरदायी ठहराया जाता है।

परिस्थितियां, एक जाल की भांति स्त्री जीवन को जकड़ती रहती हैं। कुछ इसी तरह का जीवन रहा, हंसा वाडकर का, जो 1940 के दशक में, फ़िल्मी दुनिया का एक विख्यात नाम थीं। अपने संस्मरण उन्होंने, “सांगत्ये ऐका” की किताब में लिखे। 1977 में आई फ़िल्म, “भूमिका”, इन्हीं संस्मरणों पर आधारित थी।

यह एक असाधारण फ़िल्म, इस कारण से थी, क्योंकि, इसमें, ये बहुत सुन्दर से प्रदर्शित किया गया कि स्त्री का मन और उसका स्वभाव, “दान” ही जानता, समझता और करता है, उसकी स्थिति, अवस्था या जगह चाहे कुछ भी हो, हर भूमिका में दान की ही उसका स्वभाव रहा है। फ़िल्म में स्मिता पाटिल (उषा) जब छोटी होती हैं तो उन्हें एक पालतू मुर्गे से लगाव होता है, लेकिन उनकी मां (सुलभा देशपांडे), जो कि एक देवदासी होती हैं, उस मुर्गे को मार कर, अपने गुरू के लिए खाना पकाती हैं, स्मिता पाटिल (उषा) को भी परोसा जाता वही पका हुआ मुर्गा, लेकिन वे खाना छोड़कर भाग जाती हैं।
“ये कोई मामूली सीन नहीं था, इस में पूरे फ़िल्म की कहानी और स्त्री के चरित्र के सौंदर्य को सांकेतिक रूप से दिखाया गया था। स्मिता पाटिल जब छोटी होती हैं, तभी से अमोल पालेकर (केशव दलवी) उसे अजीब दृष्टि से देखते हैं। जब स्मिता पाटिल (उषा) के घर की स्थिति खराब होती है, तो अमोल पालेकर (केशव दलवी), उनकी मदद करता है और मुंबई जाकर, उषा को एक बड़ी हिरोइन बनवाने की कोशिश करता है, सफल भी होता है, लेकिन उसका उद्देश्य अपने हितों को साधना होता है। स्मिता पाटिल (उषा), के साथ अमोल पालेकर (केशव दलवी) विवाह भी करता है और उसके बाद, उसे बहुत प्रताड़ित करता है।”
इन सब से त्रस्त होकर उषा, अनंत नाग (राजन), नसीरुद्दीन शाह(सुनील वर्मा) और अमरीश पुरी (विनायक काले) के संपर्क में आती है, सब अपने हिसाब से, उससे कुछ न कुछ ग्रहण करते हैं लेकिन उसके बदले, उषा को बस बदनामी मिलती है और कुछ अजीब सा कदम उठाकर वो वापस अमोल पालेकर (केशव दलवी) के पास ही चली जाती है। इसका कारण, पीड़ा के चरम के अलावा, और कुछ भी नहीं हो सकता।

इस फ़िल्म का निर्देशन, श्याम बेनेगल ने किया था। श्याम बेनेगल ने सत्यदेव दुबे और गिरीश कर्नाड के साथ मिल कर इस फ़िल्म के संवाद भी लिखे। इस फ़िल्म का संगीत, वनराज भाटिया ने दिया था और मजरूह सुल्तानपुरी और वसंत देव के गीत थे। भानुदास दिवाकर और रमणिक पटेल का संपादन था और सिनेमैटोग्राफ़ी गोविंद निहलानी का था।
ललित बिजलानी और फ़्रेनी वरियावा के द्वारा निर्मित ये फ़िल्म, स्त्री हृदय के विशाल और अथाह स्वरूप को बहुत ही सुन्दर तरीक़े से दिखाती है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)
देखें फ़िल्म-
यौन उत्पीड़न मामला: नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी के भाई की बढ़ी मुश्किलें
एंटरटेनमेंट डेस्क | navpravah.com
एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी और उनका परिवार कुछ दिनों से सुर्खियों में बना है। इससे पहले नवाजुद्दीन सिद्दीकी अपनी पत्नी आलिया सिद्दीकी से मिले तलाक के नोटिस को लेकर चर्चा में थे और अब वहीं एक्टर के भाई पर उनकी भतीजी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी के भाई शम्स नवाब सिद्दीकी ने इस मामले पर ट्वीट करते हुए कहा है कि, ‘ये बात सही नहीं है, बाकी क्या सही है, क्या ग़लत, यह सच जल्द ही सबके सामने आएगा।’
शम्स सिद्दीकी ने आगे ट्वीट करते हुए कहा कि, ‘कोई व्यक्ति कानून को कैसे गुमराह कर सकता है, और एक ही केस को लेकर कैसे अलग-अलग बयान से दर्ज करा सकता है? दो साल पहले कोर्ट में दिए गए स्टेटमेंट में नवाजुद्दीन सिद्दीकी का नाम नहीं था और यह केस पहले से ही उत्तराखंड में चल रहा है।’
इसके अलावा शम्स सिद्दीकी ने एक और ट्वीट करते हुए लिखा कि, ‘इस झूठी खबर को मीडिया में फैलाने वाले व्यक्ति के इरादों का साफ पता चलता है, कि लोगों को झूठ बोलने में शर्म नहीं आती है, सच जल्द ही सबके सामने आएगा।’
बता दें कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी की भतीजी ने ई-टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा कि, मैंने अपने चाचा के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया है, जब मैं नौ साल की थी तो मैं इसकी शिकार हुई थी, लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई तो मुझे पता चला कि यह टच अलग था, वहीं, इस मामले पर अभी तक नवाजुद्दीन सिद्दीकी की तरफ से कोई बयान या सफाई नहीं दी गई है।
हेमन्त सोरेन के किस फ़ैसले से हज़ारों झारखण्डी युवा हुए बेरोज़गार?
ब्यूरो | navpravah.com
भारत के इस ऐक्शन प्लान से चीन की निकलेगी हेकड़ी, भारत बनेगा आत्मनिर्भर
न्यूज़ डेस्क | navpravah.com
कुल 53 दवाओं के उत्पादन के मामले में भारत ने आत्मनिर्भर बनने का प्लान बना लिया है। मोदी सरकार ने इसके लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव स्कीम को नोटिफाई भी कर दिया है।
भारत सरकार के इस एक्शन से चीन की हेकड़ी थोड़ी ढीली होगी, ऐसी उम्मीद की जा रही है। दरअसल चीन कुछ दिनों से यह कह रहा है कि भारत कुछ भी कह ले, लेकिन उत्पादन में बिना हमारा सहयोग लिए उनका काम नहीं चलेगा। ऐसे में इस तरह के निर्णय से भारत प्रोडक्शन के मामले में एक कदम आगे हो जाएगा।
इस नई स्कीम से चीन को तो बड़ा झटका लगेगा ही, साथ ही भारत इस मामले में आत्मनिर्भर भी हो जाएगा। इस स्कीम के तहत भारत में स्वदेशी स्तर पर इन दवाओं के महत्वपूर्ण शुरुआती पदार्थ और एक्टिव फार्मास्यूटिकल्स इन्ग्रेडिएंट्स के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
2 जून से अगले चार महीने के लिए ये योजना है, जिसके तहत निवेशक ऐसे किसी भी 53 ड्रग इंटरमीडिएटरी और बल्क ड्रग के उत्पादन के लिए नए कारखाने स्थापित करने का प्रस्ताव पेश कर सकेंगें। इस सूची में ऐसे प्रमुख इन्ग्रेडिएंट शामिल हैं, जिनसे पैरासीटामॉल, एस्प्रिन, मेटफॉर्मिन, एटोरवेस्टाटिन जैसी दवाइयां शामिल हैं। सरकार के अनुसार, अपना देश आत्मनिर्भर बनें और चीन पर निर्भरता कम हो।
इस योजना के तहत पात्र उत्पादों को पहले चार साल तक सरकार सालाना बिक्री बढ़त का 20 फीसदी हिस्सा प्रोत्साहन के रूप में देगी, इसके बाद पांचवें और छठे साल में यह प्रोत्साहन 15 और 5 फीसदी हो जाएगा, केमिकली सिथेंसिस होने वाले उत्पादों पर पांच साल तक बिक्री बढ़त के 10 फीसदी हिस्से के बराबर प्रोत्साहन दिया जाएगा।
अमेरिका: न्यूयॉर्क समेत कई शहरों में हिंसा जस की तस, बेकाबू हुए अश्वेत
ब्यूरो | navpravah.com
अमेरिकी अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में मौत की वजह से हिंसा बेकाबू है। उग्र विरोध प्रदर्शन इतना बढ़ गया है कि कर्फ्यू के बावजूद इसको रोक पाना कठिन हो गया है। देश के प्रमुख शहरों न्यूयॉर्क, फिलाडेल्फिया, शिकागो और वॉशिंगटन समेत कई शहरों में कर्फ्यू लगा हुआ है, लेकिन प्रशासन प्रदर्शनकारियों में रोक पाने में नाकाम है।
ये सब सिलसिला 25 मई से शुरू हुआ, जब एक अश्वेत नागरिक को एक पुलिस अधिकारी ने गाड़ी से उतारकर ज़मीन पर लिटा दिया और घुटने से उसकी गर्दन दबाये रखा, जिसकी वजह से उस नागरिक की मौत हो गई। इस घटना से अश्वेत लोगों में रोष उत्पन्न हुआ, जिसके बाद अब उन्हें रोक पाना कठिन हो गया है। पूरे अमेरिका में विरोध हो रहा है। विरोध प्रदर्शन को समाप्त करने के लिए बराक ओबामा जैसे कई नेता भी सामने आए लेकिन भड़के हुए लोगों पर किसी की अपील का कोई असर नहीं हो रहा है।
जानकार बताते हैं कि यह विरोध प्रदर्शन इतना उग्र है कि दशकों में ऐसी उग्रता आम जनमानस में देखने को नहीं मिली। पिछले कुछ दशकों से अमेरिका में स्थिति सामान्य स्थिति में रही, विरोध प्रदर्शन हुए लेकिन ऐसी भयावह स्थिति कभी नहीं बनी। इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान संपत्तियों, इमारतों में तोड़-फोड़ की गई, कई जगहों पर लूट की वारदात को अंजाम दिया गया, वहीं कई जगहों पर वाहनों को जला दिया गया। कई जगहों पर शांतिपूर्ण चल रहे विरोध प्रदर्शन भी अचानक उग्र हो गए।
वॉशिंगटन में अमेरिकी सैन्य वाहनों को व्हाइट हाउस के करीबी सड़कों पर देखा गया। लाफयेट पार्क में सुरक्षाकर्मियों की बड़ी संख्या में तैनाती की गई है। हजारों लोग इन जगहों पर ह्यूस्टन के निवासी जॉर्ड फ्लॉयड की मौत का विरोध कर रहे हैं।
Cyclone Nisarga: दोपहर तीन बजे तक मुम्बई तट से टकरा सकता है ख़तरनाक तूफ़ान
…इसलिए, अलका लाम्बा ने भाजपा नेता को कहा बेशर्म
न्यूज़ डेस्क | navpravah.com
मध्य प्रदेश के रीवा जिले से बीजेपी विधायक राजेंद्र शुक्ला ने बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद से श्रमिकों को लाने के लिए मदद मांगी, तो इस पर कांग्रेस नेता अलका लांबा ने हल्ला बोला दिया।
बीजेपी विधायक ने मुंबई में फंसे मध्य प्रदेश के रीवा और सतना जिले के निवासियों की सूची बनाकर ट्वीट करते हुए सोनू सूद से मदद मांगी, तो इसको लेकर कांग्रेस नेता अलका लांबा ने कहा कि देश और राज्य में इनकी ही पार्टी की सरकार होते हुए भी सोनू सूद से मदद मांग रहे हैं।
अलका लांबा ने ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा कि, ‘आंखों पर यकीन नहीं होता कि जो खुद विधायक और पूर्व में मंत्री भी रहा, मध्यप्रदेश और देश में इन्हीं की सरकार है, मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री इन्हीं की पार्टी के हैं, फिर भी मदद सोनू सूद से मांग रहे हैं, थोड़ी भी शर्म हो तो इस्तीफ़ा देकर घर बैठ जाओ।’
बता दें कि, बीजेपी विधायक राजेंद्र शुक्ला ने अपने ट्वीट में लिखा था कि, ‘सोनू सूद जी रीवा और सतना जिले के निवासी मुंबई में फंसे हुए हैं, कृपया इनको लाने में हमारी मदद करें’ इसी ट्वीट में उन्होंने न सिर्फ विधायक बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पीएम मोदी का भी जिक्र किया था।
साइक्लोन निसर्ग: प्रशासन मुस्तैद, मुम्बई में ख़ाली कराया गया ओपन अस्पताल
बोलती तस्वीरें- “भारत एक खोज (1988)”
डॉ० कुमार विमलेन्दु सिंह | Navpravah Desk
इतिहास की प्रस्तुति और लेखन, हमेशा प्रश्नों के घेरे में रहे हैं। भारत के परिप्रेक्ष्य में दुविधाएं बढ़ जाती हैं, जब भी इतिहास के लेखन और प्रस्तुति की बात आती है। भारत एक विशाल और महान संस्कृति वाला देश रहा है और आक्रांताओं के द्वारा, इसका दोहन लगातार किया जाता रहा है। यही कारण है कि इतिहास भी विजेताओं ने ही लिखा अधिकतर। पराजित जनता की चेतना गौरव गाथा को मिथ्या मानने लगती है या उसे मनवाया जाता है, ताकि विजेता अपने अत्याचारों और भ्रष्टाचारों को सार्थक सिद्ध कर सके। भारत की विदूषी, गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक ने, मूल और पराजित निवासियों के, विदेशियों द्वारा प्रस्तुत इतिहास के संस्करण को आसानी से मान लेने की प्रक्रिया को एक संज्ञा दी है, “Worlding”. इस प्रक्रिया के तहत शासित, अपना इतिहास प्रस्तुत नहीं कर पाता और मानने लगता है, वो सब कुछ, जो बाहरी लोग उसे बताते हैं। भारत में भी यही हुआ।
जब पं०जवाहरलाल नेहरू ने, “Discovery of India” लिखी, तब ये संतोष हुआ कि किसी भारतीय ने अपने देश का इतिहास लिखा। हालांकि उनके प्राथमिक स्त्रोत भी विदेशी पुस्तकें ही रहीं, लेकिन भारतीय होने के कारण, उनकी व्याख्या अधिक मान्य थी। ये किताब, भारत में लिखी गई सबसे प्रशंसनीय किताबों में से एक है और इसी पुस्तक को आधार बनाकर महान निर्देशक श्याम बेनेगल ने, 1988 में “भारत एक खोज” नाम का एक धारावाहिक बनाया और इसे दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया।

इस धारावाहिक के कुल 53 एपिसोड बने और भारत के 5000 साल का इतिहास इसमें दिखाया गया। लिखे गए इतिहास को “हिस्ट्रियोग्राफ़ी” कहते हैं और जब यही इतिहास, चित्रों या चलचित्रों के माध्यम से कलात्मक स्वतंत्रता के साथ दिखाया जाता है, तो इसे “हिस्ट्रियोफ़ोटी” कहा जाता है। हिस्ट्रियोफ़ोटी में तथ्यों से भटक जाने की पूरी संभावना होती है, लेकिन “भारत एक खोज”, इस मामले में एक अपवाद है। इसमें नेहरू जी की पुस्तक (अगर इसे विश्वसनीय इतिहास की पुस्तक मानें) का सटीक नाट्य रूपांतर प्रस्तुत किया गया ।

1988 नेहरू जी के जन्म का शताब्दी वर्ष था, इसलिए ये धारावाहिक, उसी साल प्रसारित होना शुरू हुआ। श्याम बेनेगल न केवल इस धारावाहिक के निर्देशक थे, उन्होंने इसके लेखन में भी योगदान दिया। पटकथा, शमा ज़ैदी, सुनील शानबाग और संदीप पेंडसे ने लिखा। संवाद, और हिन्दी में पूरी पटकथा के बड़े हिस्से का लेखन, वसंत देव और अशोक मिश्रा के ज़िम्मे था।
ये एक वृहद पैमाने पर बनाया गया धारावाहिक था और इसमें भारत का प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास दिखाया गया था, अतः उस समय के लगभग सभी बड़े, छोटे कलाकारों ने इसमें काम किया। इरफ़ान ख़ान से लेकर सदाशिव अमरापुरकर और आलोकनाथ से लेकर वीरेन्द्र सक्सेना तक ने इसमें काम किया। अखिलेन्द्र मिश्रा ने भी कुछ किरदार निभाए।

इस धारावाहिक में बीच-बीच में एक वाचक की आवाज़ आती थी और ये आवाज़, प्रसिद्ध अभिनेता, ओम पुरी की थी। रोशन सेठ, नेहरू जी का किरदार निभा रहे थे। इतिहास के हर काल के प्रदर्शन में, वेश-भूषा भिन्न थी और इसका ज़िम्मा सलीम आरिफ़ को दिया गया था। इसकी सिनेमैटोग्राफ़ी, वी०के०मूर्ति ने की थी और संपादन, सुतनु गुप्ता और दीपक सहगल का था। इस धारावाहिक के कार्यकारी निर्माता, राज पायस थे। कुछ भागों में संजय लीला भंसाली का भी संपादन था।
“वैसे तो इस धारावाहिक में सब कुछ बहुत उच्च स्तर का था लेकिन जब भी कभी सर्वोत्तम शीर्षक गीतों की सूची बनेगी, इस धारावाहिक का शीर्षक गीत, शीर्ष पर ही होगा। “सृष्टि से पहले सत् भी नहीं था, असत् भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं था, आकाश भी नहीं” , इस महान गीत की गूंज आज भी विशालता का द्योतक लगती है, ये शब्द, संस्कृत श्लोकों का हिन्दी अनुवाद हैं और ये कठिन कार्य, वसंत देव ने किया था।”
इस गीत के साथ, भारत की विशालता और महानता को दर्शाता और महसूस करवाता संगीत, वनराज भाटिया का था।
सुनें शीर्षक गीत-
दूरदर्शन ने भारत की, संभावना से भरी पीढ़ी को इतिहास का महत्व बताने और उसके प्रति रूचि जगाने का काम शुरू कर दिया था और आने वाले समय में और भी ऐसी प्रस्तुतियां होनी थीं, लेकिन जिस कौशल के साथ ये धारावाहिक बनाया गया था, वो दोबारा देखने को नहीं मिला।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार, फ़िल्म समालोचक, स्तंभकार, व शिक्षाविद हैं.)

















