आर्य विद्या मंदिर बांद्रा पश्चिम के वार्षिकोत्सव उत्कर्ष 2015 के अन्तर्गत “डॉ वर्गिस कुरियन: एक स्वप्न द्रष्टा” विषय पर एक दिवसीय महोत्सव धूमधाम से सम्पन्न हुआ। अमूल इंडिया लिमिटेड के प्रणेता डॉ. कुरियन के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर आधारित नृत्य नाटिका के साथ साथ बोल री कठपुतली रानी, लघु नाटिका,मॉस्क मेकिंग, झरोखा पेंटिंग, पतंग मेकिंग तथा टेस्ट आफ इंडिया मास्टर शेफ इत्यादि इवेंट में मुंबई के तेरह प्रतिष्ठित आई.सी.एस.ई. विद्यालयों ने इसमें हिस्सा लिया।
माननीय मुख्य अतिथि जी. सी. एम. एम. एस. के मैनेंजिंग डाइरेक्टर डॉ. आर एस. सोंधी जी अपने समूह के सदस्यों के साथ निर्धारित समय से कार्यक्रम में उपस्थित हुए। डॉ. सोंधी ने कार्यक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा की और छात्रों को सम्वोधित करते हुए कहा, “डॉ कुरियन के जीवन मूल्य शिक्षा के प्रमुख अंग हैं। उन्होंने सफलता के लिए कभी छोटा रास्ता (short cut) नहीं चुना। सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए साहस और निर्भयता को हथियार बनाना चाहिए।”
सह मुख्य अतिथि तथा की सुपुत्री सुश्री निर्मला कुरियन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए चेन्नई से आईं। कार्यक्रम को देखकर भावविभोर होकर उन्होंने विद्यालय समूह की निदेशिका तथा प्राचार्या श्रीमती कुमार को कोटिश धन्यवाद दिया और इसी तरह शैक्षणिक कार्यक्रमों को सम्पन्न करने की प्रेरणा दी।
इसके अतिरिक्त उपस्थित अतिथियों ने कार्यक्रम में प्रतिभागी छात्रों, शिक्षक गण तथा अभिभावकों के सामूहिक प्रयास की प्रशंसा की। इस प्रकार कार्यक्रम सकुशल सम्पन्न हुआ।
समसामायिक हिंदी कविता गहरे सामाजिक सरोकारों की कविता है। वह मानवीय संबंधों के प्रति अतिशय संवेदनशील है। उसमें टुकड़ो में ही सही, लेकिन वर्तमान सभ्यता और समाज का समग्र चित्र विद्यमान है। समय और परिस्थिति का दबाव भले ही कवि को अपने में सिमटने पर विवश करे, पंरतु वह पर-दुख-ताप से पिघलकर अपने व्यक्तित्व में दरिया का विस्तार महसूस करता है।
अरुण कमल के व्यक्तित्व निर्माण के मुख्य प्रेरणास्त्रोत उनके पिता श्री कपिलदेव मुनि रहे। कविता लेखन में अरुण कमल की विशेष रुचि थी। कविता की भावुकता उनके निजी जीवन में भी देखने को मिलती है। संगीत में भी उनकी विशेष अभिरुचि है।
अरुण कमल के ‘नये इलाके में’ काव्य-संग्रह को वर्ष 1998 का ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ दिए जाने पर विद्वानों के मध्य अनेक विवाद उपजे और बहुत से आक्षेप लगाए गए। किन्तु इन कविताओं में गहरे डूबने पर जो जीवन की अर्थ-छवियाँ पाठक को मिलती हैं, उनमें वे सारे आक्षेप अपने आप खारिज हो जाते हैं।
काव्य में वस्तु अथवा रूप में से किसी एक को अधिक महत्व देना सही नहीं है । इनमें से कोई भी बड़ा या छोटा नहीं है । दोनों का संबंध अन्योन्याश्रित है। ये दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं और साहित्य में दोनों की ही भूमिका महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक है।
अरुण कमल उन कवियों में से हैं जो जीवन की जटिलताओं एवं अन्तर्विरोधों से जूझते हैं। उन्हें अपनी कविताओं में मुखर करके पाठकों को सोचने पर विवश करते हैं । अपने समय के दबावों से प्रभावित होने के कारण अरुण कमल की कविताओं में समकालीन राजनीति के चित्रण के साथ-साथ समसामयिक परिवेश जीवन्त हो उठा है। अनेक कविताओं में कवि ने एक दहशत भरे माहौल का चित्रण किया है। देष में बढ़ती हुई अराजकता और गुंडागर्दी का चित्रण उनकी कविताओं में मिलता है।
अरुण कमल की कविता में जीवन के विविध क्षेत्रों का चित्रण मिलता है। इस विविधता के कारण उनकी भाषा में भी विविधता के दर्शन होते हैं। अरुण कमल ने अपनी कविताओं में अभिव्यक्त होनेवाले भाव को ठेठ समकालीन भाषा के अत्यंत सहज लहजे में प्रस्तुत किया। उनकी भाषा में लोकजीवन से शब्दों, मुहावरों, ग्रामीण बोली-भाषा व स्थानीय शब्दों का प्रयोग हुआ है।
समकालीन कविता ने ‘शिल्प’ को व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया है। इसका तात्पर्य सौंदर्य के उन तमाम उपादानों, साधनों, तत्वों आदि से है, जिनके द्वारा वह अपने भाव और विचार पाठकों तक प्रेषित करती है। हिंदी साहित्य में प्रयोगवादी कवियों ने काव्य-शिल्प के प्रति जागरुकता व्यक्त करते हुए शिल्प के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग किए। अरुण कमल का मुहावरा अपने समकालीनों में काफी अलग और सहज रूप से ध्यानाकर्षी रहा है। वे प्रगतिशील चिंतन के कवि माने जाते हैं, जिसका पर्याप्त साक्ष्य उनकी कविताएँ देती हैं।
अरुण कमल ने भाषा को जीवन के बहुत निकट लाने का प्रयास किया है। उनकी भाषा जिंदगी और अनुभव की भाषा है। उसे अनुभव से अलग करके नहीं समझा जा सकता। अरुण कमल की कविताओं में कुछ ताजे और अछूते बिंब देखने को मिलते हैं। ये बिंब प्रकृति या लोक-जीवन से अनायास उनकी कविताओं में आते हैं। वे अपने सामान्य और साधारण बिंबो को हमारे चिर-परिचित परिवेश से उठाते हैं और अपनी कला से गजब का सामर्थ्य और अदभुत वैशिष्ट्य भर देते हैं।
अरुण कमल की कविताओं में उम्मीद को जिलाए रखने की कोशिश मिलती है। कवि को यह पूरी उम्मीद है कि एक दिन राजपाट के पुराने भ्रष्ट तरीके समाप्त हो जाएंगे और उनके स्थान पर एक स्वस्थ व्यवस्था कायम होगी, जहाँ न मूर्खों का राज होगा, न ही पकवान का भेाज छकता महन्त। साथ ही देश में भय और आतंक फैलाने वाले गिरोह भी समाप्त हो जाएँगे। तब शासन की बागडोर दयालु, भोले-भाले और पवित्र आत्मा वाले लोग सँभालेंगे। वे देश में सुख-शांति फैलाएँगें, जनता को अन्धकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले चलेंगे।
महाराष्ट्र के युवा मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस का कहना है कि सन 2019 तक मेट्रो रेल मुंबई के हर वार्ड से होकर गुजरेगी। मेट्रो रेल के तानेेबाने के साथ ही अगले साल नवंबर तक पूरी मुंबई सीसीटीवी कैमरे की जद में होगी जबकि इस नवंबर में दक्षिण मुंबई का इलाका सीसीटीवी की जद में आ जाएगा।
मुख्यमंत्री फडणवीस ने बीते 31 अक्टूबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और शिवसेना के बिना महाराष्ट्र में पहली बार बीजेपी सत्तासीन हुई थी। आगामी 31 अक्टूबर को फडणवीस का एक साल का कार्यकाल पूरा हो रहा है। उन्होंने सरकारी आवास वर्षा में कुछ चुनिंदा पत्रकारों के साथ अपने एक साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को साझा किया। इस दौरान उन्होंने बताया कि चुनाव के दौरान तैयार किए गए विजन डाक्यूमेंट के तहत काम शुरु किया गया हैं। आगामी पांच साल में बदलाव नजर आएगा। सरकार की योजना है कि सन 2019 तक मुंबई के हर वार्ड में मेट्रो रेल दौड़ेगी। इस नवंबर में दक्षिण मुंबई सीसीटीवी के कैमरे लग जाएंगे और अगले साल नवंबर तक पूरी मुंबई कैमरे की जद में होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत के सपनों को साकार करने के लिए महाराष्ट्र के शहरों को खुले शौच से मुक्त किए जाने की योजना शुरु है। फडणवीस ने कहा कि सन 2017 तक महाराष्ट्र देश का पहला राज्य होगा जो खुले में शौच पूरी तरह बंद हो जाएगा।
सूखे से निपटने के लिए कारगर योजना है जलयुक्त शिवार-
फडणवीस का कहना है कि महाराष्ट्र में सूखे से परेशान किसानों की आत्महत्या रोकने में जलयुक्त शिवार योजना कारगर साबित होगी। तीन साल में सूबे का कृषि संकट काफी हद तक समाप्त कर देंगे। राज्य में इजराईली पैटर्न यानि कम जगह में ज्यादा उत्पाद की खेती भी शुरु की जाएगी। राज्य में 1059 मौसम स्टेशन बनाएंगे जिससे किसानों को यह जानकारी मिलेगी कि उनके लिए कब और कौन सी फसल फायदेमंद रहेगी।
उपहास के दायरे से बाहर निकल चुके हैं-
एक साल के कार्यकाल बीते एक साल में वे उपहास के दायरे से बाहर निकल चुके हैं। अब दो साल तक विरोध का स्टेज होगा। इस विरोध के दायरे को भी आसानी से पार करेंगे। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद शुरुआत में लोग कहते हैं कि ये नया है। उपहास उड़ातेे हैं लेकिन, अब मैं उस दायरे से बाहर निकल चुका हूं। विपक्षी नेताओं को लग रहा है कि जम गया है तो विरोध का स्टेज शुरु होगा। अब दो साल विरोध होगा। लेकिन, जब ठीक से काम करेंगे तब लोगों में विश्वास बढ़ेगा और जनमान्यता मिलेगी।
सकारात्मक राजनीति में भरोसा-
भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे फडणवीस यह जानते हैं कि शिवसेना ने विरोध का जो तरीका अपना रखा है उसमें विशेष परिवर्तन की उम्मीद नहीं है फिरभी उनका दावा है कि सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगी। फडणवीस ने कहा कि मेरा मूल स्वभाव कोई राजनीतिक नहीं है कि इसको जवाब दूं या उसको खत्म करूं। मैं काम करता रहता हूं। सकारात्मक राजनीति में विश्वास रखता हूं और उसी की बदौलत यहां तक पहुंचा हूं।
शिवसेना के विरोध के बावजूद पांच साल पूरा करेगी सरकार-
हाल के दिनों में शिवसेना के उग्र हिंदुत्ववाद की भूमिका अपनाने के मुद्दे पर देवेन्द्र फडणवीस शिवसेना का नाम लिए बिना कहते हैं कि राजनीतिक फायदे के लिए अड़चन पैदा किया जाता हैं लेकिन जनता सब जानती है। मुंबई में मराठी-गुजराती, मराठी-उत्तरभारतीय विवाद इसी की देन होती है। बीजेपी का शिवसेना के साथ 25 साल का साथ रहा है। अब गठबंधन किया है तो सरकार चलानी पड़ेगी।
फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज जल्दी ही सैफ अली खान, शाहिद कपूर और कंगना राणावत के साथ अपनी आगामी फ़िल्म ‘रंगून’ की शूटिंग करते नज़र आएँगे। फ़िल्म के निर्माण के सम्बन्ध में विशाल ने साजिद नाडियाडवाला के साथ करार किया है।
द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फ़िल्म संभवतः 15 नवम्बर से फ्लोर पर जाए।
साजिद से करार के बारे में विशाल ने कहा ” मैं इस विषय पर पिछले 8 साल से फ़िल्म बनाना चाहता था। मेरी इच्छा थी कि फ़िल्म के निर्माण में पूरी आज़ादी मिले। क्योंकि यह एकदम अलग तरह की फ़िल्म है और क्रिएटिव लेवल पर इसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं चाहिए। और मुझे लगा कि बतौर निर्माता साजिद नाडियाडवाला ही एकदम फिट हैं। और साजिद से मिलकर बात करने के बाद यह पूरी तरह से क्लियर भी हो गया।
इस सम्बन्ध में निर्माता साजिद ने कहा कि नाडियाडवाला ग्रैंडसन की पूरी टीम और मैं विशाल भारद्वाज के साथ काम करने को लेकर बेहद उत्सुक हूँ। आशा है जल्दी काम शुरू होगा। रंगून का विषय बहुत ही उम्दा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि भारत की तमाम क्लासिक फिल्मों में से एक होगी ‘रंगून’।
रंगून की कहानी लिखी है मैथ्यू रॉबिन्स ने, जिसे मुम्बई, अरुणांचल प्रदेश और यूएस में फिल्माया जाएगा।
मुम्बई: उ.प्र. के प्रतापगढ़ जिले के श्रीपुर गाँव में दबंगों द्वारा बी.ए. की छात्रा ज्योति विश्वकर्मा को ज़िंदा जला दिए जाने की घटना से आक्रोषित विश्वकर्मा समाज ने सोमवार, २६ अक्टूबर २०१५ को आज़ाद मैदान में धरना प्रदर्शन कर दोषियों पर कड़ी कारवाई की मांग करते हुए पीड़ित परिवार को उचित मुआवज़ा देने की मांग की है।
सर्व विश्वकर्मा समाज संस्था की ओर से आयोजित इस धरने के संयोजक शिवलाल सुतार ने बताया कि गत 25 सितम्बर को गाँव के कुछ दबंगों ने ज्योति पर मिट्टी का तेल डालकर ज़िंदा जला दिया था, जिसने बाद में इलाहाबाद के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया। यदि पुलिस व प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया होता, तो शायद ज्योति की जान बच सकती थी। ऐसी घटनाएँ दुबारा न हो, इसके लिए हम सबको कमर कसनी होगी।
इस घटना के विरोध में महाराष्ट्र के कोने-कोने से विश्वकर्मा वंशीय इकट्ठा हुए। मुंबई में भारी संख्या में औरतों ने भी इस प्रदर्शन में इसमें भाग लिया। विश्वकर्मा समाज की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने धरने में शामिल होकर दोषियों को कठोर सज़ा की मांग करते हुए पीड़ित परिवार को दी जानेवाली सहायता राशि बढ़ाने की मांग की है। सभी लोगों ने सामूहिक रूप से मोमबत्तियां जलाकर ज्योति की दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की।
धरना प्रदर्शन में भरत विश्वकर्मा, राधेश्याम विश्वकर्मा, नागोराव पांचाल, बिपिन सुतार, बृजेश कुमार विश्वकर्मा, रामसिंगार विश्वकर्मा, राजकुमार विश्वकर्मा, संतलाल विश्वकर्मा, राजेंद्र भालेराव, हरिप्रसाद विश्वकर्मा, शोभनाथ विश्वकर्मा, हेमंत मिस्त्री, कृष्णप्रसाद विश्वकर्मा, श्याम विश्वकर्मा आदि सहित विश्वकर्मा समाज की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों ने भी अपने विचार रखे।
इस धरने में विश्वकर्मा समाज ने अपनी इन मांगों को मुख्य रूप से रखा:
दोषी पुलिस-कर्मियों का आजीवन निलंबन।
मुकदमे को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट को सौंपने की मांग।
विवादीन जमीं का जल्द न्यायिक निपटारा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मुआवजे की राशि बधाई जाय।
पीड़ित परिवार को न्यायिक सुरक्षा प्रदान की जाय।
सूत्रों की माने तो विश्वकर्मा वंशियों का इस प्रकार प्रदर्शन पहली बार मुंबई में देखने को मिला है।
रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की आने वाली फिल्म तमाशा का नया गाना ‘अगर तुम साथ हो’ हाल ही में रिलीज़ हुआ। अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के मुताबिक़ यह गाना उनके दिल के बेहद करीब है। और फ़िल्म के सभी गानों में सबसे ज़्यादा छू लेने वाला गाना है।
इस गाने का वीडिओ भी काफी इमोश्नल है। इसको शूट करते वक़्त दीपिका काफी भावुक हो गई थी। जिसकी वजह से इसे शूट करने में भी काफी वक़्त लगा। इस गाने को आवाज़ दी है अरिजीत सिंह और अलका याग्निक ने और संगीतकार हैं ए.आर. रहमान।
दीपिका ने कहा कि कुछ गाने आपको गुनगुनाने को मजबूर कर देते हैं। और ‘अगर तुम साथ हो’ भी इन्ही गानों में से एक है। यह गाना बेहद भावुक कर देने वाला है। उन्होंने कहा कि यह निश्चित ही श्रोताओं को रास आएगा।
इम्तियाज़ अली का निर्देशन और रणबीर-दीपिका की पसंदीदा जोड़ी, का ‘तमाशा ‘ बड़े परदे पर अपना कमाल दिखाने के लिए पूरी तरह से तैयार है। फिल्म 27 नवंबर को रिलीज़ होने जा रही है।
फिल्में समाज का आईना होती हैं, इस कहावत को चरितार्थ करती है नितिन चंद्रा द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन बिहार’। बिहार समेत समूचे उत्तर भारत की सामाजिक,आर्थिक और व्यावहारिक दशा को बखूबी सिनेमाई शक्ल दी है निर्देशक नितिन ने। भ्रष्टाचार और दबंगई की वजह से उत्तर भारत के युवा किस कदर भ्रमित होकर गलत राह पर जा रहे हैं और उसका क्या नुकसान समाज को हो रहा है यही विषयवस्तु है इस फ़िल्म का।
पूरी फ़िल्म बिहार के बक्सर जिले में रहने वाले राजीव कुमार,शंकर पाण्डेय और जीन्स नामक किरदार के इर्द गिर्द घूमती है। इनमें से कोई प्रशासनिक अव्यवस्था से परेशान है,कोई सामाजिक तो सरकारी तंत्र से। राजीव कुमार आईएएस बनाना चाहता है लेकिन 2 बार साक्षात्कार से रिजेक्ट कर दिया जाता है वहीं शंकर के पास नौकरी पाने के लिए 2 लाख रूपए घूस के नहीं हैं। जिसकी वजह से उन्हें नौकरी नहीं मिलती है। राजीव पर बहन की शादी की ज़िम्मेदारी होती है। वह शहर से दूर कमाने जाता है, बमुश्किल लाख रूपए कमाकर बक्सर पहुँचता है लेकिन रास्ते में ही छिनैती का शिकार हो जाता है। जिससे राजीव परेशान रहने लगता है। शंकर भी आर्थिक तंगी से परेशान होता है और भाई से विवाद होने की वजह से घर छोड़कर चला जाता है और जीन्स के साथ रहने लगता है।
जीन्स,राजीव और शंकर आर्थिक तंगी से परेशान होने के कारण अपहरण की योजना बनाते हैं। बहुत सोचने के बाद तीनो निश्चित करते हैं कि होटल अम्बेसडर के मालिक का अपहरण किया जाएगा। लेकिन गलती से अपहरण किसी और का हो जाता है। जिसके बाद अचानक से सभी की परेशानियां बढ़ जाती हैं। इसके बाद कहानी रोचक मोड़ ले लेती है। जिसका असली मज़ा लेने के लिए आपको सिनेमाघर तक जाना पड़ेगा।
फ़िल्म का संगीत औसत दर्ज़े का है। गीत और संगीत भोजपुरीमय है। शारदा सिन्हा का गया गीत फ़िल्म को मज़बूत करता है। पटकथा कई जगह बहुत कमज़ोर है और संवाद भी। फिर भी मुद्दा ज्वलंत होने की वजह से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता।
क्यों देखें– देश और समाज की दशा को करीब से समझने के लिए।
क्यों न देखें– अगर आपको मात्र मसाला फिल्में पसंद हों तो यह फ़िल्म आपको रास नहीं आएगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को भूकंप के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात कर उन्हें हर संभव मदद करने का आश्वासन दिया। प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ भूकंप से अब तक पाकिस्तान में 100 से अधिक लोग मारे गए हैं। 7.5 रेक्टर तीव्रता वाले भूकंप का केंद्र अफगानिस्तान में था।
सोमवार को पाकिस्तान समेत समूचे उत्तर भारत में आए भूकंप का केंद्र अफगानिस्तान था।
प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर जानकारी दी कि उन्होंने पाकिस्तानी पीएम नवाज शरीफ से बातचीत की। प्रधानमंत्री मोदी ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी से भी फोन पर बात की और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया।
मोदी ने बताया कि जब गनी उनसे इमारत गिरने की वजह से बच्चों के मारे जाने की बात बता रहे थे तो मेरा ध्यान 2001 में गुजरात में आई आपदा की ओर चला गया। बहुत दुःख हुआ।
मुंबई: प्रतापगढ़ के श्रीपुर गॉव में जलाकर मारी गई १९ वर्षीया ज्योति विश्वकर्मा को न्याय दिलाने हेतु देश भर में विश्वकर्मा समाज एकजुट हो गया है। इस सन्दर्भ में पिछले दिनों में देश भर में विश्वकर्मा समाज द्वारा विरोध प्रदर्शन व शोकसभा का आयोजन भी किया गया। मुंबई में भी जगह-जगह विरोध प्रदर्शन जारी है। इसी शृंखला में कल २६ अक्टूबर, २०१५ को मुंबई के आजाद मैदान में समस्त विश्वकर्मा समाज का धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया गया है। प्रशासन ने इस धरने की अनुमति दे दी है।
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में लालगंज, अजहारा तहसील के श्रीपुर उमरपुर गांव में 25 सितंबर की शाम कुछ दबंगों ने ज्योति विश्वकर्मा को कुछ जमीनी -विवाद के चलते ज़िंदा जला दिया था। आठ दिनों तक मृत्यु से लड़ते-लड़ते अंततः ज्योति ने दम तोड़ दिया। यदि ज्योति का सही ढंग से इलाज़ हो जाता, तो शायद उसकी जान बच सकती थी। देश के दूर-दराज के इलाक़ों में होने वाली बर्बर घटना पर भी पुलिस और प्रशासन का क्यो रवैया होता है, यह इस घटना से साबित हो गया।
जब ज्योति के रिश्तेदार घटना की रिपोर्ट लिखवाने जेठवारा पुलिस स्टेशन गए तो, जैसा कि आरोप है, थानाध्यक्ष चंद्रबली यादव ने उन्हें गाली देकर भगा दिया। जलाने की वारदात रिपोर्ट दबाव बनाने के बाद 26 सितंबर की शाम दर्ज की जा सकी। जब सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 27 सितंबर को कार्रवाई करने का आदेश दिया तब पुलिस ने मुख्य आरोपी ओमप्रकाश मौर्या समेत सभी चारों आरोपियों को गिरफ़्तार किया।
हमारे समाज में निर्धन व असहाय सदा से शोषण का शिकार होते रहे हैं। ऐसी घटनाओं के विरोध में इस बार महाराष्ट के विश्वकर्मा, पांचाल समाज व अन्य विश्वकर्मा वंशियों ने एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन का फैसला किया है।
इस धरने में विश्वकर्मा समाज की मुख्य मांगें हैं :
दोषी पुलिस-कर्मियों का आजीवन निलंबन।
मुकदमे को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट को सौंपने की मांग।
विवादीन जमीं का जल्द न्यायिक निपटारा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मुआवजे की राशि बधाई जाय।
पीड़ित परिवार को न्यायिक सुरक्षा प्रदान की जाय।
आयोजकों ने विश्वकर्मा वंशियों को भारी संख्या में कल इस धरने में शामिल होकर अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करने का आग्रह किया है।
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लेखकों के सम्मान लौटाने वाले मामले में अब साहित्यकारों के अलावा फ़िल्म इंडस्ट्री का भी सहयोग मिलना शुरू हो गया है। अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के बाद अब मशहूर लेखक गुलज़ार ने भी लेखकों के सम्मान लौटाने का समर्थन किया हैं। गुलज़ार ने कहा कि देश ने ऐसा भय का माहौल पहले कभी नहीं देखा था।
गुलज़ार ने लेखकों के सम्मान लौटाने की प्रक्रिया को सही ठहराते हुए कहा कि लेखकों की आवाज़ दबाई नहीं जानी चाहिए। जिस तरह से पिछले कुछ समय में ऐसा माहौल पैदा हुआ है, उसमें लेखकों द्वारा उठाया गया कदम साहसिक एवं सही है।
उन्होंने कहा कि साहित्यकारों के सम्मान लौटाने के मामले में वह पहले कुछ उलझन में थे, लेकिन अब वह उनके दर्द के साथ हैं। उन्होंने कहा, कि मैं भी एक लेखक हूँ इसलिए मैं लेखकों का दर्द समझ सकता हूँ। देश में जो एक डर का माहौल है, उससे विचलित होना स्वाभाविक है। मैंने हिन्दुस्तान में ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा।
गुलजार ने लेखकों की दिक्कतों का सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ते हुए कहा कि लेखकों की स्थिति के लिए सरकार ही ज़िम्मेदार है।
उन्होंने कहा कि लेखक समाज की चेतना को जगाने वाले लोग हैं। वह बेचारा क्या राजनीति करेगा।