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Friday, July 31, 2026
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संजय दत्त की रिहाई अन्य कैदियों के साथ पक्षपात -कांग्रेस

Bureau@navpravah.com

अभिनेता संजय दत्त की सजा पूरी होने से पहले ही जेल से उनकी रिहाई को लेकर कांग्रेस ने महाराष्ट्र सरकार पर पक्षपात का आरोप लगाया है. महाराष्ट्र की भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस ने कहा कि अभिनेता के लिए अलग फैसला सुनाया गया क्योंकि वह सेलिब्रिटी हैं, आम आदमी नहीं.

महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल ने कहा कि जब दत्त 1993 के मुंबई श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों के मामले में कैद की सजा काट रहे थे सरकार ने उन्हें कई बार पेरोल पर छोड़ने के लिए विशेष अधिकारों का इस्तेमाल किया .

उन्होंने कहा,‘‘अभिनेता को पहले कई बार पेरोल पर छोड़ा गया था. कई जेलों में ऐसे हजारों अच्छा बर्ताव करने वाले दोषी बंद हैं. क्या सरकार ऐसे कैदियों के साथ समान न्याय करेगी?’’

पाटिल ने कहा, ‘‘कानून सभी कैदियों के लिए समान है परंतु चूंकि दत्त एक सेलिब्रिटी हैं, उन्हें अलग से न्याय दिया गया और सरकार की यह कार्रवाई आपत्तिजनक है.’’ उन्होंने कहा कि राज्य में अनेक अदालतों में करीब 50 लाख मामले लंबित हैं.

सरकार ने दत्त के मामले में फैसला लेने में जितनी स्फूर्ति दिखाई है,उतनी ही स्फूर्ति उन्हें इन तमाम मामलों को निपटाने के लिए भी दिखानी चाहिए

जाट आंदोलन की आड़ में गैंगरेप पर हाईकोर्ट सख्त

Bureau@navpravah.com

जाट आंदोलन की आड़ में मुरथल में महिलाओं के साथ हुए गैंगरेप को लेकर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट भी सख्त हो गया है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि जिन महिलाओं के साथ यह दुष्कृत्य किया गया है वे सीधे मुख्या न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज़ करवाएं. उन्हें पुलिस के पास शिकायत लेकर जाने की आवश्यकता नहीं है.

हरियाणा में जाट आंदोलन की आड़ में महिलाओं के साथ बलात्कार करने वालों की नकेल कसने की पूरी तैयारी प्रशासन और न्यायालय ने कर ली है. एक ओर जहां पर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने महिलाओं से अपील की है कि छेड़छाड़ और बलात्कात मामले की शिकायत सीधे न्यायालय करें वहीं दूसरी ओर मामले की जांच के लिए हरियाणा के डीजीपी को ही ज़िम्मा सौंपा गया है.

मुरथल में गैंग रेप की घटना से भले ही पुलिस इनकार कर रही हो, लेकिन जानकारी के मुताबिक यहां के मशहूर सुखदेव होटल के पास से महिलाओं के फटे कपड़े मिले हैं. जिसकी वजह से मामला एकदम तूल पकड़ता जा रहा है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक करीब 30 लोगों की भीड़ ने कई कारों को रोककर उसमे आग लगाईं और लगभग १० महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया. इन खबरों को पुलिस लगातार झूठी बात करार दे रही है. इस मामले पर सोनीपत के एसपी अभिषेक गर्ग का कहना है कि मात्र कपडे मिल जाने से ही बलात्कार की पुष्टि नहीं हो जाती.

पुलिस ने इस बयान के इतर न्यायालय ने यह चिंता प्रकट की है कि प्रदेश में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं. जो प्रशासन की व्यवस्था पर सवालिया निशाँ लगाती नज़र आ रही है.

आज आर्थिक सर्वेक्षण पेश करेंगे जेटली

Bureau@navpravah.com

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली आज लोकसभा में आर्थिक सर्वेक्षण पेश करेंगे. इस सर्वेक्षण में पिछले 12 महीने की आर्थिक स्थिति और विभिन्न विकास कार्यक्रमों की समीक्षा रिपोर्ट होगी. इस बीच विपक्ष के गर्म तेवर और सरकार की अडिगता के कारण लोकसभा और राज्यसभा में आज भी हंगामे के आसार हैं.

राज्यसभा में जेएनयू विवाद और रोहित वेमुला के मुद्दे पर मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी का जवाब आज भी जारी रहेगा. साथ ही लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर भी चर्चा जारी रहेगी.

गौरतलब है कि गुरुवार को स्मृति ईरानी ने सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी पर निशाना साधते हुए कहा कि जेएनयू में माँ दुर्गा और महिषासुर के विषय में आपत्तिजनक पोस्टर लगाए गए. जब स्मृति ईरानी ने इस पर्चे का कंटेंट पढ़ा तो इस पर विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया.

कांग्रेस ने स्मृति ईरानी के बयान पर आपत्ति जताते हुए जमकर हंगामा किया. खुलासा हुआ है कि 2013 में महिषासुर दिवस कार्यक्रम में बीजेपी के सांसद उदित राज शामिल हुए थे.
हालांकि उदित राज ने महिषासुर दिवस कार्यक्रम में शामिल होने की बात मानी भी है मगर 2013 में उदित राज बीजेपी में नहीं थे, 2014 में उन्होंने पार्टी ज्वाइन की थी.

हंगामे के कारण कल स्मृति ईरानी का बयान पूरा होने से पहले ही सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी थी. कल कांग्रेस ने इस मुद्दे पर संसद नहीं चलने देने का एलान भी कर दिया था. लोकसभा-राज्यसभा में महिषासुर मुद्दे का बार-बार जिक्र करने पर कांग्रेस ने स्मृति ईरानी पर जमकर हमला बोला था. साथ ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री से माफी की मांग की थी. सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने भी सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार महिषासुर मुद्दे पर राजनीति कर रही है.

राष्ट्रद्रोह को अभिव्यक्ति की आज़ादी कैसे कहा जा सकता है-अरुण जेटली

ShikhaPandey@navpravah.com

बजट सत्र के दौरान राष्ट्रवाद और जातिवाद पर हुई बहंस में बुधवार को जहाँ मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने विपक्ष व अन्य पार्टियों का मुंह बंद कर दिया था वहीं गुरुवार को इस बहंस में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली,एनसीपी नेता डी पी त्रिपाठी और माकपा नेता सीताराम येचुरी भी शामिल हुए.जेटली ने विपक्ष के आरोपों पर कई सवाल खड़े किए.

जेटली ने विपक्ष से पूछा कि आखिर राष्ट्रद्रोह अभिव्यक्ति की आज़ादी कैसे बन सकता है?उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या हम ऐसे लोगों को समर्थन दे रहे हैं जिनकी सोच देश को बांटने की है?जेटली ने कांग्रेस पर परोक्ष रूप से हमला करते हुए कहा कि दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ लोग सोचते बाद में हैं और करते पहले हैं.जेटली ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जेएनयू जाने से पहले आपको सोचना चाहिए था,आप तो काफी समय से सत्ता में हैं,हम नए नए आये हैं.आपके दो दो नेता आतंकवाद की बलि चढ़े हैं ,इसलिए आपको इस विषय में अधिक संवेदनशील होना चाहिए.

इस बहंस के दौरान डी पी त्रिपाठी ने रोहित वेमुला की मौत को संस्थागत हत्या करार दिया.उन्होंने भी पलटवार करते हुए सवाल किया कि एबीवीपी की रैली में क्या हुआ? उन्होंने कहा,” दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी सदस्य जो छात्र संघ के अध्यक्ष हैं, उन्होंने कहा कि हम कैंपस में घुस कर धोखेबाज़ों को गोली मारेंगे.यह भी तो नफरत फ़ैलाने वाला बयान है. आज अपराधी हमे देशभक्ति सिखा रहे हैं?” उन्होंने सत्ता पक्ष पर आरोप लगाया कि वे 9 फरवरी की घटना को जेएनयू संस्थान की छवि बिगाड़ने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

जेडीयू नेता के सी त्यागी ने स्मृति ईरानी के बुधवार के भाषण पर जवाब देते हुए कहा कि किसी ने भी स्मृति ईरानी की जाति नहीं पूछी, डी पी त्रिपाठी, नरेश अग्रवाल, राजीव शुक्ल या स्वयं उनकी अपनी जाति नहीं पूछी.परंतु आंबेडकर से उनकी जाति पूछी गयी थी. जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर, पी एल पूनिया, कुमारी शैलजा व मायावती से उनकी जाति पूछी गई.

इसका जवाब देते हुए स्मृति बोलीं कि उन्होंने कभी कोई जातिवादी बयान नहीं दिया न ही कोई ऐसी टिप्पणी की.

साम्प्रदायिक दंगे: दिल्ली दरबार पर कब्ज़ा जमाने का साधन

JitendraPandey@navpravah.com

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कहानी का सरोकार वैविध्यपूर्ण है। भूमण्डलीकरण के दौर में विश्व-बाज़ार के श्यामल पक्ष का लेखा-जोखा इन कहानियों में प्रस्तुत हुआ है। साथ ही पाठकों में विश्वग्राम की संवेदना जगाती दर्ज़नों कहानियां अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं। ये सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक दायित्वों के प्रति पूर्णतः सजग और सतर्क हैं। इनमें समाज की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। सामाजिक विषमताओं की पड़ताल करती इक्कीसवीं सदी की कहानी हिंदी कहानी के एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव को पार कर रही है, पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ।

अत्याधुनिक तकनीकी और प्रगतिशील विचारों से लैस समाज जब साम्प्रदायिकता की आग में झुलसने लगता है, तब इक्कीसवीं सदी की कहानी सभ्य और सुसंस्कृत कहे जाने वाले समाज को कटघरे में खड़ा करती है। आज की कहानी उन सूक्ष्म तन्तुओं को सरेआम करने में सक्षम है, जो धर्म को साम्प्रदायिकता से जोड़ते हैं। इस सन्दर्भ में वैचारिक खेमा भी हमें निराश करता है, क्योंकि कुछ तथाकथित विचारधारा के समर्थक  धर्म को सम्प्रदाय विशेष के चश्में से देखते हैं, जबकि धर्म स्वयं में एक विराट संकल्पना है। धर्म को सम्प्रदाय से जोड़ना एक प्रकार का मानसिक दिवालियापन है। वामपंथ का जिक्र करते हुए प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने लिखा है – “हम वामपंथी लोग यह सोचते थे कि धर्म माने सम्प्रदाय। जबकि पाया यह जाता है कि गहरा धार्मिक व्यक्ति उतना साम्प्रदायिक नहीं होता, बल्कि बिल्कुल नहीं होता। साम्प्रदायिक वे होते हैं, जिनमें धार्मिक आस्था नहीं होती।” अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि वैचारिक हदबंदी किसी उर्वर साहित्य का कितना नुकसान कर सकती है।

साथियों ! साम्प्रदायिकता का इतिहास बहुत लम्बा नहीं है, क्योंकि भारतीय संस्कृति तो “सहनाववतु और सहनौभुनक्तु” में विश्वास करती आई है। यहां तो जीवों में भी आत्मरूप देखा गया है। कहने का मतलब समदृष्टि। प्रारम्भ में साम्प्रदायिक दंगों का स्वरूप सीमित था, किन्तु बाद में यह उग्र और भयंकर होता गया। असग़र वज़ाहत ने इस सन्दर्भ में लिखा है -“तब दंगे ऐसे नहीं हुआ करते थे जैसे आजकल होते हैं। दंगों के पीछे दर्शन, रणनीति, कार्यपद्धति और गति में बहुत परिवर्तन आया है। आज से पच्चीस-तीस साल पहले न तो लोगों को ज़िंदा जलाया जाता था और न पूरी की पूरी बस्तियां वीरान की जाती थीं। उस जमाने में प्रधानमंत्रियों, गृहमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों का आशीर्वाद भी दंगाइयों को नहीं मिलता था। यह काम छोटे-मोटे स्थानीय नेता अपना स्थानीय और क्षुद्र किस्म का स्वार्थ पूरा करने के लिए करते थे। व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता, जमीन पर कब्जा करना,चुंगी के चुनाव में हिन्दू या मुस्लिम वोट समेट लेना वगैरा उद्देश्य हुआ करते थे। अब तो दिल्ली दरबार पर कब्जा जमाने का साधन बन गए हैं साम्प्रदायिक दंगे।”

आंकड़े बताते हैं कि इक्कीसवीं सदी में साम्प्रदायिक दंगों में बढ़ोत्तरी हुई है। एक तरफ तो हम अंतरिक्ष में छिपे रहस्यों का पता लगा रहे हैं, दूसरी तरफ मानवता का दुश्मन बने बैठे हैं। मनुष्य के अंदर छिपा जानवर तब अधिक खूंखार और हिंसक हो जाता है, जब उसे दंगों का जंगल मुहैया कराया जाता है। ऐसा ही एक हृदय विदारक दृश्य कमल कुमार की चर्चित कहानी ‘पूर्ण विराम’ में देखने को मिलता है -“दरवाजे के बीचोंबीच माँ और पिता की कटी फ़टी लाशें थीं। उसकी सांस रुक रही थी, आंगन के बीच में उसकी बहन की नंगी देह पड़ी थी। उसके पेट के नीचे का हिस्सा क्षत-विक्षत था। खुली, चौड़ी की गई टांगों से लाल-लाल मांस के लोथड़े लटक रहे थे। फर्श पर बहता हुआ खून काला हो गया था। उसकी खुली छाती पर सैकड़ों ज़ख्म थे, जैसे कई कुत्तों ने एक साथ उसे नोच-नोचकर खाया था। उसने आँखें फिरा ली थीं। वह गिरता-पड़ता अंदर आया था। उसकी पत्नी की नंगी देह बिस्तर पर पड़ी थी। उसकी छातियां कटी हुई थी, मांस के लोथड़े ज़मीन पर पड़े थे। उसकी टांगों के बीच से पेट के बच्चे का आधा सिर बाहर लटका हुआ था। दोनों छोटे बच्चों के कई-कई टुकड़े कमरे में छितरे थे।”

देश का कोई कोना जब इस प्रकार लहू लुहान होता है, तो वहां का जनमानस निराश हो जाता है। उसका विश्वास सभ्य समाज से उठने लगता है। वह एक ऐसी दुनिया की कल्पना करता है, जहां इंसान मज़हबों में न बंटा हो। उनके अपने दुःख-सुख का साथी हो। इक्कीसवीं सदी का कथाकार उनके इसी दर्द को गहराई से महसूस करता है। प्रियंवद ने अपनी कहानी “लाल गोदाम का भूत” में उस वृद्ध के प्रति अपनी सहानुभूति दिखाई है, जो साम्प्रदायिक वैमनस्य का शिकार है। कहानी का पात्र अगनु सोचता है -“जमीन के ऐसे किस टुकड़े पर रहूँ जहां यह सब न होता हो , …जहां सिर्फ किसी दरख्त, धूप, सपने की जाति और धर्म वाला होने से काम चल जाए। मेरे गांव के पास एक पुराना खंडहर है। वहां कोई नहीं जाता। सब कहते हैं, वहां भूत रहते हैं। बिलकुल इंसानों की तरह नाचते हैं, खाते हैं, बात करते हैं। बस दिखते नहीं। सुना है कि भूत न आदमी होते हैं न औरत। न हिन्दू, न मुसलमान, न ईसाई। मैंने सोचा है कि इंसानों के बीच रहने से अच्छा है कि उनके साथ रहा जाए।”

आज का कथाकार भीड़ के मनोविज्ञान को भलीभांति जानता है। वह उन असामाजिक तत्वों को बेनकाब करता है, जो भीड़ को संगठित, संचालित और विध्वंसक कार्यों के लिए प्रेरित करते हैं। सुशांत सुप्रिय की कहानी “बंटवारा” इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। इक्कीसवीं सदी की कहानियों में यदि एक तरफ साम्प्रदायिक-दंगों के शिकार आम नागरिकों की पीड़ा को शब्दरूप दिया गया, वहीं दूसरी तरफ ऐसे पात्रों की कल्पना की गई है, जो साम्प्रदायिक ताकतों के विरोध में उठ खड़े होते हैं। ‘आँखें कहां हैं’ ‘मिलन’ ‘इंसान की औलाद’ ‘बाड़ के उस पार की हरियाली’ जैसी कहानियां इसी श्रेणी में आती हैं। इन कहानियों के पात्र सामाजिक सौहार्द कायम रखने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा सुशांत सुप्रिय, सावित्री रांका, वेदप्रकाश अमिताभ, रूपसिंह राठौड़, पंकज सुबीर, मुरलीधर वैष्णव, असग़र वज़ाहत आदि कहानीकार साम्प्रदायिकता के मनोविज्ञान को बड़ी बारीकी से पकड़ते हैं। इन्होंने हिंदी कहानी के सरोकारों में साम्प्रदायिकता को केंद्रीय समस्या के रूप में स्थापित किया है।

इक्कीसवीं सदी का कथाकार पूरी ईमानदारी और निर्भीकता के साथ जनसामान्य की पैरवी और राजनेताओं की कुटिलता का विरोध करता है। उसका यकीन है कि राजनीति दंगों की जन्मदात्री है। बस्तियों का सूनापन और मानवता को लाचार करना, उसकी सत्ता के लिए अनिवार्य शर्त है। ऐसी स्थिति में वह अपनी कहानियों में “सर्वधर्म समभाव” को अहमियत देता हुआ सामूहिक समन्वय पर ज़ोर देता है। असग़र वज़ाहत अपनी कहानी “ज़ख़्म” में लिखते हैं -” दंगे पुलिस, पी.ए.सी. और प्रशासन नहीं रोक सकता। दंगे साम्प्रदायिक पार्टियां भी नहीं रोक सकतीं, क्योंकि वे तो दंगों पर ही जीवित हैं। दंगों को अगर रोक सकते हैं तो लोग रोक सकते हैं।”

इस प्रकार इक्कीसवीं सदी की कहानियों में “साम्प्रदायिक सन्दर्भ” युगीन समस्या के रूप में मौजूद है। इनमें गहरा चिंतन, तटस्थ दृष्टि और स्वाधीन विवेक देखने को मिलता है। ये कहानियां अपनी व्यापकता, सघनता और अर्थवत्ता में हमें आश्वस्त करती हैं।

किराए में नहीं होगी बढ़ोत्तरी , रेल की बोगियां होंगी जीपीएस से लैस

Bureau@Navpravah.com

रेलवे मंत्री सुरेश प्रभु ने आज अपना दूसरा रेल बजट पेश करने के दौरान कहा कि ये समय चुनौतियों से भरा है। अर्थव्यवस्था में मंदी है,मगर वे रेलवे का किराया बढ़ाकर मुनाफा कमाने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि रेलवे के पुनर्गठन, पुनर्निर्माण और पुनरुद्धार की जरूरत है।

रेलवे में निवेश को बढ़ाकर पिछले वर्ष की तुलना में दोगुना किया जाएगा। रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की “विपदायें आती हैं, हम न रुकेंगे,न झुकेंगे “इन पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि मंदी के बावजूद वे हर चुनौती का सामना करने को तैयार हैं।

सुरेश प्रभु ने बताया कि ‘वित्तीय वर्ष 2016-17 में रेलवे में पूंजीगत योजना के लिए 1.21 लाख करोड़ रुपये रखे गया है।’ 1600 किलोमीटर रेलवे लाइन का विद्युतीकरण किया गया है। अगले साल तक इस क्षमता को बढ़ाकर 2000 किलोमीटर किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि अगले साल तक 2500 किलोमीटर रेलवे लाइन को शुरू करेंगे। राज्यों के साथ मिलकर रेल परियोजनाओं पर काम किया जाएगा। 17 राज्यों से इस पर बात चल रही है। साथ ही छह राज्यों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।

सुरेश प्रभु ने लोकसभा में रेल बजट 2016-17 को पेश करने के दौरान कई बड़े ऐलान किए. प्रस्तुत हैं मुख्य अंश-

– 2020 तक सभी यात्रियों को कन्फर्म टिकट उपलब्ध होगा.
– 400 स्टेशनों को सार्वजानिक निजी भागीदारी के जरिए आधुनिक बनाया जा सकेगा.
-जल्द ही 139 पर टिकट रद्द भी किया जा सकेगा.
– सभी प्रकार की खरीद ई-प्लेटफॉर्म पर की जा रही है। पहले जिस खरीद को दो साल का समय लगता था, अब वही काम 6 महीने में हो जा रहा है.
– वर्ष 2020 तक मानव रहित क्रासिंग खत्म करने का लक्ष्य.
– अगले दो सालों में 400 स्टेशनों पर वाई फाई सेवा उपलब्ध होगी.
– महिला यात्रियों की सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन 182 जारी किया गया है जो 24×7 उपलब्ध होगा.
– अंत्योदय, हमसफर, तेजस और उदय चार नई ट्रेनें शुरू की जाएंगी.तीर्थयात्रियों के लिए आस्था एक्सप्रेस शुरू की जायेगी.
– अंत्योदय एक्सप्रेस लंबी दूरी के लिए चलाई जाएगी जिसमें सभी  अनारक्षित डिब्बे होंगे.
– ‘तेजस’130 किमी/घंटे की रफ्तार चलेगी
– ‘उदय’डबल डेकर एसी ट्रेन होगी, जो रात में चलेगी
– हमसफर ट्रेन में एसी डिब्बे होंगे, खाने की सुविधा भी उपलब्ध होगी.
– विकल्प ट्रेन का विस्तार किया जाएगा
– तत्काल टिकट की बुकिंग के लिए काउंटर पर सीसीटीवी लगेंगे.
-ट्रेनों में 17000 बायो टॉयलेट लगाये जायेंगे.इसके अलावा 475 स्टेशनों पर अतिरिक्त टॉयलेट बनाए जाएंगे.
-कुछ ट्रेनों में मनोरंजन के लिए एफएम की भी व्यवस्था होगी. शिकायतों के निपटारे के लिए दो ऐप भी जारी किए जाएंगे.
-प्रत्येक ट्रेन की प्रत्येक बोगी में जीपीएस सुविधा उपलब्ध होगी.विकलांग यात्रियों के लिए व्हीलचेयर ऑनलाइन मंगाई जा सकेगी.
-मालगाड़ियों की रफ़्तार 50 किलोमीटर बढ़ाई जाएगी.
-मिशन जीरो एक्सीडेंट के तहत ट्रेनों में टक्कर रोधी सिस्टम लगाए जाएंगे.
-नए रेल बजट में वरिष्ठ नागरिकों का कोटा 50% बढ़ाया गया है.
-आईआरसीटीसी कैटरिंग की सुविधाओं को और बेहतर बनाएगी. ट्रेनों में स्थानीय व्यंजनों का भी स्वाद लिया जा सकेगा.

आज पेश होगा ‘सुविधाजनक’ रेल बजट

ShikhaPandey@navpravah.com

रेल मंत्री सुरेश प्रभु आज अपना दूसरा रेल बजट पेश करेंगे. सूत्रों के अनुसार बजट में बहुत बड़े पैमाने पर यात्री सुविधाओं को बढ़ाने पर जोर होगा परंतु रेल किराया नहीं बढ़ेगा. साथ ही किसी नई ट्रेन का एलान भी नहीं होगा.

रेल बजट पेश होने से पहले रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने बजट के विषय में कहा है कि नया रेल बजट देश और रेल के हित में होगा. इस रेल बजट में ई- कैटरिंग सुविधा के तहत ट्रेनों में बड़े ब्रांड्स का खाना देने का एलान भी हो सकता है.

रेलवे के मौजूदा टाइमटेबल में कोई नई ट्रेन नहीं जोड़ी जाएगी. यानी लगातार दूसरे साल किसी नई ट्रेन का ऐलान नहीं किया जाएगा. हालांकि त्योहार और छुट्टियों के मौसम में चलने वाली स्पेशल ट्रेनों की सुविधा जारी रहेगी.सामान्य श्रेणी के यात्रियों की मांग इस बार पूरी हो सकती है क्योंकि अब ट्रेनों में 24 कोच की जगह 26 कोच लगाए जाएंगे. बढ़े हुए कोच सामान्य श्रेणी के होंगे यानी साधारण टिकट से सफर किया जा सकेगा.

खाने की गुणवत्ता सुधारने के लिए रेल मंत्री नई नीति का ऐलान कर सकते हैं जिसके तहत भारतीय रेल की खान पान सेवा यानी आईआरसीटीसी पर ही खाने की गुणवत्ता की जवाबदेही तय कर दी जाएगी. सफर के दौरान आप पैसे देकर अपना मनपसंद खाना ऑनलाइन ऑर्डर कर पाएंगे. इस ई कैटरिंग सुविधा के तहत चायोस, फूडपांडा, केएफसी, डोमिनोज, व्हिम्पीज, हल्दीराम जैसे ब्रांड से करार हो चुका है. फिलहाल 45 स्टेशनों पर ये सुविधा उपलब्ध है जिसे इस रेल बजट में बढ़ाए जाने का ऐलान हो सकता है.

बेहतर सुविधा वाले नए कोच

रेल विभाग ने ऐसे नए कोच तैयार कर लिए हैं जिसमें सीसीटीवी समेत नए तरह की साज सज्जा दिखाई देगी. इन नए कोच में पूरी तरह स्टेनलेस स्टील का टॉयलेट होगा जिससे बेहतर सफाई मिलेगी. टॉयलेट खाली है या नहीं इसके लिए आपको इंडीकेटर भी कोच में ही दिख जाएगा. यही नहीं सीट पर लाईट्स को एलईडी में बदल दिया गया है. दोनों सीटों के बीच की जगह बढ़ा दी गई है और नए तरह की सीढ़ियां तो हैं ही. रेल बजट इन नए कोचों के इस्तेमाल की योजना पेश कर सकता है.

पिछले रेल बजट में रेल मंत्री ने ऊपर की बर्थ पर जाने के लिए सीढ़ियों को डिजाइन करने का वादा किया था. रेलवे ने इसका हल भी ढूंढ निकाला है और प्रयोग के तौर पर इसे मुंबई राजधानी के फर्स्ट एसी कोच में लगाया जा चुका है. इस रेल बजट में इस सुविधा को ज्यादा ट्रेनों में इस्तेमाल करने का ऐलान हो सकता है.

भारतीय रेल के तीन स्टेशनों पर नया बिस्तर चाहिए तो रेलवे आपको वो भी मुहैया करवाएगी. इस रेल बजट में तीन स्टेशनों पर चल रहे पायलट प्रोजेक्ट के विस्तार का ऐलान हो सकता है. मौजूदा व्यवस्था के तहत यात्री को टिकट बुक करते वक्त 110 रुपये में एक कंबल और 140 रुपये में दो चादरें और एक तकिया दिया जाता है और इसे अपने साथ घर ले जा सकते है. अब तक ये सुविधा एयरकंडीशंड कोच में ही थी जिसे स्लीपर कोच में भी मुहैया करवाने का ऐलान हो सकता है.

आमतौर पर लाल या नीले रंग में नजर आने वाली ट्रेनों का रूप-रंग बदलने के बारे में भी ऐलान हो सकता है. कई बदलाव होने के संकेत हैं जिसमें कोच का बाहरी रंग चीते के रंग जैसा दिखेगा. शताब्दी जैसी प्रीमियम ट्रेनों में सेमी हाई स्पीड की गति वाले कोच जोड़े जाएंगे और रफ्तार को 200 किलोमीटर प्रति घंटा करने और मेट्रो ट्रेनों जैसे दरवाजों का इस्तेमाल शामिल हैं. रेल मंत्री बजट में ऐसे बदलावों की समय सीमा और पायलट प्रोजेक्ट का ऐलान कर सकते हैं.

रेलमंत्री अपने यात्रियों के मनोरंजन की योजना भी पेश कर सकते हैं. कालका शताब्दी के एक्जिक्यूटिव कोच में प्रयोग पर शुरू की गई इस योजना में यात्रियों को अपने सामने वाली सीट के पिछले हिस्से पर एक एलईडी स्क्रीन मिलती है जिसमें वो फिलहाल 12 फिल्में और 100 वीडियो देख सकते हैं. इस सुविधा में ईयरफोन दिया जाना भी शामिल है. इस सुविधा के विस्तार के ऐलान पर नजरें रहेंगी.

सूत्रों के अनुसार हवाई जहाज़ की ऐरहोस्टेस की तर्ज़ पर भारतीय रेल की ट्रेनों में ट्रेन होस्टेस नजर आ सकती हैं. इस बजट में इस बड़े बदलाव पर भी नजर बनी हुई है.

बड़ी योजनाओं और बिना किराया बढाए कमाई बढ़ाना रेलवे के लिए चुनौती है. ऐसे में रेल मंत्री कमाई के लिए नए तरीके खोज रहे हैं. कुछ ट्रेन कोचों में चाय कॉफी की वेंडिंग मशीन लगाई जाएगी तो कहीं हवाई जहाज की तर्ज पर शॉपिंग की सुविधा भी देगी रेलवे. इससे उसे अतिरिक्त कमाई होगी.

रेलवे के कोच और पूरी ट्रेन पर विज्ञापन के जरिए कमाई की योजना भी अधर में है. रेल मंत्री कोच और पूरी ट्रेन का नाम निजी कंपनियों के नाम पर रखकर कमाई की योजना का खाका और समयसीमा भी पेश कर सकते हैं.

सज़ा काटकर जेल से निकले संजय दत्त, प्रशंसकों में उल्लास

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फिल्म अभिनेता संजय दत्त 42 माह की सज़ा काटने के बाद आज (गुरुवार को) यरवदा जेल से रिहा हो गए. अपने अच्छे स्वभाव की वजह से संजय की सज़ा निर्धारित समय से कम कर दी गई. जिसकी वजह से संजय को सरकारी छूट मिलने के बावजूद कुछ लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा. संजय दत्त को आर्म्स एक्ट के तहत यह सज़ा मिली थी और वे मुंबई सीरियल धमाके में अवैध हथियार रखने के दोषी पाए गए थे.

संजय दत्त ने अपने अच्छे व्यवहार और नेकदिली की वजह से जेल प्रशासन और कानून व्यवस्था का दिल जीता, जिसके चलते उन्हें निर्धारित 5 साल की सज़ा में 8 माह की छूट मिल गई. संजय दत्त जेल से छूटकर पुणे एयरपोर्ट गए हैं, जहां से वे सीधे मुंबई पहुचेंगे.

जेल से निकलने के बाद संजय दत्त बेहद भावुक नज़र आए. जेल से निकलते ही उन्होंने यरवदा जेल को सलाम किया और वहाँ पर उपस्थित परिजनों के साथ पुणे एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए. मुंबई में संजय के घर के आस पास के इलाके होर्डिंग्स और पोस्टर बैनर्स लगे हुए हैं, जिसमे उनके मित्रों से लेकर प्रशंसकों ने उनका अभिनंदन किया है.

यरवदा जेल के बाहर आज सुबह से ही संजय दत्त की रिहाई का विरोध करने वाले कई लोग जमा हुए. जिन्होंने नारे भी लगाए. पुलिस ने एहतियातन प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया. दत्त परिवार अपनी पूरी लीगल टीम के साथ सुबह 8 बजे ही पहुँच गयी थी. संजय दत्त के दोस्त राजकुमार हिरानी भी पुणे पहुँचे हैं.

मुंबई पहुंचकर संजय दत्त सबसे पहले सिद्धिविनायक मंदिर जाकर गणपति बाप्पा के दर्शन करेंगे, उसके बाद अपनी माँ नरगिस की कब्र पर भी माथा टेकने जाएंगे.

संजय दत्त को आज मिल जाएगी जेल से मुक्ति

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अभिनेता संजय दत्त आज पुणे की यरवडा जेल से रिहा होने जा रहे हैं. संजय को 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में शस्त्र कानून के तहत दोषी पाए जाने पर पांच साल जेल की सजा सुनाई गई थी. आख़िरकार पांच साल की सजा में से कुछ दिन घटाने के प्रयास में बॉलीवुड अभिनेता को सफलता मिल गई है.

जेल अधिकारियों ने बताया कि संजय को कल रिहा किया जाएगा. संजय के वकील के मुताबिक़, कानूनी नियमों और जेल नियमावली के अनुसार उनकी सजा में कमी की गई है. करीब 42 महीने तक सलाखों के पीछे रहे संजय की हो रही रिहाई के तय हो जाने के बाद, मामले के खिलाफ मुंबई हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है. याचिका में संजय की सजा में कमी पर सवाल उठाए गए हैं और यह आरोप लगाया गया है कि अभिनेता को जान बूझकर फायदा पहुंचाया जा रहा है .

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री राम शिंदे ने कल कहा था कि संजय 25 फरवरी को अपनी जेल की सजा पूरी करेंगे. उन्होंने बताया कि जेल में अच्छे व्यवहार के आधार पर संजय की सजा में आठ महीने और 16 दिन की कमी की गई है. संजय को जेल से घर लेकर जाने के लिए यरवडा उनकी पत्नी मान्यता, उनके बच्चे और नज़दीकी रिश्तेदार मौजूद होंगे.

बजट सत्र के दूसरे दिन स्मृति और मायावती में घमासान

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बजट सत्र शुरू होने से पूर्व सोमवार को बजट सत्र शांति पूर्वक चलने के उद्देश्य से हुई सभी पार्टियों की बैठक के बावजूद बजट सत्र के दूसरे दिन संसद में राज्यसभा-लोकसभा में जमकर हंगामा हुआ. राज्यसभा में रोहित वेमुला सुसाइड केस पर जमकर बहस हुई.

कुछ देर के लिए स्मृति ईरानी और मायावती आमने-सामने हो गईं. दोनों में जोरदार बहस हुई. मायावती ने रोहित की खुदकुशी के लिए शिक्षा मंत्रालय को जिम्मेदार बताते हुए स्मृति ईरानी पर कार्रवाई की मांग की तो स्मृति ईरानी ने उन्हें खुली चुनौती दे डाली.

रोहित वेमुला सुसाइड मामले पर बीएसपी चीफ मायावती बुधवार सुबह से ही राज्यसभा में चर्चा चाहती थीं. इसके लिए उन्होंने नोटिस भी दी थी. बीएसपी सांसद लगातार नारेबाजी कर रहे थे. दोनो दिग्गज महिला नेता जहाँ एक मोदी सरकार की ताकतवर मंत्री और दूसरी बीएसपी की अध्यक्ष मायावती,दोनों ने इस विषय पर एक-दूसरे पर जमकर हमला बोला.

मायावती ने जब कहा कि रोहित वेमुला की खुदकुशी की जांच करने वाली न्यायिक समिति में कोई दलित भी शामिल हो तो स्मृति ईरानी ने कहा जांच समिति में दलित शामिल हैं, साथ ही ये भी पूछ डाला कि क्या जिसको मायावती सर्टिफिकेट देंगी वही दलित हैं?

बीएसपी सांसदों के लगातार विरोध के कारण स्मृति ईरानी ने मायावती से कहा, “मैं आपसे विनम्र निवेदन करती हूँ,आप मुझसे जो जवाब चाहती हैं, उन सभी के जवाब दूंगी. मैं बसपा के प्रत्येक कार्यकर्ता और सभी  नेताओं से कहती हूं कि यदि आप मेरे जवाब से संतुष्ट न हों तो मैं सिर कलम करके आपके चरणों में रख दूंगी.”

इसके बावजूद मायावती के विरोध करने पर स्मृति ने कहा, ” आप एक मर चुके बच्चे का इस्तेमाल पॉलिटिकल टूल के तौर पर कर रही हैं.” राज्यसभा में मायावती के समर्थन में कांग्रेस, सीपीएम और जेडीयू ने भी आवाज बुलंद की. साथ ही कई नेताओं ने रोहित वेमुला के साथ जेएनयू विवाद पर भी चर्चा की मांग कर डाली.

राज्यसभा के स्पीकर ने साफ कर दिया है कि जेएनयू विवाद पर चर्चा का नोटिस किसी ने नहीं दिया है इसलिए सिर्फ रोहित वेमुला पर ही बहस होगी. कल भी बहस जारी रहेगी उसके बाद सरकार इस पर जवाब देगी. रोहित वेमुला के बहाने दलित राजनीति का मुद्दा फिर गरमा गया है.