जम्मू कश्मीर से पुलिस ने एक आतंकवादी को गिरफ्तार किया है। जम्मू कश्मीर के बारामुला से अब्दुल रहमान नाम के आतंकी को गिरफ्तार किया गया है। इतना ही नहीं, असल ताज्जुब की बात यह है कि इस आतंकी के पास से पुलिस को इसका आधार कार्ड भी मिला है। फिलहाल पुलिस आधार कार्ड की जांच कर रही है।
अब्दुल रहमान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के पुंछ का रहने वाला है। उसके पास से मिले आधार कार्ड पर उसकी तस्वीर है लेकिन उसका नाम नहीं है।
आतंकी शुक्रवार शाम को बारामूला के हाजीबल से गिरफ्तार किया गया था। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अब्दुल रहमान संगठन जैश ए मोहम्मद से है। पठानकोट हमले में भी अब्दुल रहमान की भूमिका होने की पूरी संभवना है। इस बात की जांच भली भाँति की जा रही है। साथ ही इस बात की भी जांच हो रही है कि अब्दुल रहमान को फर्जी आधार कार्ड कैसे मिला। आतंकी के पास से बरामद आधार कार्ड का नंबर 647856225315 है।
बिहार में अपराधियों का आतंक बढ़ता ही जा रहा है। अभी हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या का मामला शांत नहीं हुआ था कि राज्य एक बार फिर से दरिंदगी का मामला सामने आ गया है। ट्रेन मर हरे दो आरपीएफ जवानों को गोली मारने का सनसनीखेज मामला सामने आया है।
शुक्रवार को देर रात आरपीएफ के दो जवानों की गोली मारने का मामला सामने आया। दो में से एक जवान की हालत गंभीर है जबकि एक जवान की मौत हो गई है। जानकारी के मुताबिक़, वारदात मुगलसराय और बक्सर पैसेंजर ट्रेन नंबर 63240 की है। इन दोनों जवानों की ड्यूटी बक्सर पैसेंजर ट्रेन में थी।
अभी तक यह नहीं पता लग पाया है कि किन लोगों ने और किस वजह से इन जवानों को गोली मारी। अपराधियों ने जवानों की राइफल छीनकर उनपर गोलियां चलाई।
हालाँकि इस घटना के बाद से पुलिस ने अलर्ट जारी कर दिया है। लेकिन अब तक पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि आखिर इन दोनों जवानों पर फायरिंग क्यों की गई। हमलावर उनकी दो इनसास राइफल भी छीनकर ले गए हैं।
हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकार राजदेव रंजन की ह्त्या के अगले दिन समाचार पत्र ने पहले पृष्ठ को ब्लैक एंड वाइट रंग में छापकर इस कृत्य को काला दिवस करार दिया है। गौरतलब है कि बिहार के सीवान में शुक्रवार शाम हिन्दुस्तान के पत्रकार राजदेव रंजन को अपराधियों ने गोली मारकर ह्त्या कर दी। लगातार हो रही हत्या की घटनाओं की वजह से आमजनमानस डरा है। हिन्दुस्तान अखबार ने बिहार में इसे काला दिवस के रूप में दिखाया है।
बिहार में पत्रकार की मौत से राजनीतिक तपके में भेी खलबली मच गई है। हर तरफ से सुशासन बाबू नितीश कुमार पर हमले हो रहे हैं। पत्रकार की हत्या उसके सालगिरह से महज़ एक दी पहले हुई। रंजन पर हमला करने वाले 4 की संख्या में थे, जिसमें से पुलिस के मुताबिक 2 की पहचान कर ली गई है। राजदेव रंजन को 5 गोलियां लगी जिसमें 1 सिर में और दूसरी गर्दन और 3 पेट में गोली लगी है।
इस पूरे मामले में बीजेपी के नेता सुशील कुमार मोदी ने नीतीश सरकार पर हमला करते हुए कहा किसीवन शाहबुद्दीन के प्रभाव वाला क्षेत्र है। अभी तक कभी पत्रकारों पर हमला नहीं हुआ लेकिन अब हत्या हो रही है। मोदी ने कहा कि हम लोग बड़ी मेहनत से लालू जी के 15 साल के जंगलराज से बिहार को वापस लाए थे लेकिन अब लोगों में डर बैठा हुआ है कि फिर से जंगलराज वापस आ रहा है।
हत्या के बाद से ही लगभग सभी दलों ने बिहार सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। आलोचना सह रही सरकार के नेताओं ने ढाढस तो बंधाया है लेकिन विपक्ष का दबाव कम होता नहीं दिख रहा है। सत्ता पक्ष इस विषम परिस्थिति में भी विरोधियों पर आरोप लगा रहे हैं कि दूसरे दलों के लोग सरकार की छवि खराब कर रहे हैं।
धूप-छांह की आंख मिचौली में हमारी बस सरपट दौड़ रही थी। सड़क के दोनों ओर उगे नारियल के पेड़ तेज़ी से पीछे भाग रहे थे। सुदूर नज़र स्थिर करने पर धरती के वृत्ताकार में घूमने का भ्रम होने लगता था, जो सत्य भी है। तमाल वृक्षों की शोभा निहारते-निहारते आंख कब लगी, पता ही नहीं चला। सह यात्रियों की कुलबुलाहट और हवा के ठंडे झोंके से आंख खुली तो सामने अकल्पनीय दृश्य था। सड़क ब्रिज में बदल गई थी। दोनों ओर सागर का नीला जल हिलोरें ले रहा था।
दक्षिण से उत्तर की ओर बहता हिंद महासागर का पानी नदी की शक्ल अख़्तियार किए था। ऐसा लगता था, मानो आकाश की नीलिमा और नीले जल के बीच हम उड़ते जा रहे हों। यह वही ब्रिज है जो दसकों से प्रकृति की उग्रता पर अपनी धौंस जमा रहा है। इसने अनेकों बार समुद्री प्रकोप को झेला है। इस सेतु को अंतिम रूप काम के धुनी श्रीधरन ने दिया था। अनुमानित बजट और निर्धारित समय-सीमा के अंदर बना यह पुल मज़बूत और खूबसूरत है। श्रीधरन की कार्यशैली का बेजोड़ नमूना और दक्षिण भारत की शान। लगभग शाम हो चुकी थी। उस पार पहुंचकर ठहरने का प्रबंध स्वयं करना था।अतः उसे प्राथमिकता में शामिल करना पड़ा।
दूसरे दिन सुबह उठा तो स्वर्गीया माता जी रामेश्वरम-महात्म्य बताने लगीं -” रामेश्वरम द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। यहीं पर प्रभु राम की कल्पना ने साकार रूप लिया था- ‘करिहौं इहां सम्भु अस्थापना। मोरे हृदय परम कलपना।’ रामेश्वरम से जुड़े पौराणिक दृष्टान्तों का हवाला देते हुए माताजी उस पवित्र स्थान के विषय में मेरी समझ और ज्ञान को विस्तृत कर रही थीं। हाथ जोड़कर उन्होंने ऊंचे स्वर में प्रार्थना किया –
उनके स्वाध्याय और वाचिक परंपरा द्वारा संचित ज्ञान का पूरा लाभ मुझे मिल रहा था। देखते-देखते सूरज चढ़ने लगा।माताजी को बीच में रोककर उस दिन की योजना समझाते हुए मैंने कहा कि अब हमें दर्शनार्थ रामनाथ मंदिर की तरफ बढ़ना चाहिए। सीप, शंख और कौड़ियों के लुभावने बाज़ार से गुजरते हुए हम 6 हेक्टेयर में फैले रामनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार (गोपुरम) तक पहुंचे। 40 फीट ऊंचे गोपुरम की भव्यता देखते ही बनती थी। मंदिर के अंदर कई प्रकार के गलियारे अपनी लम्बाई के लिए जग-जाहिर हैं। इसके लिए तीसरे प्रकार का गलियारा विश्व का सबसे लम्बा गलियारा माना जाता है।इसकी लम्बाई उत्तर -दक्षिण में 197 मीटर एवं पूर्व-पश्चिम में 133 मीटर है। परकोटे की चौड़ाई 6 मीटर और ऊंचाई 9 मीटर है। मंदिर के अंदर एक पंक्ति में खड़े सैकड़ों विशाल खम्भे तोरण की तरह सुंदर दिखाई देते हैं। ये देखने में एक समान हैं किन्तु, नज़दीक जाने पर पता चलता है कि इन पर की गई पच्चीकारी अलग-अलग है। द्रविड़ वास्तु का अप्रतिम उदाहरण। भारतीय शिल्प के अध्येताओं को यहां अवश्य आना चाहिए। भीमकाय पाषाण को सलीके से तराशकर उन पर बनाई गई आकृतियां यहां सजीव हो उठी हैं। आश्चर्य तो तब होता है, जब हम रामेश्वरम की भौगोलिक स्थिति पर विचार करते हैं। कहां से इतने विशालकाय पत्थर मंदिर के लिए मंगाए गए होंगे ? पत्थर के स्रोत के रूप में यहां मात्र गंधमादन नाम की एक छोटी पहाड़ी है, जो मात्र एक टीला है।
रामनाथ मंदिर का भीतरी भाग काले पत्थर से बना है। सम्भवतः ये पत्थर समुद्री रास्ते से मंगाए गए होंगे। कई राजाओं के सामूहिक प्रयास का नतीज़ा है, आज का यह रामेश्वरम मंदिर।
मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित मुख्य शिवलिंग आकार में छोटा है। कहा जाता है कि रावण-वध के बाद राम पर ब्रह्म हत्या का पाप लगा था। ब्राह्मणों ने सुझाव दिया कि राम को काशी से शिवलिंग मंगवाकर रामेश्वरम में स्थापना करनी चाहिए।इसके लिए प्रभु राम ने हनुमान को नियुक्त किया। वायु के वेग से हनुमान काशी की तरफ उड़े। शिवलिंग की स्थापना के लिए ब्राह्मणों ने मुहूर्त सुनिश्चित किया था। हनुमान को आने में विलंब हो रहा था। अतः सीताजी ने समुद्र-तट से रेत लेकर शिवलिंग का निर्माण किया और उसी की स्थापना की गई। बाद में हनुमान भी काशी से शिवलिंग लेकर पहुंचे। विलंब होने की ग्लानि से वे भर गए। उनका और ब्राह्मणों का मन तथा मान रखने के लिए काशी से लाए गए शिवलिंग की भी स्थापना की गई।विशालाक्षी जी के गर्भगृह के निकट 9 ज्योतिर्लिंग विभीषण द्वारा स्थापित बताए जाते हैं। मंदिर की परिक्रमा करते समय चौबीस कुंडों के जल से स्नान करना पुण्य माना जाता है। कुछ कुंड सूख भी गए हैं। इनके जल औषधीय गुणों से युक्त हैं। इन कुंडों में स्नान करते हुए हम आगे बढ़ रहे थे, किंतु इनकी गंदगी आस्था पर भारी पड़ने लगी। हरी काई और फंगस के बीच तैरती छोटी-छोटी मछलियां मंदिर-प्रशासन की लापरवाही बयां कर रही थीं। बहरहाल, दर्शन की प्रक्रिया पूरी कर हम धनुष्कोटि पहुंचे। धनुष्कोटि का अर्थ है – ‘धनुष की नोंक।’ विभीषण ने लंका की सुरक्षा के लिए राम से प्रार्थना की थी कि सेतु को तोड़ दिया जाय, ताकि भारत के बलशाली राजा लंका पर आक्रमण न कर सकें। विभीषण के अनुरोध पर प्रभु राम ने अपनी धनुष की नोंक से रामसेतु के कुछ भाग को ध्वस्त कर दिया। अतः इस स्थान का नाम ‘धनुष्कोटि’ पड़ा। इसकी चर्चा स्कंदपुराण में भी की गई है- “दक्षिणाम्बुनिधौ पुण्ये रामसेतौ विमुक्ति दे। धनुष्कोटि: इतिख्यात तीर्थम् अस्ति विमुक्तिदम्।।
अर्थात् दक्षिण समुद्र के तट पर जहां परम पवित्र रामसेतु है , वहीं धनुष्कोटि नाम से विख्यात एक मुक्तिदायक तीर्थ है।
रामेश्वरम स्थित आदिसेतु से रामसेतु का प्रारंभ माना जाता है। रामसेतु का उल्लेख बाल्मीकि रामायण में मिलता है- “सनलेनकृतः सेतुः सागरे मकरालये। सुशुभेसुभगः श्रीमान स्वातीपथ इवाम्बरे।।”
अर्थात् मगरमच्छों से भरे समुद्र में नल के द्वारा निर्मित वह सुंदर सेतु आकाश में छायापथ के समान सुशोभित था।
गोस्वामी तुलसीदास ने राम के मुख से सेतु के महात्म्य पर प्रकाश डाला है- “मम कृत सेतु जो दरसन करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।।”
इसी तरह रामसेतु की चर्चा स्कंदपुराण, विष्णुपुराण, अग्निपुराण, ब्रम्हपुराण, कूर्मपुराण, रघुवंशम् आदि ग्रन्थों में भी सविस्तार की गई है।सेतु-निर्माण में रामायणकालीन उन्नत तकनीकी के कई दृष्टांत वाल्मीकि रामायण में मौजूद हैं- ‘पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्नैः परिवहन्ति च।’
अर्थात् कुछ वानर बड़े-बड़े पर्वतों को यंत्रों के द्वारा समुद्र-तट पर ले आए। इनके अलावा बलशाली वानर ताड़, नारियल, बकुल, आम, अशोक आदि के बड़े-बड़े पेड़ जड़ सहित उखाड़कर समुद्र में डालते रहे। उस समय के कुशल शिल्पी नल और नील की देख-रेख में कुछ वानर सौ योजन लम्बा सूत पकड़े थे –“सूत्राण्यन्ये प्रगृह्रन्ति हृयतं शतयोजनम्।” विश्वकर्मा के पुत्र नल-नील की शैल्पिक प्रवीणता का उल्लेख भी मिलता है। रामचरितमानस में लिखा गया है- “नाथ नील नल कपि द्वउ भाई। लरिकाई रिसि आसिष पाई।। तिन्ह के परस किए गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।”(सुंदरकांड)
कहा जाता है कि सेतु-निर्माण में जिन शिलाओं का प्रयोग हुआ , उन पर राम-नाम लिखा जाता था। फलस्वरूप शिला पानी पर तैरने लगती थी। आपस में न जुड़ पाने से निर्माण कार्य में कठिनाई आ रही थी। ऐसे में हनुमान जी ने ‘रा’ और ‘म’ को अलग-लिखने का निर्देश जारी किया।इससे शिलाएं आपस में जुड़ने लगीं।लगभग 5 दिनों में बन जाने वाले रामसेतु की लम्बाई और चौड़ाई के बारे में बाल्मीकि रामायण में लिखा गया है – “दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्।(6/22/76)
अर्थात् नलसेतु की चौड़ाई दस योजन और लम्बाई सौ योजन थी।
सेतु पर विभिन्न मतावलम्बियों ने अपना-अपना अधिकार जताया है। इसाई इसे ‘एडम्स व्रिज’ कहते हैं तो मुसलमान ‘आदम पुल’। इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में रामसेतु का नाम ‘एडम्स व्रिज’ भी बताया गया है। नासा ने इस पुल को ‘टोम्बोलो’ कहा है। कुछ वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक व्रिज के रूप में स्वीकार करते हैं तो कुछ मानवनिर्मित बताते हैं। सबके अपने-अपने तर्क और पुख़्ता प्रमाण हैं। आधुनिक जांच से सिद्ध हो चुका है कि सेतु की चट्टानें कोरल और रीफ से बनीं हैं। ये हल्की और कम घनत्व वाली होती हैं। इन सबमें मुझे जो अधिक प्रभावित कर रहा था, वह समुद्र का नीला और शांत जल था। ऐसा प्रतीत होता है, मानो राम के कराल बाण आज भी सागर को डरा रहे हैं या यूँ कहें कि समुद्र राम के पौरुष पर सम्मोहित हो अपनी प्रभुता भूल गया हो – ‘देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।’ चतुर्दिक राम के पुरुषार्थ को देखते-देखते जी नहीं भरा और दिन ढलने लगा।
थके-मांदे हम अपने कमरे पर आ गए। सुबह स्नान करके माताजी ने अपनी साड़ी कक्ष के बाहर रेलिंग पर सूखने के लिए फैला दी थी। वह नीचे गिर गई थी। वहीं एक स्थानीय बच्चा खेल रहा था। मदद के लिए मैंने उसे आवाज़ दी। वह मेरा आशय समझ गया। साड़ी के पास आकर उसने मुझे एक उंगली दिखाई। मैं चाहता था कि वह साड़ी उठाकर मेरे कमरे पर पहुंचा दे और एक रुपया ले जाए किंतु इसके लिए वह तैयार नहीं था। लगातार एक उंगली दिखाए जा रहा था। अंततः ऊपर से एक रुपया का सिक्का फेंकना पड़ा तब जाकर वह साड़ी लाया। सोचने लगा – तीर्थ और पर्यटन स्थलों की नैसर्गिक छटा आकर्षक तो होती है किंतु यहां का स्थानीय जीवन दुष्कर होता है। एक आठ वर्षीय बालक की आंखों में पैसे की चमक देखकर वहां के लोकजीवन का अंदाज़ा खुद-बखुद लग गया। कमरे पर तरोताज़ा होकर हम रात्रि भोजन के लिए बाहर निकले। चार दिन से सांबर खाते-खाते मन भर गया था। भोजन में शुद्ध अरहर के दाल की दरकार थी। एक उत्तर भारतीय होटल पर यह कमी आंशिक रूप से पूरी हुई।
सुबह रामेश्वरम के अन्य तीर्थ स्थलों के दर्शनार्थ निकले। इनमें गंधमादन, सीताकुंड, कोदंड स्वामि मंदिर, विल्लीरणि तीर्थ आदि प्रमुख थे। सबका अपना-अपना पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व था। तैरते हुए पत्थर हमने हनुमान कुंड में देखे जो सीताकुंड के बिलकुल पास था। एक हौज़ में रखे हुए 2-3 बड़े पत्थर लोहे की जाली से घेरे गए थे। इसके बावजूद भी लोग उंगलियों से धक्का देकर अपनी शंका का समाधान कर लेना चाहते थे। राम प्रताप कहें या प्रकृति का चमत्कार। कई स्थलों के दर्शन ने हमे हैरत में डाल दिया।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति और संत वैज्ञानिक स्व. एपीजे अब्दुल कलाम की जन्मस्थली भी यहीं है। समयाभाव के कारण इस आधुनिक ऋषि के पवित्र तीर्थ की रज को माथे पर मलने का मौका नहीं मिला। यात्रा के तीसरे दिन हम रामेश्वरम से विदा हो रहे थे। यह वही समय था, जब सरकार रामसेतु को “सेतु समुद्रम परियोजना” की आड़ में तोड़ना चाहती थी। तर्क था कि सेतु के टूटने से रामेश्वरम देश का सबसे बड़ा शिपिंग हार्बर बनेगा। 13 छोटे एयरपोर्ट बनेंगे। तूतिकोरम हार्बर नोडल पोर्ट में तब्दील हो जाएगा। लगभग 400 किलोमीटर का चक्कर लगाने से जलपोत बच जाएंगे। “सेतु समुद्रम परियोजना सफल होने से प्रतिवर्ष 22 हजार करोड़ का तेल बचेगा और 2000 जलपोत इस रास्ते से गुज़रेंगे। इससे भारत को अच्छा-खासा आर्थिक लाभ होगा। दूसरी तरफ वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् चिंतित थे। उनका तर्क था कि रामसेतु टूटने से केरल को सुनामी जैसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। इससे भयंकर तबाही मचेगी। जलीय जन्तुओं की कई दुर्लभ प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी। सेतु के टूटने से भारत को थोरियम के अमूल्य भण्डार से हाथ धोना पड़ेगा। सीप, शंख तथा अन्य समुद्री उत्पादों से मिलने वाली 150 करोड़ की सालाना आय रुक जाएगी। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व निदेशक के. गोपालकृष्णन का मानना है ‘यह महज बालू का टीला नहीं है, जो समय के साथ यहां-वहां हो सकता है। हकीक़त में ऐसा है नहीं। उन्होंने प्राप्त सबूतों पर बल देते हुए बताया कि रामसेतु भूगर्भीय, आंतरिक संरचना और सामुद्रिक विभाजक का काम करता है।
विभिन्न भूगर्भीय और सामुद्रिक हलचलों को नियंत्रित करता है। राम सेतु को तोड़े जाने से समुद्र के भीतर भूस्खलन और भूकम्प जैसी घटनाएं हो सकती हैं। दुर्लभ जीव-जन्तुओं के आवास नष्ट हो जाएंगे। इससे मानसून चक्र भी प्रभावित होगा। हर साल बंगाल की खाड़ी में आने वाले खतरनाक तूफानों से राम सेतु ही बचाता है, जिस कारण मन्नार की खाड़ी में असंतुलन की स्थिति नहीं आ पाती। इसलिए हम लोग भी वैज्ञानिकों के अनुसंधान से इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि रामसेतु के कारण सुनामी को भी कमजोर होना पड़ा है।’
मेरा मानना है कि लाभ-हानि के गणित से मुक्त होकर रामसेतु की रक्षा होनी चाहिए। यह करोड़ों भारतीयों की आस्था से जुड़ा है। भारतीयों की वैचारिक परिपक्वता और गुरुता की पहचान मात्र ग्रन्थों के आधार पर ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरों के रूप में भी होती है। ये वैश्विक महत्त्व के धरोहर आने वाली पीढ़ियों की वैचारिक ऊर्जा के अक्षय भंडार हैं।
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन के जीवन संघर्ष पर फ़िल्म बनाने की बात जब दुनिया के सामने आई, तभी से लोग ये कयास लगा रहे थे कि फ़िल्म में किन-किन पहलुओं को प्रमुखता से फ़िल्म में स्थान दिया जाएगा। यह तो तय ही था कि फ़िल्म में अज़हर की आप बीती दर्शाई जाएगी। हुआ भी वही, अज़हर के निजी जीवन और क्रिकेट करियर की कई चीज़ों को फिल्माया भी गया है। अज़हर में जो फिल्माया गया है, उसकी कहानी कुछ यूँ है-
कहानी-
अज़हर का जन्म होता है तो उनके नानू (नाना) उनका नामकरण करते हैं और कहते हैं कि ये हमारी क़ौम और मुल्क़ का नाम रोशन करेगा। अज़हर के नाना की तमन्ना थी कि उनका नाती 100 क्रिकेट टेस्ट मैच खेले। कुछ सीख और नसीहतें देते हैं अज़हर के नाना जो उन्हें जीवन संघर्ष में बड़ा काम आता है। नाना की वजह से अज़हर के मन में क्रिकेट को लेकर जूनून पैदा हुआ , क्रिकेट टीम में सेलेक्शन के साथ ही अज़हर की जिंदगी में पहली पत्नी नौरीन (प्राची देसाई) की भी एंट्री होती है और कुछ सालों के बाद एक्ट्रेस संगीता (नरगिस फाकरी) से भी अजहर दूसरा निकाह करता है।
अज़हर अपने करियर के पीक पर होते हैं, तभी मैच फिक्सिंग के एक आरोप ने सबकुछ ध्वस्त कर दिया। जितनी शोहरत थी, उतनी ही बदनामी भी हुई। तम्मम ज़िल्लतें सहने के बाद अज़हर ने निर्णय लिया कि एसोसिएशन के लाइफ टाइम बैन के खिलाफ वे कोर्ट में जाएंगे। अपने दोस्त रेड्डी से मुलाक़ात कर वे उन्हें केस लड़ने के लिए मना लेते हैं। और तकरीबन 8 साल के बाद अज़हर को न्याय मिलता है। अज़हर की आजतक की ज़िंदगी में घटित हुई इन तमाम ऊँच-नीच को दर्शाने की कोशिश की गई है फ़िल्म अज़हर के माध्यम से।
पटकथा-अभिनय-
निर्देशक टोनी डिसूज़ा ने फ़िल्म को पूरी तरह से सिनेमाई अंदाज़ में ढालने की कोशिश की है। लेकिन अज़हर की भावनाओं को दर्शकों से जोड़ नहीं पाए। कई दफा पटकथा कमज़ोर और उबाऊ लगने लगती है। तारतम्य बरकरार रख पाने में असफल नज़र आती है फ़िल्म की क्रिएटिव टीम। फ़िल्म के संवाद को लेकर भी कुछ ख़ास मेहनत नहीं की गई है। प्राची देसाई ने बेहतर काम किया है और काफी हद तक नरगिस फाकरी ने भी बढ़िया काम किया है।
वक़ील की भूमिका में कुणाल रॉय कपूर बेहद कमज़ोर और मज़ाकिया नज़र आए। हाँ, कुलभूषण खरबंदा ने कम समय में अपनी छाप छोड़ी है। लारा दत्ता ने अपनी अभिनय क्षमता को एक बार फिर साबित किया है।
निःसंदेह, फ़िल्म और भी बेहतर बनाई जा सकती थी। अज़हर की ज़िन्दगी के कई अहम पहलुओं पर भी निर्देशक ने गौर नहीं किया। ऐसा लगता है कि फ़िल्म अज़हर, अज़हरुद्दीन की बेगुनाही को सिद्ध करने के लिए ही बनाई गई है।
संगीत–
फ़िल्म का संगीत काफी सराहा गया है। इसके कर्णप्रिय गानों ने आम जनमानस को काफी प्रभावित किया है।
वैसे तो छात्र संघ और विवि प्रशासन के बीच आनलाइन के साथ आफलाइन की मांग संबंधी विवाद उसी दिन ख़त्म हो गया था, जिस दिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने दिल्ली से फैक्स भेज दिया था। पर कल बुधवार को विवि प्रवेश समिति की बैठक में पीजी लॉ, बीएड समेत सभी कोर्स में प्रवेश लेने के लिए आनलाइन के साथ आफलाइन परीक्षा को मंजूरी देने के साथ अब कैम्पस के माहौल में एक बार फिर शांति दिख रही है। पर अभी पूर्ण रूप से विवाद ख़त्म नहीं हुआ है। इसका कारण यह है कि बीते मंगलवार को पत्रकारों से वार्ता के दौरान कुलपति महोदय ने ऐसा बयान दे दिया जिससे तमाम छात्र संघ नेता सहित बीजेपी का आलाकमान भी प्रो. हांगलू से नाराज हो गया है।
असल में बीते मंगलवार मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से आफलाइन विकल्प संबंधी निर्देश मिलने के बाद कुलपति प्रो. हांगलू अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यह निर्णय आश्चर्यजनक है, इससे न छात्रों का भला होगा ,न ही विश्वविद्यालय का। यह फैसला विवि को और पीछे ले जायेगा। एमएचआरडी के निर्णय से आहत कुलपति यही नहीं रुके ,बोले अगर मंत्रालय को लगता है कि मैं अपना काम ठीक से नहीं कर रहा हूँ तो मुझे हटा दें। मैं बच्चों को पढ़ाकर अपना जीवन व्यतीत कर लूंगा। यहाँ किसी सांसद या दूसरे नेता का कुलपति बनाकर विश्वविद्यालय चलवा लिया जाये।
बताते चले कि पीजी एंट्रेस में आफलाइन की मांग को लेकर विवि में पिछले दिनों काफी कुछ उथल पुथल रही। छात्र संघ अध्यक्ष ऋचा सिंह सहित सभी पदाधिकारियों सहित कई छात्र नेता आमरण अनशन पर बैठ गए थे। कुलपति प्रो. हांगलू का कहना है कि जब कुलपति के पास कोई अधिकार ही नहीं है, हर निर्णय पर नेतागिरी कर उसे पलट ही देना है, यहां बैठने का क्या औचित्य ? वीसी का कहना है कि आनलाइन का निर्णय उनका अपना नहीं था ,यह यूजीसी का ही निर्देश था। उन्होंने कहा कि इविवि के कुछ शिक्षकों पर करोड़ों के गबन का आरोप है , मेरे आने के बाद वह असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मुझे परेशान करने के लिए वह छात्रों को उकसा रहे हैं। रतन लाल हंगलू ने स्मृति ईरानी पर काम में दखल देने का आरोप लगाते हुए कहा कि अगर इसी तरह काम में दखल देना है तो उन्हें हटाकर किसी सांसद या विधायक को वीसी बना देना चाहिए।
दरअसल, चार महीने पहले ही इलाहाबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के वीसी बने प्रोफेसर रतन लाल हंगलू ने कामकाज संभालते ही नये सेशन से सभी इंट्रेंस एग्जाम सिर्फ ऑनलाइन कराए जाने का ऐलान किया था। लेकिन छात्रों के विरोध के चलते वीसी ने ग्रेजुएशन क्लासेज में दाखिले के लिए इंट्रेंस एग्जाम ऑन लाइन के साथ ही ऑफलाइन कराए जाने का भी विकल्प दे दिया था।
यूनिवर्सिटी में दाखिले की प्रक्रिया शुरू होते ही छात्रों ने इस बार के सभी इंट्रेंस में ऑफलाइन का भी विकल्प दिए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया था। छात्रों के इस प्रदर्शन को नेताओं का भी साथ मिला और कौशाम्बी के बीजेपी सांसद विनोद सोनकर ने नौ मई को स्मृति ईरानी से मिलकर उनसे वीसी की शिकायत की थी। जिसके बाद स्मृति ईरानी ने मामले में दखल दिया और वीसी के फैसले को पलटते हुए सभी इंट्रेंस एग्जाम में ऑफलाइन का भी विकल्प दे दिया। मंत्री स्मृति ईरानी के दखल पर अपना फैसला पलटे जाने से वीसी रतन लाल हंगलू गुस्से में हैं और वह खुलकर मंत्री और बीजेपी सांसदों के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। इस बयान के बाद कैम्पस के साथ साथ कुछ खास राजनीतिक गलियारों जैसे बीजेपी में कुलपति के बयान को लेकर काफी गुस्सा है।
कैम्पस में बयान के विरोध में अ.भा.वि.प. के बैनर तले बुधवार को छात्र नेताओं ने कुलपति का पुतला फूंकने के बाद जमकर नारेबाजी की। छात्र संघ उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह ने कुलपति पर साजिश रचने का आरोप लगाया और कहा कि आदेश के बावजूद वह मुद्दे को उलझाने की कोशिश कर रहे हैं। उधर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या ने कुलपति के दिए गए बयान की निंदा की और कहा कि उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी। बीजेपी सांसद विनोद सोनकर ने भी कुलपति के बयान की निंदा करते हुए कहा कि छात्रहित में मंत्रालय का हस्तक्षेप अनुचित नहीं कहा जा सकता।
*आइये नजर डालें क्या कुछ हुआ था 6 दिन चले आमरण अनशन में –
महज कुछ महीनों की शांति के बाद पूरब का आक्सफोर्ड एक बार फिर हितों के टकराव को लेकर जल उठा है, पर इस बार आमने-सामने छात्र संघ के पदाधिकारी नही बल्कि विवि प्रशासन है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की सभी प्रवेश परीक्षा में ऑनलाइन के साथ ऑफ़लाइन का विकल्प देने की मांग को लेकर सोमवार को विवि कैम्पस में छात्र संघ के सभी पदाधिकारियों ने एकजुट होकर सर्वप्रथम सुबह कैम्पस में विवि प्रशासन के विरुद्ध जुलूस निकाला और दोपहर 12 बजे के आसपास विवि के सभी कार्यालयों को बन्द करवा दिया। इसके बाद छात्र संघ पदाधिकारी अध्यक्ष ऋचा सिंह ,उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह, महामन्त्री सिद्धार्थ सिंह गोलू के नेतृत्व में धरने पर बैठ गए। वही दूसरी ओर ऑनलाइन परीक्षा का समर्थन कर रहे सैकड़ों छात्रों ने कुलपति महोदय से मिलकर उन्हें ज्ञापन सौंपा और अनुरोध किया कि विवि प्रशासन अपने इस निर्णय से पीछे न हटें। छात्रों के इस गुट का नेतृत्व कर रहे रिसर्च स्कॉलर अतुल नारायण सिंह ने कहा यह विवि के आगामी सत्र को लेट करने की साजिश मात्र है और इनके पास इसके आलावा कोई मुद्दा नही है। हमने आज ज्ञापन में भी कुलपति महोदय से मांग की विवि अपने इस निर्णय को वापस न ले। सत्र नियमित हो और कैम्पस में पठन-पाठन का माहौल बन सके और विवि को अराजक तत्वों से सुरक्षित किया जाये।
छात्र संघ अध्यक्ष ऋचा सिंह का कहना था कि इस निर्णय से पूरी तरह ग्रामीण अंचल से आने वाले छात्र प्रभावित होंगे, जो गाँवों से बड़ी आशा के साथ इस विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए आते हैं। हम किसी भी छात्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ नही होने देंगे और विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिस प्रकार हमारे ऊपर लाठीचार्ज किया वो दुखद और शर्मनाक है। हम तब तक अपना विरोध जारी रखेंगे जब तक विवि प्रशासन हमारी मांगे मान नही लेगा।
इसी मुद्दे पर ऑनलाइन पद्धति का विरोध कर रहे एवीवीपी के छात्र संघ नेता सूरज दुबे ने कहा था, ऑनलाइन के साथ ऑफ़लाइन की व्यवस्था भी होनी चाहिए और कोई भी नई व्यवस्था जब लागू की जाती है उसके लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए, उसे छात्रों के ऊपर अचानक लादा नही जाना चाहिए। हमारे वि.वि. में ग्रामीण क्षेत्र लगभग 70% छात्र पढ़ने के लिए आते हैं और ऐसे में इस व्यवस्था से उन्ही का सबसे बड़ा घाटा होगा और हम किसी भी छात्र के साथ गलत नही होने देंगे।
*कुलपति के समर्थन में छात्रों ने प्रधानमंत्री और एमएचआरडी को भेजा पत्र –
क्लीन यूनिवर्सिटी कैम्पेन ग्रुप के सदस्य विवेक रंजन सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एमएचआरडी मिनिस्टर स्मृति ईरानी को पत्र भेजा है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि पिछले कई वर्षो से विवि की गरिमा में लगातार गिरावट आ रही है, जिसके पूरी तरह से नेता ही जिम्मेदार हैं। विवि एक स्वायत्य संस्था है और क्या हम छात्रों का भविष्य महज कुछ छात्र नेता या सांसद तय करेंगे ?
17 मई, 2008 को प्रातः आठ बजे मैं आज़मगढ़ डीपो से गोरखपुर के लिए रवाना हुआ। मुझे बताया गया था कि बस के शहर में प्रवेश करने से पहले पैडलेगंज उतर जाना होगा। वहीं पर गोरखपुर विश्वविद्यालय के दो छात्र मेरी प्रतीक्षा में होंगे। मैंने वैसा ही किया। मुकेश कुमार से औपचारिकता के बाद उनके छात्रावास पर दोपहर लगभग एक बजे पहुंचा, जबकि बारह बजे विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के आवास ‘दस्तावेज़’ पहुंचना था। विलम्ब हो रहा था। अतः तुरंत बेतियाहाता के लिए निकल पड़ा। फोन पर पता सुनिश्चित करने के बाद हम ठीक दो बजे दस्तावेज़ पहुंचे।
फोन पर पता सुनिश्चित करने व डॉ. तिवारी के आवास तक पहुंचने के बीच समयांतराल अधिक था। अतः हम लोगों को देखते ही उनके माथे की सलवटें समाप्त हो गईँ, क्योंकि हमारे पहुंचने से पहले तीन बार गलत नंबर पर मुझसे बातचीत करने की कोशिश कर चुके थे। हमें भी दोपहर की चिलचिलाती धूप में आश्रय पाकर सुकून मिला। मैं एकाएक उछल पड़ा।स्वप्न और यथार्थ के कवि मेरे सामने थे। पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों में छपे चित्रों को देखकर तथा डॉ. तिवारी की शिष्या एवं मेरी सहकर्मी सुमनजी द्वारा व्यक्तित्त्व विश्लेषण सुनकर जो कल्पना मेरे मन में उभरी थी, बिल्कुल वैसा ही व्यक्तित्व मेरी आगवानी में था।
मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा था, साथ ही श्रद्धेय डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय को धन्यवाद दे रहा था, क्योंकि वही इस मुलाकात के निमित्त थे। जलपान करने के बाद डॉ. तिवारी ने मेरे बारे में संक्षिप्त पूछताछ की। शोध-प्रगति पर चर्चा प्रारम्भ करने से पहले मैंने कहा कि आपके काव्य संकलनों, आलोचकीय ग्रन्थों तथा सम्पादित पुस्तकों की भूमिकाएं पढ़कर शोध कार्य गौड़ किन्तु महानुभाव का दर्शन प्रमुख हो गया, जो अभी-अभी पूरा हुआ।
मेरी प्रतीक्षा में दोपहर दो बजे तक तिवारी जी ने भोजन नहीं किया था। उन्हें मालूम था कि 190 किलोमीटर दूर से आए व्यक्ति को भोजन की पहली दरकार होती है। आग्रह करने पर साथ आए महाशय की तरफ इशारा करते हुए मैंने कहा, ” इनके यहां भोजन हो चुका है। आप आश्वस्त रहें। “ठीक है, आप लोग बैठिए। मैं भोजन करके आता हूँ।” कहते हुए डॉ. तिवारी अंदर चले गए। अब मेरी आँखें उस सर्जक के कक्ष का निरीक्षण करने लगीं, जो उनकी सर्जना की तपोभूमि थी। प्रवेश द्वार के पास ही दीवार से सटा एक बड़ा मेज़ था, जिसके तीनों तरफ कुर्सियां रखी थीं। कमरे के बीचों बीच दो सटे लकड़ी के तख्तों पर गद्दे बिछे थे। उन पर सलीके से सफेद चादरें बिछाई गई थीं।
कमरे की दूसरी दीवार के पास एक बड़ा मेज़ था। उस पर पुस्तकों का अम्बार लगा था। शायद उन पुस्तकों को अपने मालिक की लम्बी यात्रा के बाद थकान मिटाने का इंतज़ार था। दीवार पर किसी भी देवता का कोई चित्र या मूर्ति नहीं थी।तिवारी जी के लिए यह ईश्वर में अनास्था अथवा परमेश्वर की सर्वव्यापकता का अटल विश्वास ही होगा। हाँ, बौद्धकालीन मूर्तियों से दीवार की सजावट की गई थी, जो डॉ. तिवारी की प्राचीन स्थापत्य के प्रति रूचि को दर्शाती थी। किसी भी महान सर्जक के व्यक्तित्व का प्रभाव सिर्फ उसकी सर्जना पर ही नहीं, बल्कि सम्बंधित परिवेश पर भी होता है। साहित्यकार अपने परिवेश से आंदोलित होता है और उसे अपनी रचना से प्रभावित भी करता है। यही कारण है ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा भारत की समृद्ध नाट्य परम्परा की झलक निपुणिका जैसी कलाप्रेमी पात्र में दिखाई जाती है।सम्भवतः भारतीय नृत्य के प्रति द्विवेदी जी का भी रुझान रहा हो। डॉ. तिवारी की स्थापत्य के प्रति रूचि परम्परागत है अथवा स्वाभाविक ? यह साक्षात्कार अथवा शोध का विषय है किंतु इनकी कई रचनाओं में भारतीय स्थापत्य की व्याख्या गहराई से की गई है।
डॉ. तिवारी के व्यक्तित्व की सादगी का प्रभाव ‘दस्तावेज़’ के 101 अंक में इस प्रकार है – ‘ऐसे लोग ‘दस्तावेज़’ पर दूसरा आरोप यह लगाते हैं कि यह ठंडी और निरामिष पत्रिका है। गरम और आक्रामक होना तथा हिंसा और दूसरों का मांस भक्षण करना ऐसे लोगों की नज़र में सम्भवतः सद्गुण हो।’दस्तावेज़’ इन सबसे दूर चुपचाप अपना काम करती रही।वह भाषा की सृजनशीलता और नई रचनाशीलता को निरंतर रेखांकित करने के लिए प्रयत्नशील रही।’
बातचीत के दौरान विश्वनाथ जी के आवास के पास स्थित ‘आरा मशीन’ की आवाज़ लगातार खटक रही थी। यह मशीन दिन-रात लकड़ियों को लीलकर हमें भौतिक सुख-सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। लकड़ियों को चीरने की आवाज़ किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को चिंतित कर सकती है। मेरी वेदना डॉ. तिवारी को वर्षों पहले साल चुकी थी। उन्होंने अपने काव्य-संग्रह ‘बेहतर दुनिया के लिए’ में ‘आरा मशीन’ शीर्षक कविता को प्रथम कविता के रूप में रखा। बाद में यह काफी चर्चित हुई। तिवारी जी ने “आरा मशीन” की भयावहता के बारे में लिखा है- “चल रही है वह/इतने दर्प में/कि चिंगारियां छिटकतीं हैं उससे/दौड़े आ रहे हैं/अगल-बगल के यूकिलिप्टस/और हिमाचल के देवदारु/उसके आतंक में खिंचे हुए/
बातचीत का सिलसिला जारी था। मेरे साथ आए सज्जन कुर्सी पर ही गहरी नींद में सो गए। तिवारी जी के इशारा करने पर मैंने कहा ‘ सर, रात में आंधी, पानी और मच्छरों के आतंक ने इन्हें सोने नहीं दिया।’ काफी समय तक महानगरीय आपाधापी की चर्चा होती रही। प्रसंगवश मैंने कहा, ‘गुरूजी कभी मुम्बई पधारें। आपके साथ वहां के ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण रोमांचक और ज्ञानवर्धक होगा।’ उन्होंने बताया कि कई बार मुम्बई आने का निमन्त्रण मिला किन्तु एक घण्टे व्याख्यान के लिए इतनी लम्बी यात्रा कष्टप्रद होती है। हालांकि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बनने के बाद कई बार मेरी मुलाकात मुम्बई में हुई। नए रचनाकारों के लिए रिकार्डर पर ‘दो शब्द’ कहने का अनुरोध मैंने किया। बात को टालते हुए उन्होंने कहा ‘आप लोग इतनी दूर से आए हैं तो कुछ न कुछ ज़रूर करना पड़ेगा। ठहरिए, मैं आपको भेंटस्वरूप कुछ अपने काव्य संग्रह और दस्तावेज़ के पूर्व अंकों की प्रतियां देता हूँ।’ कहते हुए वे पहली मंजिल पर चले गए।कुछ ही समय में वे नीचे उतरे। उन्होंने कहा कि आप अपना रिकॉर्डर निकालकर मेरी दो कविताएं रिकॉर्ड कीजिए। रिकॉर्ड के लिए मेरा पूर्वाग्रह इस तरह फलित हुआ। ताज्जुब यह कि उन दो कविताओं में से एक कविता “आरामशीन” पर थी।
महानगर की आपाधापी पर चर्चा करते-करते बात आधुनिक प्रौद्योगिकी की तरफ मुड़ गई। समकालीन लेखन पर न के बराबर बात हुई। पुनः मिलने की बात कहकर मैंने तिवारी जी से विदा ली और मुकेश के साथ छात्रावास लौट आया। यात्रा सम्बन्धी कठिनाईयों के बावजूद डॉ. तिवारी के प्रखर व्यक्तित्त्व की धमक सदा सर्वदा के लिए मानस पटल पर अंकित हो गई।
शाम को मुकेश ने ही गोरखनाथ मंदिर देखने की योजना बनाई। इसे गोरक्षनाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र है। झिलमिलाती प्रकाश-बत्तियों में मन्दिर सजा-संवरा मालूम पड़ता था। सिक्योरिटी की सघन जांच यहां भी। निहायत स्वच्छ प्रांगण। चतुर्दिक सफेद संगमरमर का साम्राज्य। इसे इतना भव्य स्वरूप ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ के प्रयासों से प्राप्त हुआ। भीतरी कक्ष के मुख्य वेदी पर गोरखनाथ की दिव्य मूर्ति है। पास में ही इनकी चरणपादुका भी है। गोरखनाथ हठ योगी थे। माना जाता है त्रेतायुग से इस योगी ने यहां पर धूना रमाई थी, जिसकी अखंड ज्योति आज भी जल रही है। यह ज्योति ज्ञान, अखंडता और एकता की प्रतीक है। महाभारत काल में पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया था। पांडवों की तरफ से भीम गोरखनाथ के लिए निमन्त्रण पत्र लेकर आए थे। उस समय वह ध्यानस्थ थे।अतः भीम को महीनों मठ के बाहर इंतज़ार करना पड़ा। आज भी मंदिर के बाहर भीम की विशालकाय प्रतिमा विश्राम की मुद्रा में लेटी है। प्राचीन काल से यह यौगिक साधना का प्रसिद्ध केंद्र रहा है। इसी कारण मुग़ल सम्राटों ने इस मठ को मटियामेट करने की कई बार कोशिश की।
गोरखनाथ परम ज्ञानी थे। डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने इनकी रचित 40 पुस्तकों के नाम गिनाए हैं। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘गंगा पुरातत्त्वांक’ में वज्रयानियों के साथ-साथ गोरखनाथ पर व्यापक चर्चा की है। कहीं-कहीं कबीर-नानक आदि के साथ गोरखनाथ के संवाद का भी जिक्र मिलता है। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के बारे में अनेक अनुश्रुतियां व दंतकथाएं प्रचलित हैं। ‘तंत्रालोक’ में आचार्य अभिनव गुप्त ने इन्हें ‘मच्छंद विभु’ कहकर आदर व्यक्त किया है। कहा जाता है गोरखनाथ ने अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ को वामाचारी साधना से मुक्ति दिलाई थी। इस साधना में स्त्री गमन की स्वतंत्रता है।
भारत धर्म, अध्यात्म और दर्शन के लिए जाना जाता है। अनेक मत-मतांतर प्रचलित हैं किंतु सबका गंतव्य एक। सबके मूल में शांति और भाईचारा है। इन सबमें नाथ सम्प्रदाय का विशिष्ट स्थान है। इस सम्प्रदाय की मान्यता है – “सच्चिदानंद शिव के साक्षात् स्वरूप ‘श्री गोरखनाथजी ‘ सतयुग में पेशावर (पंजाब) में, त्रेतायुग में गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), द्वापर में हरभुज, द्वारिका के पास तथा कलियुग में गोरखमधी, सौराष्ट्र में आविर्भूत हुए थे।
चारों युगों में विद्यमान एक अयोनिज अमर महायोगी, सिद्ध महापुरुष के रूप में एशिया के विशाल भूखंड तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफगानिस्तान, नेपाल, सिंघल तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपने योग से कृतार्थ किया।” नाथ सम्प्रदाय के इस पावन मंदिर के परिक्रमा भाग में हमने प्रवेश किया। भगवान शिव, गणेश, पश्चिमोत्तर में काली, उत्तर में काल भैरव और इसी से सटा शिवलिंग है। उत्तरवर्ती भाग में राधा-कृष्ण मंदिर, हट्टीमाता मंदिर, संतोषी माता, राम दरबार, नवग्रह देवता, शनि, बालदेवी, भगवान विष्णु तथा अखंड धूना (ज्योति) भी है।
भीम सरोवर, जलयंत्र, कथा-मंडप यज्ञशाला, संत निवास, अतिथिशाला, गोशाला आदि यहीं स्थित हैं।संगमरमर की भित्तियों पर अर्थ सहित गोरखबानी की सबदियां लिखी गई हैं। मंदिर के ट्रस्ट की तरफ से संस्कृत विद्यापीठ, आयुर्वेद महाविद्यालय, चिकित्सालय सहित दर्ज़नों शैक्षिक संस्थाओं का संचालन किया जाता है। यहां हर साल वैसाख की पूर्णिमा को ‘रोट महोत्सव’ मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन बड़ा मेला यहां की रौनक में चार चांद लगा देता है। मंदिर के प्रांगण में फोटो लेना वर्जित है। इसलिए मंदिर से निकलकर बाहर से फोटो क्लिक किया गया।
दूसरे दिन तीन छात्रों के साथ सुबह में रामगढ़ ताल के सामने साइकिलिंग करते हुए गोरखपुर के विकास पर बात उठी।छात्रों ने बताया कि शहर की प्रगति के कई महत्त्वपूर्ण प्रकल्प यहां के सबल अवांछित तत्त्वों की भेंट चढ़ रहे हैं। शासन-प्रशासन लाचार। यह विडंबना ही है कि जो भूमि ऋषियों-मुनियों की तपस्थली, बुद्ध और महावीर की कर्मस्थली, कई चक्रवर्ती राजाओं की प्रियस्थली, 1857 की क्रांति के जिम्मेदार कई महत्त्वपूर्ण केंद्रों में से एक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की गढ़ तथा विद्यानिवास मिश्र, फिराक़ गोरखपुरी, परमानंद श्रीवास्तव, रामचंद्र तिवारी, राम दरश मिश्र तथा विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जैसे मनीषी चिंतकों एवं साहित्यकारों की जन्मस्थली हो वही बाहुबलियों के नाम से अपनी पहचान बना रही है।
कमोबेश यही हश्र मेरे गृह जनपद आज़मगढ़ का भी है। नकारात्मक शक्तियों का बोलबाला। योगियों और मनीषियों की तपश्चर्या का साक्षी रहा यह जनपद, आज “आतंक की नर्सरी’ के रूप में अपनी पहचान कायम कर रहा है। दुःख व्यक्त करते हुए एक छात्र ने कहा, “गोरखपुर का अतीत समृद्ध और स्वर्णिम रहा है। वर्तमान में भी विचारक, चिंतक और प्रतिभा संपन्न लोग मानव-सेवा में लगे हैं, किंतु उन्हें कोई नहीं जानता। कलुषित राजनीति ने पूरे गोरखपुर को गंदला दिया है।” हंसते हुए मैंने कहा, ” यार ! आप ही लोग कल के नेता हैं। राजनीति का परिष्कार कर साफ-सुथरा समाज बनाना। सब अच्छा होगा। निराश न हो।” सुझाव कहकहों में बदल गया। कुछ पल के लिए शून्यता, फिर छात्रावास की तरफ लौट पड़े। आज़मगढ़ के लिए बस जो पकड़नी थी।
उत्तराखंड में मंगलवार देर शाम बादल फटने से तबाही मच गई। बादल फटने और भारी ओलावृष्टि से तकरीबन 2 दर्जन गांवों में भारी तबाही हुई है। इससे इन इलाकों का बाकी इलाकों से सड़क संपर्क भी टूट गया है। प्रशासन ने इस इलाकों में राहत टीमें भेजी हैं। तकरीबन 200 मवेशियों की मौत की आशंका जताई जा रही है। एक बुजुर्ग के लापता होने की खबर भी मिली है।
उत्तराखंड के चकराता की त्यूणी तहसील में कुदरत के इस कहर से बड़े पैमाने पर फसलें भी प्रभावित हुई हैं। बताया जा रहा है कि दो किलोमीटर लंबी सड़क पूरी तरह धवस्त हो गई है। जिसके चलते रास्ता बंद हो गया है।
सड़कों के टूट जाने के कारण राज्य का प्रशासनिक अमला घटना स्थल पहुंच पाने में नाकाम रहा। हालांकि एसडीएम अपनी टीम के साथ घटना का जायजा लेने के लिए बुधवार को त्यूणी के प्रभावित गांवों का दौरा करेंगे।
जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने शुक्रवार को अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी। कन्हैया कुमार ने एम्स से छुट्टी मिलने के बाद चिकित्सकीय कारणों की वजह से अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी है लेकिन विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों की भूख हड़ताल आज 10 वें दिन जारी है।
गौरतलब है कि परिसर में नौ फरवरी को हुए विवादास्पद कार्यक्रम के मामले में विश्वविद्यालय की तरफ से सुनाए गए दंड के खिलाफ २० छात्र भूख हड़ताल पर बैठे थे। उन छात्रों में से छह ने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है जबकि १४ अन्य की भूख हड़ताल जारी है। इस कार्यक्रम में कथित रूप से भारत विरोधी नारेबाजी की गई थी।
देशद्रोह के मामले में गिरफ्तारी के बाद जमानत पर रिहा हुए कन्हैया को शरीर में पानी की कमी और कीटोसिस के उपचार के बाद अस्पताल से छुट्टी दी गई।
जेएनयू छात्र संघ के अनुसार कन्हैया कल रात ही परिसर में लौट आए पर उनके स्वास्थ्य को देखते हुए चिकित्सकों ने उन्हें भूख हड़ताल नहीं करने की सलाह दी है। उन्हें कुछ दिनों तक बिस्तर पर आराम करने की सलाह दी गई है। उन्होंने भूख हड़ताल वापस ले ली लेकिन वह आंदोलन जारी रखेंगे।’’
हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह कहते हुए छात्रों को बाहरी लोगों को आमंत्रित नहीं करने के लिए कहा है कि इससे परिसर में शैक्षणिक माहौल और शांति की स्थिति बिगड़ सकती है।
ऑगस्टा वेस्टलैंड डील को लेकर आम आदमी पार्टी ने आज कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ ऐलान ए जंग करते हुए जंतर मंतर पर धरना दिया है। खुद दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, मंत्री कपिल मिश्र तथा दिल्ली कैबिनेट के अन्य मंत्री भी इस धरने में शरीक हुए हैं। आप कार्यकर्ताओं ने अपने ऐलान के मुताबिक सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री मोदी के घर की ओर भी घेराव के उद्देश्य से जाने का प्रयास किया लेकिन बीच में ही उन्हें रोक दिया गया और कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया गया।
आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा, दोनों पार्टियों पर आरोप लगाया है कि इन दोनों पार्टियों की आपसी मिली भगत है। केजरीवाल ने कहा,” आज से 4 साल पहले 26 अगस्त 2012 को हम सब लोग यहां इकठ्ठे हुए थे। उस वक्त बीजेपी और कांग्रेस दोनों मिलकर जो भ्रष्टाचार कर रहे थे, जिसके खिलाफ आवाज उठाई गई। नितिन गडकरी और मनमोहन सिंह के आवास का घेराव किया गया था। उस समय जितने भी घोटाले हुए थे, वे सभी दोनों पार्टियों ने मिलकर किए थे। दरअसल दोनों पार्टियों के बीच भ्रष्टाचार का महागठबंधन है।“
केजरीवाल ने आरोप लगाया कि सोनिया जी और मोदी जी की आपसी साठ गाँठ के तहत तय हुआ है कि भाजपा ऑगस्टा डील पर कुछ नहीं बोलेगी और कांग्रेस मोदी जी की डिग्री पर। केजरीवाल ने कहा कि जब मोदी चुनाव प्रचार करने आए तब उन्होंने इतने शानदार भाषण दिए कि लोगों को उम्मीद बंधी कि मोदी जी आ गए तो सारे भ्रष्टाचारी जेल में जाएंगे। नरेंद्र मोदी जी ने कहा था मैं ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा। मैं सारे भ्रष्टाचारियों को जेल भेजूंगा। दो साल हो गए सत्ता में रहते लेकिन एक भी व्यक्ति को जेल में नहीं डाला गया।
केजरीवाल ने कहा, “ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीदने में भारी भ्रष्टाचार हुआ है, लेकिन दो साल में इसकी कोई जांच नहीं हुई। इटली ने इन दो सालों में जांच पूरी करके दोषियों को जेल भी भेज दिया, लेकिन मोदी जी ने इस पर कोई कर्रवाही नहीं की।
इटली कोर्ट के ऑर्डर में सोनिया, राहुल, अहमद पटेल का नाम है, लेकिन मोदीजी सोनिया से सवाल तक नहीं पूछ रहे हैं। मोदी जी कहते हैं कि मैं नहीं कह रहा हूं, इटली की अदालत कह रही है। मैं ये नहीं समझ पा रहा कि मोदी जी सोनिया से इतना डरते क्यों हैं। मोदी जी को एक्शन लेने के लिए पीएम बनाया है, बयान देने के लिए नहीं।“
केजरीवाल ने अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि शाह सोनिया से पूछ रहे हैं कि बताइए पैसे किस किस ने लिए। भाजपा के हाथ में सरकार है, भाजपा खुद जांच करे। केजरीवाल ने यहाँ तक कह दिया कि ऐसा लगता है नरेंद्र मोदी जी ने भी वाड्रा को गोद ले लिया है। मेरे ऊपर सीबीआई की रेड करायेंगे लेकिन वाड्रा पर सीबीआई की रेड नहीं कराएंगे। उससे पूछताछ नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि मोदी अपनी फर्जी डिग्री के लिए जनता से माफ़ी मांगें। जनता झूठ कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती। साथ ही केजरीवाल ने मोदी को चुनौती देकर कहा कि सोनिया गाँधी को गिरफ्तार किया जाए तो सच खुद बखुद सामने आ जाएगा।