उत्तर प्रदेश: केंद्र और प्रदेश की तनातनी में मर रहे किसान, ग्रामीण इलाकों से हो रहा पलायन

अनुज हनुमत
ये चित्र पाठा की बरदहा नदी का है जिसने कभी गाँव वालों का साथ नही छोड़ा पर इस विकराल और प्रचण्ड गर्मी ने इसको भी सुखा दिया। आस पास के गाँवो में इस मौसम की ही तरह घरों में भी सूखे ने पाँव पसारना शुरू कर दिया है। किसान पलायन करने पर मजबूर है, घरों में ताले लटकते मिलना अब आम बात हो गई है। तापमान 50° पहुँचने वाला है। धरती सूख चुकी है, आस पास के क्षेत्र को मिलाकर कुछेक नदियां हैं उनमें से ज्यादातर ने दम तोड़ दिया है।
गाँव में जो कुँए हैं, शायद ही इस महीने के अंत तक पानी दे पाये क्योंकि जल स्तर लगभग समाप्त हो गया है। ये पूरी स्थिति पाठा के एक गाँव की नही बल्कि सैकड़ो गाँवों की है, जहाँ सूखे ने किसानों की हालत बद से बदतर कर रखी है। आस पास के गाँव वालों का कहना है कि हमें अभी मीलों चलकर पानी लाना पड़ता है। पर इस महीने के अंत तक वो पानी भी नहीं
मिलेगा, तब हम क्या करेंगे!
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पाठा क्षेत्र में बमुश्किल कुछ ही तालाब हैं, जिनमें से इक्के दुक्के में ही कुछ पानी बचा होगा। अगर मौसम की हालत यही रही तो वो भी नही बचेंगे। इस विकराल सूखे से निपटने के लिए अभी तक सरकार की तरफ से भी कोई ठोस रणनीति नही बनाई गई है। अभी हाल ही में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चित्रकूट का दौरा किया था और इस सूखे से निपटने के लिए हर मुमकिन मदद करने का आश्वासन भी दिया था। पर अभी तक वो आश्वासन महज एक राजनीतिक मरहम ही नजर आ रहा है।
इसके इतर प्रदेश सरकार का एक दूसरा चेहरा भी सामने आ रहा है, जिसमें प्रदेश की अखिलेश सरकार इस सूखे का ठीकरा केंद्र पर फोड़ रही है। प्रदेश सरकार आरोप लगा रही है कि केंद्र सूखे से निपटने के लिए कुछ नहीं कर रहा। अभी केंद्र की भाजपा सरकार ने करोड़ों का बजट बुन्देलखण्ड को दिया है पर अभी सबसे बड़ी समस्या पानी की है, जिससे जिंदगी का अस्तित्व जुड़ा है।
कुछ भी हो पर केंद्र और प्रदेश की राजनीतिक छींटाकशी के बीच वास्तव में उन किसानों का क्या होगा जो इस कठिन परिस्थिति में भी सरकार की मदद का इन्तजार कर रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अभी तो इस मौसम की शुरुआत है, क्या होगा आने वाले दो महीनों में ?

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