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Wednesday, September 9, 2026
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एक गुलशन था जलवानुमां इस जगह- यात्रा संस्मरण

JitendraPandey@Navpravah.com

उस ऐतिहासिक खंडहर का परिसर पर्यटकों की सरगर्मी से पुनः जीवंत होने लगा।शांति बनाए रखने और मोबाइल बंद रखने के निर्देश जारी हो गए।इसी गहमा-गहमी  में जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ उभरने लगी -” एक गुलशन था जलवानुमां इस जगह , रंग-ओ-बू जिसकी दुनिया में मशहूर थी।बेगमों की हंसी गूंजती थी यही , शाह की शानोशौकत में भरपूर थी।”साथ ही रंगीन प्रकाश-पुंज के साथ-साथ महानायक अमिताभ बच्चन का गम्भीर घोष उभरने लगा। अद्भुत कमेंट्री , संगीत , संवाद और प्रकाश के समवेत मिश्रण में गोलकुण्डा का इतिहास उतरने लगा।सोते हुए इतिहास का स्रोत रिस-रिस कर टलमल कर रहा था।तारों से भरे आकाश के नीचे सदियां बोल रही थीं।ध्वनि और प्रकाश के सम्मिलित प्रभाव से हम जान पाए कि चार मील के दायरे में फैले गोलकुण्डा फोर्ट की गाथा सन् 1364 से शुरू होती है।आठ द्वारों और 87 बुर्जों से सुसज्जित यह किला ऊँची-ऊँची चारदीवारियों  से घिरा है।मूसी नदी के किनारे बसा यह दुर्ग ग्रेनाइट पहाड़ी के तीन परकोटों पर बना है। शुरूआती दौर में यह वारंगल के काकतिया और देवगिरि के यादव वंश के अधीन रहा ।इस काल में भारतीय शिल्पकारी अपने वैभव पर थी।किले के भित्तियों पर कमल, पुष्प , पत्र , कलियां स्वस्तिकार स्तम्भ शीर्ष आदि विशिष्ट चिह्न बने हैं। ध्वनि-प्रसारक तकनीकी का बेजोड़ उदाहरण यहां देखने को मिलता है।मुख्य द्वार के निकट बने एक गुम्बद के नीचे से  जब ताली बजाई जाती है तो यह 400 मीटर ऊपर बने दरबार तक सुनाई देती है।सम्भवतः यह तकनीकी सुरक्षा की दृष्टि से विकसित की गई होगी।

1518 के आसपास कुतुबशाही शासक अस्तित्त्व में आए।सुलतान कुतुबशाह ने किले का विस्तार करना शुरू किया।कुतुबशाही वास्तु शैली में अनेकों निर्माण कराए गए।तारामती , प्रेमामती , हयात बख्शी बेग़म और भागमती के महल भी यहीं हैं।अनेक मधुर और रोमांटिक प्रेम कथाओं का सम्बन्ध इन्हीं महलों से था।इनके अलावा शाही महल ,सभागार , बारूदखाना , शाहीहरम के खंडहर तथा बाटिकाओं , बीथियों और जलाशयों का वैभवशाली रूप चारों ओर बिखरा है। क़ुतुबशाही की प्रारम्भिक राजधानी गोलकुण्डा हीरों का विश्व बाज़ार- थी।मुसलीपट्टम यहां का विश्व प्रसिद्ध बन्दरगाह है।नृत्य , संगीत , कला और साहित्य का यह स्वर्णिम काल था।हैदराबाद का संस्थापक मुहम्मद कुली उर्दू कविता का आदि कवि था।उसे उर्दू कविता के जन्मदाता के रूप में जाना जाता है।राजदरबार में उर्दू साहित्य के पनपने और विकसित होने की उर्वर जमीन भी उसी ने  मुहैया कराई थी।28 जनवरी 1627 ई. के एक छद्म युद्ध में औरंगज़ेब ने इस किले को जीत लिया।एक बार फिर एक भरी-पूरी संस्कृति को  मटियामेट करने की क्रूर कोशिशे हुईं। गोलकुण्डा फोर्ट मुगलों के अधीन आ गया।लगभग एक शताब्दी बाद हिन्दू राजा शिवाजी ने बीजापुर और गोलकुण्डा की सल्तनत में अपना हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।महाकवि भूषण ने शिवाजी की ऐसी कोशिशों के बारे में लिखा है – ” बीजापुर, गोलकुण्डा आगरा दिल्ली कोट । बाजे-बाजे रोज़ दरवाजे उधरत है।”टूरिस्ट गाइड ने हमे बताया कि गोलकुण्डा का कोहिनूर हीरा ब्रिटेन की राजशाही मुकुट का शान था ।

इसी तरह लगभग डेढ़ घण्टे तक हम गोलकुण्डा के प्रांगण में बैठे इतिहास के वैभव और पतन के महानद में डूबते- उतराते रहे।हम अपनी – अपनी थकान भूल तरोताज़ा महसूस कर रहे थे। हमारी सहयात्री श्रीमती संध्या पिसाल ने कहा ” इतनी लम्बी यात्रा तय करने के बाद मैं तो भूल ही गई कि हम थके भी हैं।गोलकुण्डा के इतिहास की इतनी खूबसूरत प्रस्तुति नायाब थी।” आज ही हम दोपहर एक बजे  शताब्दी एक्सप्रेस से सिकन्दराबाद उतरे थे।हमारी इस यात्रा का जिम्मा “ऐडवेंचर ग्रुप” को सौंपा गया था।लगभग तीन बजे हम मानसरोवर चार सितारा होटल में पहुंचे।जल्दी-जल्दी तैयार होकर हम गोलकुण्डा फोर्ट की तरफ बढ़ चले।यहां आकर हम तृप्त थे क्योंकि भारतीय इतिहास के एक वृहद कालखण्ड को नज़दीक से देख पाए थे।

दूसरे दिन सुबह तकरीबन दस बजे हम रामोजी फिल्म सिटी पहुंचे।टिकट आदि औपचारिकता के बाद 2000 एकड़ में फैले इस विस्तृत भूखण्ड में हमने विधिवत प्रवेश किया।अंदर, बस से उतरने के  बाद पता चला कि शोज़ शुरू होने वाले हैं।झटपट  थिएटर में आ विराजे । ‘रामोजी फ़िल्म सिटी’ के मालिक रामोजी राव के परिचय से शो शुरू हुआ ।इसमें फ़िल्म-निर्माण से सम्बंधित उन सभी चीजों पर प्रकाश डाला गया जिसके विषय में आमतौर पर लोगों में कौतूहल बना रहता है।बतौर डेमो हमारी एक साथी  श्रीमती शमशाद पठान को बसंती के रोल में प्रस्तुत किया गया।इन्हें एक बग्घी में बिठाकर नेपथ्य में एक आदमी से बग्घी को हिलाने के लिए कहा गया।बाद में विकसित तकनीकी की सहायता से डाकुओं के डर से बग्घी पर सवार बसंती (जो कि श्रीमती शमशाद स्वयं थीं) को भागते हुए दिखाया गया जो दर्शकों को बिल्कुल वास्तविक लगा।इसी तरह फ़िल्म- निर्माण से सम्बंधित कई बारीकियों को अलग-अलग सभागृहों में बिठाकर समझाया गया।

भरपूर मनोरंजन से सुसज्जित रामोजी फ़िल्म सिटी की हैसियत विश्व-स्तर की है।यहां 20 विदेशी और 40 देशी फिल्मों का निर्माण एक साथ हो सकता है।मशहूर फिल्म निर्माता और मीडिया बैरॉन रामोजी राव ने 1996 में इसकी नींव रखी थी।हिंदी , मलयालम , तेलुगु , तमिल , कन्नड़ , मराठी , बांग्ला आदि भाषाओँ में सौ से अधिक फिल्मों का निर्माण यहां हो चुका है।फिल्म निर्माण उपकरण , ऑडियो प्रोडक्शन , फिल्म प्रोसेसिंग , कॉस्ट्यूम डिज़ाइन लोकेशन जैसे कई प्रभागों  में बंटी यह फिल्म सिटी अपनी खूबसूरती में बेजोड़ है।हैदराबाद आने वाले पर्यटकों के लिए रामोजी फिल्म सिटी आकर्षण का एक कारण भी है।खुले- लाल रथनुमा कोच में गाइड उसी स्टूडियो में  दुनिया की सैर कराते हैं। जापानी गार्डेन , ईटीवी प्लेनेट , ताल , कृत्रिम जलप्रपात , हवाई अड्डा , अस्पताल , रेलवे स्टेशन , चर्च , मंदिर . शॉपिंग काम्प्लेक्स आदि से रू-बरू कराता  हुआ हमारा गाइड चुटीली भाषा में मनोरंजन भी कर रहा था। हैदराबादी तहज़ीब समेटे स्टूडियो का एक-एक लोकेशन दिखाता हुआ उसे किसी न किसी फिल्म से लिंक कर देता।फिल्मी- ज्ञान से लवरेज़ हम “हुसैन सागर लेक” की तरफ बढ़े।

हुसैन सागर झील हैदराबाद और सिकन्दराबाद के मध्य स्थित है।छोटी-छोटी जल-तरंगों पर पड़ते हज़ारों प्रकाश-वृत्त गोधूलि की बेला से भोर होने तक झिलमिल-झिलमिल करते रहते हैं।शाम होते ही सैलानी क्रूज़ पर सवार हो इस विहंगम दृश्य को सहेज लेना चाहते हैं।हम भी एक क्रूज़ पर सवार हुए।मनोरंजन के सभी साधनों से यह सुसज्जित था।धीरे-धीरे डीजे का कानफोड़ू संगीत शुरू हुआ।साथ ही छह नवयुवक और नवयुवतियों का एक समूह क्रूज़ के एक छोटे से स्टेज पर प्रकट हुआ।वे पूरी स्टैमिना से फिल्मों के अद्यतन गीतों पर नाचने लगे।न मेकअप न ही कोई विशेष कॉस्ट्यूम।पसीने से  तर-बतर।अपने कर्म को तरज़ीह देते ये कलाकर अति साधारण कपड़ों में कुछ थके से नज़र आए।सम्भवतः उस दिन की अपनी ड्यूटी के अंतिम दौर में हों।जल्दी ही उस नृत्य और संगीत से अपने को अलग कर मैं क्रूज़ के पिछले हिस्से में आ गया।नज़रें झील पर तैरते दर्ज़नों क्रूजों पर पड़ीं।कमोबेश सभी  पर डीजे की संगीत बज रहा था और सैलानी अविराम थिरक रहे थे।हम झील के बीचों बीच स्थापित महात्मा बुद्ध की प्रतिमा से गुज़र रहे थे।प्रतिमा पर तीन रंगों में गिरता प्रकाश बुद्ध की शांति को मुखर कर रहा था।कोई खलल नहीं। 18 मीटर ऊँची यह प्रतिमा रॉक ऑफ गिब्राल्टर पर स्थापित है।कहा जाता है कि 350 टन की इस मूर्ति को यहां तक लाते समय नाव पलट गई ।बाद में तकनीकी सहयोग से इसे सन् 1992 में स्थापित किया जा सका।धीरे-धीरे क्रूज़ किनारे लगी।लुम्बिनी पार्क में संगीतमय फव्वारों को देखते हुए हम अपनी बस की तरफ बढ़े।

रास्ते में रात्रि -भोजन के मेनू की चर्चा करते हुए मांड्रे जी ने बताया कि हैदराबादी बिरयानी और पुलाव यहां का शाही व्यंजन है।लज़ीज़ इतना कि बस उंगलियां चाटते रहें।मांसाहारी लोग शाही कबाब , दम का मुर्ग , मुर्ग , मेथी और शाही कोरमा सर्वाधिक पसंद करते हैं जबकि शाकाहारी पर्यटक मिर्ची का सालन , बघारे बैगन और शाही दही बड़े चाव से खाते हैं।भोजन के बाद मीठे में शाही कोरमा , खीर , फिरनी या कबाबी  मीठा परोसा जाता है।यहां आने वाले सैलानी बेकरी के उत्पाद जरूर अपने साथ ले जाते हैं।मांड्रे साहब की आंखों की चमक साफ-साफ बता रही थी कि आज के डिनर में ये सभी व्यंजन अवश्य होंगे।

अगले दिन सुबह हम सालारजंग म्यूज़ियम देखने गए।इस म्यूज़ियम में स्त्री की वह मूर्ति सबके आकर्षण का केंद्र बनी । चेहरे पर पड़ा झीना घूंघट वास्तविक लगता था।प्रतिमा को बड़ी बारीकी से तराशा गया था।बताया गया इसे रोम से मंगाया गया है।दो मंजिला इस इमारत में देश-विदेश से एकत्रित 30 हज़ार से अधिक कलाकृतियां संग्रहीत हैं।निज़ाम के प्रधानमंत्री सालारजंग के शौक को जानकर आश्चर्य होता है कि एक अकेला व्यक्ति मूर्तियों , चित्रों , परिधानों , पांडुलिपियों , हथियारों आदि का इतनी प्रचुर मात्रा में कैसे संग्रह कर सकता है ? हमारे पहुंचने के तुरन्त बाद “क्लॉक शो” शुरू हुआ किन्तु समयाभाव के कारण हम खरीददारी की तरफ बढ़ गए।शॉपिंग के शौकीनों के लिए पर्ल सिटी (हैदराबाद) बिलकुल माकूल जगह है।वस्त्र , आभूषण तथा हस्तशिल्प (बीदर आर्ट , निर्मल आर्ट इत्यादि) की विविधता लोगों को आकर्षित करती है।हैदराबादी ढंग से बनी माला , नथ , टीका , लाचा , कर्णफूल , बाजूबन्द स्त्रियों की पसन्द हैं।इनके अलावा वेंकटगिरि , पोचम्पल्लि , धर्मावरम सिल्क और जामदानी साड़ियों की अनेक किस्में यहां के बाज़ार में भरी पड़ी हैं।

हमने अपनी शॉपिंग सालारजंग म्यूज़ियम के पास ही की।बाद में पता चला कि लाड बाज़ार , सुल्तान बाज़ार , नामपल्ली, बशीर बाग और आबिद एरिया ऐसे व्यावसायिक हब हैं जहां हर वस्तुओं के अनेकों विकल्प आसानी से मिलते हैं।

उसी दिन हम देश का सबसे बड़ा चिड़ियाघर ” नेहरू प्राणी उद्यान” पहुंचे।मुख्य द्वार पर ही हमें वहां के एक ऑफिसर से उलझना पड़ा ।वह सभी पर्यटकों और ट्वायकार्ट चालकों से बदसलूकी कर रहा था।किसी प्रकार हमें एक ट्वायकार्ट मिली।चालक ने उस ऑफिसर की ज़्यादती पर रोष व्यक्त करते हुए बताया-“इसने सबके नाक में दम कर रखा है।अगर आप लोग इसकी शिकायत बड़े अधिकारी से करें तो शायद सुना जाय।” लगे हाथ हम इस पुण्य काम को अंजाम देते हुए आगे बढ़ गए।इस चिड़ियाघर में दुर्लभ प्रजाति के जानवर और पक्षी मौजूद हैं।ऐडवेंचर ग्रुप के टीम लीडर और हमारी यात्रा के प्रबन्धक यूसुफ़ भाई बड़े चाव से एक-एक जानवर का परिचय करवा रहे थे।उनका जैवकीय ज्ञान क़ाबिले तारीफ था।इन्हीं की अनुकम्पा से हमारी यात्रा आरामदेह व सुरक्षित थी।नाना प्रकार के देशी-विदेशी जानवरों को देखते हुए हम आगे बढ़ रहे थे।मन में ख्याल आया – “मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है।मनोरंजन के नाम पर जीवों को कैद करना कितना उचित है ? काश ! इन बेजुबानों के दर्द की  एक लिपि होती। ये भी न्याय की फ़रियाद कर पाते । मनुष्य ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए  कचहरियां तो बना ली किन्तु इनका क्या ? कुछ सौभाग्यशाली पशु-पक्षियों के अलावा बाकी न्याय की अनंत प्रतीक्षा में रत।” दूसरी तरफ  विलुप्तप्राय प्राणियों का संरक्षण करता मानव देवतुल्य लगा। इन्हीं विचारों में डूबता-उतराता मैं चिड़ियाघर से बाहर निकल आया।

यात्रा के अंतिम दिन हैदराबाद के सेंट्रल मॉल में मामूली शॉपिंग की गई।बड़े-बड़े सुडौल पत्थरों से अभी-अभी दिल्लगी शुरू ही हुई थी कि अलविदा कहने का वक़्त आ गया।विजयवाड़ा सहित अनेक दर्शनीय स्थलों को न देख पाने का मलाल किन्तु भरपूर ताज़गी और स्फूर्ति के साथ उस नवाबी शहर से हम विदा हुए।

पठानकोट हमले पर पीएम की उच्च स्तरीय बैठक

ShikhaPandey@Navpravah.com

पठानकोट आतंकी हमले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीती रात प्रधानमंत्री निवास पर उच्च स्तर की बैठक बुलाई. बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश सचिव एस. जयशंकर समेत कई अहम अधिकारी व खुफिया एजेंसियों के बड़े अधिकारी भी उपस्थित थे.

सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में हुई बात चीत के अनुसार सरकार, पठानकोट ऑपरेशन खत्म होने के बाद ही पाकिस्तान के साथ होने वाली बातचीत की रणनीति बनाएगी.
दो दिनों के कर्नाटक दौरे से लौटने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये हाईलेवल बैठक बुलाई. इस बैठक में आतंकी हमले को लेकर लंबी चर्चा हुई.

यह बैठक करीब दो घंटे तक चली. बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पठानकोट में आतंकी हमले को लेकर हालात की समीक्षा की. अजीत डोभाल ने पीएम को ताजा हालात की जानकारी दी. सूत्रों के मुताबिक अजीत डोभाल ने पीएम के सामने वो सारे सबूत पेश किए जिनसे साबित होता है कि पठानकोट आतंकी हमले की साजिश पाकिस्तान में रची गई.

इस हमले के बाद पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर भी इस बैठक में चर्चा हुई क्योंकि इसी महीने की 15 तारीख को भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की बातचीत दिल्ली में होनी है लेकिन जिस तरह पाकिस्तान से आए आतंकियों ने पठानकोट एयरबेस पर हमला बोला है, उसके बाद इस बातचीत पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं.

अपने रवैये पर अड़ा पाकिस्तान

AmitDwivedi@Navpravah.com
पाकिस्तान ने भारत द्वारा प्रदान किए गए ८ सबूतों को अपर्याप्त करार दिया और यह कहा कि ये सबूत नाकाफी हैं और पाकिस्तान को कार्रवाई करने में समय लगेगा. आज ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पठानकोट में एयरफोर्स स्टेशन का मुआयना किया. पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन के दौरे के बाद पीएम ने पूरे ऑपरेशन पर मुहर लगाई.

पठानकोट हमले पर कार्रवाई को लेकर एनएसए अजीत डोभाल पाकिस्तान पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं लेकिन पाकिस्तान अपने रवैये पर अड़ा हुआ है. पठानकोट हमले के बाद केंद्र सरकार पर विपक्ष लगातार निशाना बनाए हुए है. साथ ही अब भाजपा के समर्थक बाबा रामदेव ने भी सरकार से मांग कर डाला कि देश के एक शहीद के बदले में उन्हें दुश्मनों के दस सिर चाहिए.

पाकिस्तान के रुख को लेकर सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज़ी के साथ हो रही है कि क्या केंद्र सरकार ने पाकिस्तान पर भरोसा कर गलती कर दी?

भारत ने पाकिस्तान को 8 सबूत दिए थे, जिनमे ये चीज़ें शामिल हैं-

 

 

15 कॉल डिटेल्स.
एक आतंकी की मां का वॉयस सैंपल.
चीन में बने आतंकियों के हथियार, यही कंपनी पाकिस्तानी सेना को भी हथियार सप्लाई करती है.
आतंकियों के कपड़े और जूते जो पाकिस्तान के बने हुए हैं.
पाकिस्तान से इनोवा कार के लिए हुई बुकिंग की जानकारी.
आतंकियों के हाथों अगवा हुए एसपी सलविंदर सिंह का बयान.
और एसपी के दोस्त राजेश वर्मा का बयान.

 

आगामी 15 जनवरी को भारत और पाकिस्तान के बीच में सचिव स्तर की वार्ता होनी है, जिसपर भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि पाकिस्तान ने आतंकी हमलों की जांच में सहयोग नहीं किया तो सचिव स्तर की वार्ता रद्द कर दी जाएगी.

शहीदों की चिताओं पर सियासत!

AnandDwivedi@Navpravah.com

 

पठानकोट हमले में शहीदों की चिताएं सर्द भी न पडीं कि सियासती लोगों ने दांव पेंच खेलने शुरू कर दिए। कोई इसे प्रधानमंत्री मोदी को नवाज़ शरीफ़ की तरफ़ से मिला पठानकोट रिटर्न गिफ्ट मानता है, तो कोई अजीत डोवाल की नाकामी। विपक्ष तो पुरवाई भांपते ही शुरू हो जाता है। इस सबके बावजूद देश की अखंडता के प्रति कुछ उद्विग्न मन हैं, जिन्हें आतंकी हमले का जवाब पाकिस्तान पर सैन्य हमला बिलकुल नहीं दिखता। पाकिस्तान पूरी तरह से सैन्य नियंत्रण में है, लोकशाही के वहां कोई मायने नहीं। पीएम नवाज़ सेना के हिसाब से ही काम कर सकते हैं, भारत से उनकी कोई तुलना नहीं क्योंकि, भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसा दूसरा लोकतंत्र इस विश्व में कहीं नहीं है।

देखा जाए तो ये भी सही है कि पठानकोट की घटना ने मोदी सरकार और उसकी नीतियों पर भी सवालिया निशाँ खड़े कर दिए हैं। सवाल बड़े वाज़िब जान पड़ते हैं, क्योंकि मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भाजपा नेता उन्हें नाकारा कहते थे। पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने का वादा करने वाले नरेंद्र मोदी आज तक देशवासियों को यह नहीं बता पाए हैं कि उनकी पकिस्तान नीति क्या है जबकि वह रेडियो पर नियमित रूप से ‘मन की बात’ कार्यक्रम के अंतर्गत देश की जनता को संबोधित करते हैं। हुर्रियत नेताओं से भेंट के पीछे क्या सोच है? सत्तारूढ़ होने पर परिस्थितियों में परिवर्तन हो जाता है, मंच और कुर्सी में ये बारीक फर्क है।

खबर आ रही है कि भारत दोनों देशों के विदेश सचिवों की इस माह होने वाली बातचीत को टाल सकता है। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार, नवाज़ शरीफ सरकार को कुछ समय देना चाहती है ताकि बातचीत होने से पहले वह जैश-ए-मुहम्मद के खिलाफ कार्रवाई कर सके। संदेह इस बात का भी है कि क्या नवाज़ शरीफ सरकार, इस संगठन के खिलाफ कोई कदम उठा पाएगी क्योंकि पाकिस्तानी फौज उन्ही आतंकी संगठनों के खिलाफ़ कार्रवाई के पक्ष में है जो पाकिस्तानी हितों के खिलाफ़ काम करते हैं। जिन संगठनों के निशाने में भारत रहता हैं, उन्हें पाकिस्तानी सेना का हमेशा से समर्थन मिलता रहा है। कई सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी सरकार से हुई किसी भी बातचीत और समझौते का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक उसे वहां की सेना की मंजूरी ना मिले। वैसे तो जब पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ़ वहां के राष्ट्रपति भी थे, तब 6 जनवरी, 2004 को उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई जी को लिखित आश्वासन दिया था कि पाकिस्तान के नियंत्रण वाली ज़मीन को भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन इस आश्वासन का कितना ध्यान रखा गया ये 26 /11 के मुंबई हमलों और पठानकोट हमलों से साफ़ हो जाता है।

जिस एयरबेस पर आतंकवादियों ने तड़के हमला बोला, पठानकोट का वह एयरफ़ोर्स स्टेशन हमेशा से पाकिस्तान को खटकता रहा है। इसका एक कारण 1971 की जंग की वो यादें भी हैं, जिनमें इसी एयरबेस से भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान को छठी का दूध  याद  दिला दिया था। और तो और पठानकोट के इस स्टेशन के बारे में जानकर आपको गर्व  महसूस होगा। 5 दिसंबर 1971 को भारतीय वायुसेना ने सुबह 4 बजे इसी एयरफोर्स  स्टेशन से उड़ान भरी थी। उस वक्त सीमा पर जंग छिड़ी हुई थी और पाकिस्तानी फ़ौज तेजी से आगे बढ रही थीं। सुबह तड़के जंग पर निकले चार विमानों  ने पाकिस्तानी फ़ौज पर बम गिराए और साथ ही साथ वाल्टन एयरफील्ड पर एक पाकिस्तानी रडार को नष्ट कर दिया। उस दिन वायुसेना ने लाहौर सेक्टर तक पाकिस्तानी सेना को परेशान करके रख दिया था ! शाम को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने युद्धविराम का ऐलान कर दिया।

 

ये दास्ताँ कुछ नई नहीं है, पाकिस्तान हर बार मुह की खाता है फिर भी बाज़ नहीं आता। नीयत में खोट दरअसल पाकिस्तानी सेना के है, जिसके हुक्मरान भारत पाक के बीच किसी भी शांतिवार्ता को सफ़ल नहीं होने देना चाहते। पकिस्तान सेना चीफ़ राहील शरीफ भारत के खिलाफ भड़काऊ टिपण्णी करते बाज नहीं आते। पीएम मोदी की इस यात्रा से कुछ समय पहले ही राहील शरीफ ने जंग की सूरत में भारत को अंजाम भुगतने की चेतावनी देते हुए कहा था , “हमारी फौज हर तरह के हमले के लिए तैयार है। अगर भारत ने छोटा या बड़ा किसी तरह का हमला कर जंग छेड़ने की कोशिश की तो हम मुहतोड़ जवाब देंगे और उन्हें ऐसा नुक्सान होगा जिसकी भरपाई भी मुश्किल होगी।” ये शब्द पाकिस्तानी सेना की 1971 वाली करारी शिकस्त से पैदा हुई अविस्मर्णीय झुंझलाहट के द्योतक हैं। आज पाकिस्तानी सेना भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, स्मगलिंग और आतंकवाद में बुरी तरह उलझी हुई है। पकिस्तान की सारी संपत्ति का 56 फ़ीसदी सेना के अधिकारियों ने हथिया रखा है। पकिस्तान के जितने भी आर्मी चीफ रहे हैं, चाहे वो जिया उल हक हों या परवेज़ मुशर्रफ, सब धुर भारत विरोधी रहे हैं। ऐसी सेना का मनोबल कैसा होगा, ये अनुमान लगा पाना मुश्किल नहीं।

बहरहाल, युद्ध किसी भी समस्या का हल कतई नहीं। ये समय प्रधानमन्त्री मोदी के इम्तेहान का नहीं बल्कि पाकिस्तानी सरकार है, जिसे भारत ही नहीं बल्कि दुनिया को ये माकूल जवाब देना ही होगा कि और कितने पठानकोट,मुंबई, संसद भवन हैं जिनपर उन्हें अपने आतंकी कदम रखने पड़ेंगे ? क्या हासिल होगा मासूमों के क़त्ल से ? ज़मीन? वही ज़मीन जिसमे भारतीय सेना के शौर्य ने पाकिस्तानी सेना के जवानों को जाने कितनी बार दो गज नीचे दफ्न किया है। जरूरत हमारे देश के अवाम और नेताओं को भी एक सबक लेने की है, वो ये कि कोई भी नेतागिरी और सत्ता स्वार्थ देश के हित से ऊपर नहीं है। हमें एकजुटता और अखंडता से कभी मुह नहीं मोड़ना चाहिए। इससे सेना को बल मिलता है। सरहद पर जान देने वाला सिपाही मासिक वेतन के लिए नहीं बल्कि, राष्ट्रीय सुरक्षा में अपने प्राण देता है। कुछ लोग इसे मज़हब से भी जोड़ देते हैं। उनकी सोच कब बदलेगी ये तो पता नहीं, लेकिन दुनिया की सोच बदल रही है, भारतवर्ष के प्रति। अमेरिका ने भी इस हमले पर चिंता जताते हुए पकिस्तान से निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।

अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा, “हमें गहन, पूर्ण निष्पक्ष और पारदर्शी जांच प्रक्रिया की उम्मीद है और इसके परिणाम का इन्तेजार है। यह पता करना पकिस्तान का काम है कि जांच में कितना समय लगेगा। ”

दुनिया की नज़र भारत की तरफ़ है, पठानकोट ने पकिस्तान के आतंक प्रेम का चेहरा एक बार फिर दुनिया के सामने उघाड़ कर रख दिया है। ऐसे में हमें धैर्य और सामंजस्य बनाए रखने की महती आवश्यकता  है।

मुंबई पुलिस पर है पूरा भरोसा -आमिर

Bureau@Navpravah.com

 

असहिष्णुता मामले पर विवादित बयान देने के बाद से ही लगातार मुश्किलों का सामना करने वाले मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान ने मुंबई पुलिस द्वारा अपनी सुरक्षा में कटौती किए जाने के फैसले का स्वागत किया है और कहा है कि उन्हें मुंबई पुलिस पर पूरा भरोसा है.

आमिर खान ने मुंबई पुलिस के इस फैसले पर ट्वीट किया कि मैं पूर्ण रूप से मुम्बई पुलिस के इस फैसले का समर्थन करता हूँ.मुझे पूरा विश्वास है कि मुंबई पुलिस इस व्यवस्था का बेहतर इस्तेमाल मुंबई को और अधिक सुरक्षित बनाने में करेगी.और मुझे इस बात का भी भरोसा है कि जब मुझे सुरक्षा की ज़रूरत होगी तब मुंबई पुलिस खुद इस विषय में पहल करेगी.

“अतुल्य भारत” कैंपेन से हटाए जाने के विषय में आमिर ने कहा कि,” मैं सरकार के इस फैसले का सम्मान करता हूँ . देश की सेवा के लिए मैं हमेशा तत्पर था और हमेशा रहूँगा.”

आज पठानकोट जाएंगे मोदी

Bureau@Navpravah.com

 

एयरबेस पर हमले के बाद आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्थिति का जायजा लेने के लिए पठानकोट जा रहे हैं। फिलहाल सुरक्षा बलों ने पठानकोट के वायुसेना स्टेशन को पूरी तरह सुरक्षित घोषित कर दिया है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ दौरे में प्रधानमंत्री शहीदों के परिवार वालों से मुलाकात भी कर सकते हैं।

पिछले कुछ समय से पठानकोट हमले को लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार हमले कर रहा है। फिलहाल पीएम नरेंद्र मोदी की ओर से पठानकोट के दौरे को सरकार की एक पहल के तौर पर देखा जा रहा है। हालाँकि अभी तक दौरे का पूरा विवरण नहीं मिल सका है, लेकिन यह तय मन जा रहा है कि प्रधानमंत्री पठानकोट जा रहे हैं। इससे पहले, शुक्रवार को सुरक्षा बलों ने तलाशी अभियान पूरा करने की घोषणा की। फिलहाल, एयरबेस को पूरी तरह साफ कर लिया गया है।

पठानकोट हमले के बाद सरकार की गतिविधियों और पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के माले को विपक्ष लगातार तूल दे रही है। विपक्ष का कहना कि आखिर पाकिस्तान ऐसा कौन सा कदम उठाया, जिससे प्रधानमंत्री मोदी को लगा कि पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाया जाना चाहिए। अचानक हुए पाकिस्तान के दौरे से विपक्ष ही नहीं तमाम मोदी समर्थकों ने भी इसकी आलोचाना की है। सबका यही कहना है कि पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ने से पहले मोदी को सोचना चाहिए। खासकर सोशल मीडिया पर मोदी को भारी विरोध झेलना पड़ रहा है।

मालदा में लगी ‘सांप्रदायिक आग’ की लपटें पहुँचीं पूर्णिया

ShikhaPandey@navpravah.com

हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी के पैगम्बर मोहम्मद के खिलाफ दिए गए विवादित बयान के कारण माहौल और ज़्यादा बिगड़ता नज़र आ रहा है. पश्चिम बंगाल के मालदा के बाद अब बिहार के पूर्णिया में भी हिंसा का मामला सामने आया है.

पूर्णिया में आल इंडिया इस्लामिक काउंसिल के बैनर तले यूपी के अखिल भारतीय हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी के एक भड़काऊ बयान के विरोध में जुलूस निकाला गया था . बायसी के पूर्व विधायक मोहम्मद रुखनुद्दीन के नेतृत्व में यह जुलूस निकाला गया था . काउंसिल की ओर से कमलेश तिवारी को फांसी देने की मांग हो रही थी . इसी दौरान जुलूस में शामिल लोगों ने बायसी थाने पर अचानक धावा बोल दिया . भीड़ ने थाने में जमकर तोड़फोड़ की . थाने के अंदर सामानों को भी नुकसान पहुंचाया . थाने के जरूरी कागजात भी लेकर चले गए .

इससे पहले कमलेश तिवारी के विवादित बयान को लेकर मालदा में हजारों की भीड़ ने हिंसा फैलाई थी . थाने के अंदर भी आगजनी की गई थी . दो दर्जन से ज्यादा गाड़ियों में आग लगा दी गई थी . मालदा में भी मुस्लिम समुदाय कमलेश तिवारी को फांसी की मांग कर रहा था.

कमलेश तिवारी पर कई बार भड़काऊ बयान और धार्मिक उन्माद फैलाने के आरोप लग चुके हैं और कई विवादों में वो जेल भी जा चुके हैं . कमलेश के ताजा विवाद की शुरुआत नवंबर में हुई थी जब उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान ने कुछ दिन पहले कहा था कि आरएसएस में लोग इसलिए शादी नहीं करते हैं क्योंकि वो समलैंगिक होते हैं. इसके जवाब में कमलेश तिवारी ने पैगंबर मोहम्मद पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी.सोशल मीडिया पर तिवारी का बयान आग की तरह फैला और उतनी ही तेजी से देश भर में विरोध प्रदर्शन भी हुए . 2 दिसंबर को लखनऊ में कमलेश तिवारी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. कमलेश तिवारी पर कानूनी कार्यवाही होने के बाद भी मुस्लिम समुदाय के विरोध प्रदर्शन नहीं रुक रहे हैं .

पठानकोट हमला: एक और कर्मचारी हिरासत में

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पठानकोट हमले में आतंकियों के एयरबेस में घुसने के मामले में एयरफोर्स स्टेशन का एक कर्मचारी शक के घेरे में आ गया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पठानकोट हमले की जांच कर रही एजेंसी ने पठानकोट एयरबेस के एक कर्मचारी को हिरासत में लिया है.

कर्मचारी सेना के मिलिट्री एंड इंजीनियरिंग सर्विसेज का कर्मचारी है. यही कर्मचारी तब एयरबेस में तैनात था. शक है कि कर्मचारी ने आतंकियों के घुसने में मदद की होगी.

जिस दीवार को लांघकर आतंकी एयरबेस में दाखिल हुए थे, उसके तीन प्लडलाइट्स काम नहीं कर रहे थे. जिस जगह से आतंकी अंदर घुसे थे वो मिलिट्री एंड इंजीनियरिंग सर्विसेज के वेहिकल मेंटेनेंस शेड के पास था. हिरासत में लिया गया कर्मचारी कुछ वक्त पहले उधमपुर से पठानकोट ट्रांसफर होकर आया था. कर्मचारी चतुर्थ श्रेणी का बताया जा रहा है.

एक और पुख्ता जानकारी ये भी मिली है कि इसकी पूरी प्लानिंग पाकिस्तान में हुई थी. भारत के पास उन हैंडरों की जानकारी भी है, जो पठानकोट में आतंकियों को निर्देश दे रहे थे. भारत सरकार ने ये सभी नाम पाकिस्तान को बताए हैं और उन पर जल्द से जल्द कार्रवाई करने को कहा है.

गौरतलब है कि पठानकोट एय़रबेस हमले में सात जवान शहीद हुए थे जबकि 6 आतंकी मारे गए थे.

आमिर की हटाई गई सुरक्षा

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असहिष्णुता पर विवादित बयान देना अब अभिनेता आमिर खान को भारी पड़ता नज़र आ रहा है. अतुल्य भारत अभियान से हटाए जा चुके अभिनेता आमिर खान को सरकारी सुरक्षा भी नहीं मिलेगी. सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा मामले की समीक्षा में पाया गया कि अभिनेता को किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं है, इसलिए यह सुरक्षा वापस ली जा रही है.

अतुल्य भारत अभियान से हटाने के बाद आमिर को एक और झटका लगा है. आमिर खान को प्रदान की गई सरकारी सुरक्षा अब नहीं मिलेगी. हालाँकि वे अकेले फ़िल्मी सितारे नहीं हैं, जिनकी सरकारी सुरक्षा हटाए जाने का निर्णय लिया गया है बल्कि अभिनेता शाहरुख खान समेत ऐसे 25 बॉलीवुड सितारे हैं, जिनसे यह सुरक्षा छीन ली गई है. हालाँकि एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मुंबई पुलिस अब आमिर खान को दो सशस्‍त्र कांस्‍टेबलों की सुरक्षा दे रही है जो दो शिफ्ट में उनके साथ रहेंगे.

जिन 15 हस्तियों की सुरक्षा बरकरार है, उसमें एक्‍टर अक्षय कुमार, प्रोड्यूसर महेश और मुकेश भट्ट शामिल है. अक्षय कुमार को ‘खिलाड़ी 786’ और ‘ओह माई गार्ड’ फिल्‍म के दौरान धमकी मिली थी. इतना ही नहीं, उन्‍हें अंडरवर्ल्‍ड से भी फिरौती के लिए फोन आया था. अक्षय ने जब अपने घरेलू नौकर को काम से निकाल दिया था तो उसने भी जान से मारने की धमकी दी थी. वहीं दोनों भट्ट भाइयों को अंडरवर्ल्‍ड और आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन से भी धमकी मिल चुकी है. पुलिस ने लता मंगेशकर, दिलीप कुमार और अमिताभ बच्‍चन की सुरक्षा को भी बरकरार रखा है.

 

जानकारी के मुताबिक़ अभी तक कुल 40 बॉलीवुड हस्तियों को सुरक्षा प्रदान की गई थी. लेकिन अब इसे घटाकर 15 हस्तियों पर सीमित कर दिया है. एक अधिकारी ने बताया कि फ़िल्मी हस्तियों को सुरक्षा देने पर काफी मैन पावर खराब होती है. मुंबई पुलिस ने जिन 25 हस्तियों की सुरक्षा वापस ली है, उसमें बॉलीवुड के डायरेक्‍टर-प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा, राजकुमार हिरानी, फराह खान, सिबलिंग अली और करीम मोरानी शामिल हैं.

फिल्म समीक्षा- “वज़ीर”

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फिल्म समीक्षा: वज़ीर

निर्देशक: बिजॉय नाम्बियार
प्रमुख कलाकार: फरहान अख्तर, अमिताभ बच्चन ,अदिति राव हैदरी, मानव कौल, नील नितिन मुकेश ,अंजुम शर्मा और जॉन अब्राहम
अवधि: 1 घंटा 43 मिनट
रेटिंग: 3/5 स्टार

 

‘शैतान’ और ‘डेविड’ जैसी फिल्मों को डायरेक्ट करने वाले डायरेक्टर बिजॉय नाम्बियर अपनी अलग तरह की फिल्मों के लिए प्रसिद्ध हैं, और साथ ही ‘पिज्जा’ और ‘कुकु माथुर की झंड हो गयी’ फिल्मों को प्रोड्यूस भी कर चुके हैं.निर्माता विधु विनोद चोपड़ा की आईडिया पर आधारित थ्रिलर फिल्म ‘वजीर’ को भी बिजॉय ने बखूबी डायरेक्ट किया है.

यह कहानी एटीएस ऑफिसर दानिश अली (फरहान अख्तर) की है जो अपनी पत्नी रुहाना अली (अदिति राव हैदरी) और बेटी के साथ ख़ुशहाल जिंदगी बिताता रहता है,मगर इस बीच एक हादसा उनकी ज़िदगी को हिला कर रख देता है. दानिश खुद को इस हादसे का ज़िम्मेदार मानता है. उसे एटीएस की नौकरी से भी सस्पेंड कर दिया जाता है. ऐसे वक़्त में उसकी मुलाक़ात पंडित ओंकारनाथ धर (अमिताभ बच्चन) से होती है जो व्हील चेयर शतरंज मास्टर हैं . अपना सारा वक़्त वो शतरंज खेलते हुए बिताते हैं. वो भी एक हादसे की याद से जूझ रहे हैं. उन्हें लगता है कि मंत्री यज़ाद क़ुरैशी (मानव कौल) ने उनकी बेटी को मार दिया, जिसका वो बदला लेना चाहते हैं. पंडित जी और दानिश क़रीबी दोस्त बन जाते हैं. दानिश उनसे वादा करता है कि पंडित जी को इंसाफ़ दिलाएगा. सिलसिलेवार घटनाओं के बीच कई अहम बातों का खुलासा भी होता है और शतरंज के खेल का ‘वजीर’ एक निर्णायक मोहरा बनकर सामने आता है. फ़िल्म को खास तौर से ‘वज़ीर’ नाम ही क्यों दिया गया है, इसका पता आपको इस थ्रिलर फिल्म को देखकर ही चलेगा.

फिल्म की स्क्रिप्ट को बड़े ही बेहतरीन अंदाज में शतरंज के खेल पर आधारित किया गया है, किस तरह से एक प्यादा ,आखिरी घर में जाकर वजीर बन जाता है, कैसे हाथी अपने सामने वाले सैनिक के धराशायी होते ही पागल हो जाता है, और घोड़े के साथ साथ ऊँट की चालें कितनी अहम होती हैं; ये सारी बातें इंसानो के रवैये के आधार पर दर्शायी गयी हैं. लेखक अभिजात जोशी ने विधु विनोद चोपड़ा के कांसेप्ट को फिल्म की कहानी में तब्दील किया है जो काफी मुश्किल काम जान पड़ता है. स्क्रिप्ट के साथ साथ इस फिल्म की रफ्तार काबिल ए तारीफ है , एडिटिंग टेबल पर इस फिल्म को मात्र 103 मिनट का बनाया जाना भी सराहनीय है. स्क्रिप्ट लेवल पर फिल्म का हरेक किरदार बखूबी सजाया गया है.

एक्टर फरहान अख्तर ने एक बार फिर से बता दिया है कि वो किस तरह से किरदार को पूरी तरह खुद जीने का प्रयास करते हैं और सफल भी हो जाते हैं, वहीँ अदिति राव हैदरी का काम भी एक पत्नी के किरदार में सराहनीय है.फिल्म में कश्मीरी पंडित का किरदार निभा रहे अमिताभ बच्चन ने बहुत ही उम्दा काम किया है और जिस तरह से उन्होंने किरदार का हाव भाव और लहजा पकड़ा है वो अद्भुत है. वहीं अभिनेता ‘मानव कौल’ फ़िल्म में एक सरप्राइज पैकेज के रूप में सामने आते हैं , जिन्होंने एक दबंग मंत्री के रूप में अद्भुत काम किया है. नील नितिन मुकेश के साथ साथ फिल्म में फरहान अख्तर के दोस्त का किरदार निभा रहे अंजुम शर्मा ने भी सहज अभिनय किया है. जॉन अब्राहम का भी छोटा लेकिन अच्छा कैमियो रोल है.

फिल्म का शुरुवाती गीत ‘तेरे बिन’, रिलीज से पहले ही हिट हो चुका है ,इसके अलावा ‘मौला’ ‘तू मेरे पास’ ‘खेल खेल में’ और ‘अतरंगी यारी’,इन सभी गीतों को भी फ़िल्म में बहुत अच्छे ढंग से फ़िल्माया गया है.