“आधे अधूरे कॉमरेड”

“आधे अधूरे कॉमरेड”

आनंद रूप द्विवेदी | Navpravah.com वामपंथी पत्रकार गौरी लंकेश की निर्मम हत्या के बाद देश का राजनीतिक माहौल एक बार फिर से वैचारिक सिद्धांतों व दलगत हथकं...

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आनंद रूप द्विवेदी | Navpravah.com

वामपंथी पत्रकार गौरी लंकेश की निर्मम हत्या के बाद देश का राजनीतिक माहौल एक बार फिर से वैचारिक सिद्धांतों व दलगत हथकंडों के सूक्ष्म परीक्षण की मांग खड़ी करता है। हमें मूलभूत ढांचे को समझने की सख्त जरूरत है। जरूरत इसलिए ताकि क्रांति की आड़ में अपनी सेमी पॉलिटिकल रोटियां सेंकने वाले घाघ आपको अपना सॉफ्ट टारगेट बनाने में कामयाब न हों। आज का सबसे फैन्सी शब्द है कॉमरेड।

कॉमरेड कभी आधा अधूरा नहीं हो सकता। उसे पूरा कॉमरेड बनना ही पड़ता है। ये पूर्णत्व का भाव हर उस कॉमरेड में होना ही चाहिए जिसे इसकी एबीसीडी तक का ज्ञान हो। ‘कॉमरेड’ का शाब्दिक अर्थ है ‘फ़ेलो मेम्बर’ जिससे युद्ध मे भागी सैनिक आदि को संबोधित किया जाता था। कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों को ये शब्द इतना लज़ीज़ महसूस हुआ कि इसका पूर्णकालिक स्वामित्व ले लिया गया। अब कॉमरेड कहने भर से आप कम्युनिस्ट हो जाते हैं। लेकिन आधे अधूरे। पूरा कम्युनिस्ट या कॉमरेड भारत मे नहीं मिलता। भारत का कॉमरेड हर सुख को भोगता हुआ, सहवास आदि में ओत प्रोत कम्युनिस्ट होता है। विचारों की आड़ में ये साम्प्रदायिक सौहार्द्र की देशज भावना को आगे बढ़ाने को उठ खड़ा तो होता है, लेकिन स्वयं ऐसी साम्प्रदायिकता को जन्म देता है जिससे कुछ हासिल होता है तो हिंसा और वैमनस्यता।

ये कॉमरेड डॉक्टर, प्रोफेसर, इंजीनियर, हीरो, हेरोइन, कलाकार, अदाकार, साहित्यकार, कुछ भी हो सकता है। आजीविका और बाजारवाद का कोई भी संसाधन अपना सकता है फ़िर भी विचारों से कॉमरेड का कॉमरेड ही रहता है। सप्तपदी पर आधारित हिन्दू वैवाहिक संस्था में भी बंध जाता है। सनातन पद्धति के सभी कर्मकांडो का बराबरी से पालन करने वाला, जिसके नाम में ही किसी देवी देवता आदि के दर्शन हो जाएं, ऐसा कॉमरेड केवल भारत में ही पाया जाता है।

कहानी की गहराई में जाने पर पता चलता है कि मार्क्स और लेनिन के रास्ते पर चलने वाली कम्युनिस्ट विचारधारा के दो धड़े हुए। एक मार्क्सवादी और दूसरा कम्युनिस्ट। किसान आंदोलनों से जन्मे इस संगठन की शुरूआत जिस सिध्दांत पर हुई आज के समय में उसके ठीक उलट जाती हुई दिख रही है। आगे चलकर 70 के दशक में जब चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने संगठन का हथियार बन्द विभाजन किया तो चीन के माओ का दामन थाम लिया। अब इसमें द्वेष, हिंसा, अहंकार, लिप्सा सब थी। इस माओवाद के दो सिद्धांत हैं:

1. राजनैतिक सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है। 

2. राजनीति रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति।

जब 1967 में नक्सलवादियों ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई तब इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। अपने लक्ष्य और विचारधारा से पूर्णतः भटके लोगों का नक्सलवाद इसी कम्युनिस्ट विचारधारा का बिगड़ा हुआ स्वरूप है। आज का नक्सल हत्या और तबाही का द्योतक है।

हमारे आधुनिक कॉमरेड मार्क्सवाद, कम्युनिज़्म, नक्सल की पंचमेल खिचड़ी जैसे हैं, जिन्हें दरअसल स्वयं नहीं पता कि किस पलड़े जाकर बैठना है। इन्हें सरकारी सहयोग, जनता के टैक्स से मिलने वाले फायदे भी चाहिए, तो दूसरी ओर जंगल में बनती हुई सड़क इनके मकसद की सबसे बड़ी बाधा भी लगती है। जिस प्रगतिशील समाज की अवधारणा यह बुद्दिजीवी वर्ग टीवी चैनलों, जर्नल्स, में करता है, उसी प्रगतिशीलता का आज सबसे मुखर विरोधी है। इन्हें सेल्फ़ी मोड वाला कॉमरेड कहना भी गलत न होगा।

कहा जाय तो “हाथी के खाने के अलग और दिखाने के दांत अलग”। ऐसा भारतीय कॉमरेड मूल विचारधारा का वहन कर पाने में बिल्कुल सहज नहीं होता। उसे अपने शिष्य तो इस परंपरा के कठिन साधक चाहिये किंतु गुरुत्व में पर्याप्त छूट प्राप्त हो। ऐसे अधकचरे खोखले वैचारिक दांव पेंच से बचना ही श्रेयस्कर होगा। आज का आधा अधूरा कॉमरेड हत्या पर डिबेट्स करता है। वो बात करना चाहता है लेकिन अपने हित की। उसे जनमानस, जनसरोकार का कुछ ज्ञान ही नहीं। वो बस आपको हमें और पूरी मायावी दुनिया को कुछ दिखाना चाहता है, ऐसा दिखावा जिसमें विचारों, संवेदनाओं की दर्दनाक मौत के सिवा और कुछ बचा है तो बस पाखण्ड।



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