इंसानियत की मिसाल कायम करता एक पुलिसवाला

इंसानियत की मिसाल कायम करता एक पुलिसवाला

आनंद रूप द्विवेदी | Navpravah.com पुलिस का नाम सुनते ही भय से बहुतेरों के कान खड़े हो जाते हैं, लेकिन हमारे बीच कुछ ऐसे पुलिस कर्मी भी हैं जो सबसे पहले...

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आनंद रूप द्विवेदी | Navpravah.com

पुलिस का नाम सुनते ही भय से बहुतेरों के कान खड़े हो जाते हैं, लेकिन हमारे बीच कुछ ऐसे पुलिस कर्मी भी हैं जो सबसे पहले इंसानियत के फ़र्ज़ को अहम समझते हैं. आशीष मिश्रा ऐसे ही एक कर्तव्यनिष्ठ और संवेदनशील पुलिस कर्मी हैं. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में आईजी ऑफिस में तैनात पुलिस कांस्टेबल आशीष मिश्रा मूलतः मिर्जापुर के रहने वाले हैं. आशीष ने बीएड और एमए की डिग्रियां हासिल कीं और ह्यूमन राइट्स में दो वर्षीय डिप्लोमा भी कर चुके हैं.

दरअसल आशीष कोई साधारण पुलिस वाले नहीं है. उन्हें लोग पुलिस विद डिफ़रेंस वाले काम से जानते हैं. आशीष ने समाज में कई ऐसी मिसालें कायम की हैं, जिनमें रक्तदान, आर्थिक विपन्न लोगों की व्यक्तिगत रूप से मदद आदि सामाजिक कार्य शामिल हैं. आशीष अपने इन सराहनीय कार्यों के लिए दर्जनों पुरूस्कार व प्रशंसापत्र बटोर चुके हैं.

एक दिन परिवार के साथ मंदिर गए, वहां एक महिला को रोते हुए देखा तो कारण पूछने पर पता चला कि समय पर पैसे के अभाव के चलते खून न मिल पाने के कारण उस महिला का आठ माह का बेटा मर गया था. इस बात ने आशीष के अंतर्मन को हिला कर रख दिया. उन्होंने इस समस्या का समाधान निकालने की ठान ली. आशीष ने ब्लड डोनेशन की एक मुहिम शुरू की. पहले तो वो अकेले ही थे लेकिन बाद में उनके साथ और भी सहकर्मी जुड़ते चले गए.

इलाहाबाद में यदि आपको कभी कोई नौजवान ओजस्वी वर्दीधारी गरीब बच्चों में कपड़े आदि बांटते दिख जाए तो वो आशीष मिश्रा ही होंगे.

एक मूक बधिर बुजुर्ग कपड़े प्रेस करने वाला जगदीश चन्द्र जब नगर निगम के अतिक्रमण हटाओ अभियान का शिकार हुआ तो आशीष मिश्रा उसके लिए देवदूत साबित हुए. जब उसकी दयनीय स्थिति का आशीष को पता चला तो उन्होंने स्वयं एक हाथ ठेला खरीदकर जगदीश को भेंट कर दिया. ये तरीका है मानवता की अद्भुत मिसाल पुलिस कांस्टेबल आशीष मिश्रा का.

छोटे बच्चों को भीख मांगते देख आशीष उनके साथ खुद किसी दुकान में खाना खाने बैठ जाते हैं. उनसे दुःख दर्द शेयर करते हैं. आशीष डेली डायरी भी लिखते हैं जिसमें वो अपने मन की बात को कलम के रास्ते कागज़ पर उतार देते हैं. उनकी डायरी के एक एक शब्द में अपार संवेदना झलकती है. आशीष की डायरी का एक अंश है जिसमें वो लिखते हैं, “सपने सब देखते हैं, कुछ लोगों के सपने पूरे होते हैं तो कुछ के नहीं. इसके लिए त्याग करना पड़ता है. जो आज ऊंचाइयों पर हैं ये उनके परिश्रम व् त्याग की के कारण ही है. आज यदि वो प्रकाश में हैं तो कल उन्होंने अँधेरे का सामना भी किया होगा.”

अपनी इसी दृढनिश्चय सोच के साथ आशीष बिना रुके, या किसी के विरोध की परवाह किये बगैर समाज सेवा करते हैं. आज उनका विभाग उनके कामों की तारीफ करता है और आला अधिकारियों से वो प्रशंसा भी पाते हैं. आज हमारे समाज को आशीष मिश्रा जैसे साहसी, संवेदनशील, कर्तव्यनिष्ठ पुलिस कर्मियों की जरूरत है. हमारा नवप्रवाह परिवार आशीष के इस जज्बे को सलाम करता है.

 



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