गुलाबी गेंद का गेम होगा आज से शुरू

PankajAthawale@Navpravah.com

क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है. आज 27 नवम्बर को क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच दिवस-रात्रि का टेस्ट मैच एडीलेड ओवल पर खेला जाएगा.

15 मार्च 1877 मेलबर्न के मैदान पर जब ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच पहला आधिकारिक टेस्ट मैच खेला गया, तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन दूधिया रोशनी में कभी कोई टेस्ट मैच खेला जाएगा. 1877 से लेकर अब तक क्रिकेट के खेल में काफी सारे परिवर्तन आए हैं. 6 दिन का टेस्ट 5 दिन का हो गया. 1970 के आस-पास 60 ओवर के एक दिवसीय मैच होने लगे. 1977 के आस-पास केरी पैकर ने एक दिवसीय मैचों में रंगीन कपडे और सफ़ेद गेंद के इस्तेमाल की व्यवस्था बनाई. 1987 तब इंग्लैंड के बाहर पहली बार एक दिवसीय मैचों का पहला विश्वकप खेला गया. सन 2003 से टी-20 मुकाबलों ने क्रिकेट की इस भूख को और बढ़ा दिया.

अब क्रिकेट सिर्फ मैदानों में ही नहीं, बल्कि टीवी के जारी पूरे विश्व में देखा जाता है. हालाँकि विश्व के कुछ चुनिन्दा देशं में ही क्रिकेट प्रचलित है. नए ज़माने के श्रोता अब फ़ास्ट फूट के जैसे फ़ास्ट क्रिकेट का आनंद लेना चाहते हैं. वक़्त का तकाजा ही है कि टी-20 के आने से पारंपरिक क्रिकेट पर अच्छा और बुरा असर पडा है. कई लोगों का यह मानना है कि टी 20 जैसे ताबड़तोड़ और मनोरंजक फॉर्मेट के आने से अब टेस्ट मैचों के खेलने और देखने में उतना मज़ा नहीं आता है. हालाँकि, आज भी टेस्ट क्रिकेट को ही असली क्रिकेट माना जाता है.

आर्थिक समझ-बूझ और कुछ नया करने की आवश्यकता सभी को होती है. और क्रिकेट इससे परे नहीं है. इस वजह से पिछले 7 सालों से क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया दिवस-रात्रि के टेस्ट मैचों की संकल्पना लिए सभी टीमों को आकर्षित करने की कोशिश में जुटा रहा. हालाँकि कल्पना तो बेहद लुभावनी थी ज़रूर लेकिन लखनवी अंदाज़ में सारे क्रिकेट टीमों ने पहले आप-पहले आप की भूमिका निभाई. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का मानना था कि टी 20 के ज़माने में अगर टेस्ट क्रिकेट को ज़िंदा रखना हो तो कुछ नया करना ही पडेगा.

इसमे आईसीसी को एक और सवाल से जूझा था कि टेस्ट मैचों के नियमों में तो कोई बदलाव नहीं करना था लेकिन सफ़ेद गेंद या लाल गेंद से टेस्ट में खेल कैसे खेला जाए. तब क्रिकेट की ज्गेंद बनाने वाली कंपनियों ने कुछ नया करने का बीड़ा उठाया. और नतीअज़ा निकला कुछ अजब गुलाबी गेंद. ज़ूरत थी एक ऐसी गेंद की जोकि दूधिया रोशनी में भी साफ़ दिखाई दे और 80 ओवर तक टिके. कूकाबूरा नामक कंपनी ने काफी मशक्कत और परीक्षणों के बाद यह गुलाबी गेंद बनाई. अब जब पूरा कैनवास ही तैयार हो गया तब खिलाड़ियों ने इस कल्पना पर सवाल उठाया. लाज़मी भी था क्योंकि दुनिया में कहीं पर भी दूधिया रोशनी में गुलाबी गेंद के साथ 5 दिनों का मैच खेला जाता हो. साथ ही 50 ओवर की इनिंग और 5 दिन दूधिया रोशनी में खेलना, इसमें बहुत अंतर है.

काफी खिलाड़ियों ने इस पर ऐतराज़ जताया, सवाल उठाया और मजाक भी उड़ाया लेकिन कुछ खिलाड़ियों ने इस कल्पना का स्वागत किया. 7 साल की यात्रा और उतार चढ़ाव के बबाद आखिर न्यूजीलैंड ने ऐसा टेस्ट खेलने का न्योता स्वीकार किया और 27 नवम्बर को यह ऐतिहासिक मैच खेला जाएगा. फिलहाल ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर न्यूजीलैंड की टीम ने दूधिया रोशनी में 2 अभ्यास मैच भी खेल लिए हैं, जिनमे से एक में बल्लेबाज़ मार्टिन गुप्टिल ने शतक भी लगाया. दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया इस लम्हे का सालों से इंतज़ार और तैयारी भी कर रहा है. उनके पास स्टीव ओ’कीफ जैसा गुलाबी गेंद घुमाने वाला स्पिनर भी तैयार हो गया है. और इस टेस्ट मैच के लिए ओ’कीफ को ख़ास तौर पर टीम में शामिल किया गया है.

15 मार्च 1887, 5 जनवरी 1971, 17 फरवरी 2005 इन तारीखों को क्रिकेट के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है. क्योंकि ये तारीखें हैं, पहले एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय और पहले टी-20 अंतर्राष्ट्रीय मैचों की.

अब 27 नवम्बर 2015 की तारीख भी सुनहरे अक्षरों में लिखी जाएगी.

क्या होगा 27 नवम्बर को?

50 हज़ार लोग एडीलेड ओवल मैदान में हाज़िर रहेंगे?

क्या यह फॉर्मेट, क्रिकेट प्रेमियों और खिलाड़ियों को पसंद आएगा?

क्या गुलाबी गेंद इस परीक्षा में पास हो पाएगी?

क्या बल्लेबाज़ दूधिया रोशनी में 5 दिन तक टिक पाएंगे और क्या टेस्ट क्रिकेट को इस परिकल्पना का फायदा होगा?

जो भी हो, एक बात तो तय है कि क्रिकेट का खेल और भी रोचक और अनिश्चितताओं से लबरेज़ रहेगा. उम्मीद करते हैं कि विश्व में सबसे ज्यादा टीवी दर्शकों वाले भारत में, भारतीय टीम कोई ऐसा टेस्ट मैच ज़रूर खेलेगी.

*(लेखक स्पोर्ट्स कमेंटेटर हैं)

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