इंडिया की रियल वंडरवुमेन मिसेज वर्ल्ड केतकी जानी जिसने एलोपेशिया को दी मात

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आनंद रूप द्विवेदी | Navpravah.com

“ दामन झटक के वादी-ए-ग़म से गुज़र गया,

उठ उठ के देखती रही गर्द-ए-सफ़र मुझे.”

                                                                                                                     –अली सरदार जाफ़री

कहते हैं, जिनके इरादे और इच्छाशक्ति में दम हो उसे मज़िल तक पहुँचने से कोई क्या रोकेगा।  कुछ ऐसी ही दास्ताँ है गुजरात की केतकी जानी की।  केतकी को वंडरवुमन भी कहा जाए तो कम है। अहमदाबाद की केतकी जानी पुणे में गुजराती भाषा की अधिकारी के तौर पर कार्यरत हैं। वर्ष 2011 में केतकी के जीवन में एलोपेशिया (बालों के पूर्णतः झड़ जाना) नामक त्रासदी की शुरुआत हुई, जिसकी वजह से उनके सर के बाल झड़ गए। एलोपेशिया की शिकार केतकी जानी इस बात से बेहद दुखी रहने लगीं। उनके अनुसार, “लोग सूरज के उदय का इंतज़ार करते थे और मैं सूरज के अस्त का, लेकिन तभी मुझे ये पता चला कि एलोपेशिया की चपेट में आने वाली मैं अकेली महिला नहीं हूँ, बल्कि दुनिया भर में इस बीमारी के कारण कई महिलायें संघर्षरत हैं।”

बस फिर क्या था, अपनी इसी एलोपेशिया की अवस्था को एक चुनौती की तरह स्वीकार करते हुए केतकी जानी ने विग्स और दुपट्टे को अलविदा कह दिया। उन्होंने अपने सर पर माँ-बेटी, ओम के टैटू बनवाये और शान से जीने का रास्ता ढूंढ निकाला।  वो “वर्ल्ड वाइड एलोपेशियन ग्रुप” के संपर्क में आईं जहां उनके जैसी अन्य महिलाओं ने उनकी हौसलाफजाई की।

जीवन में कभी भी हार न मानने वाली केतकी जानी ने “मिसेज इंडिया वर्ल्डवाइड” जैसी शीर्ष प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। कैटवाक, प्रश्नोत्तर आदि तमाम बाधाओं को बेहद संजीदगी से पार करते हुए केतकी जानी ने “मिसेज इण्डिया वर्ल्डवाइड-इंस्पिरेशन कैटेगरी” का ख़िताब जीत लिया।

दुनिया भर में एलोपेशिया से ग्रस्त तमाम महिलाओं के लिए जीने की वजह ज़ाहिर करने वाली केतकी जानी जिंदादिली की एक अद्भुत मिसाल हैं। उन्होंने हमसे बताया कि कैसे एलोपेशियन लड़कियां अपना दुःख व्यक्त करते हुए जब ये बताती हैं कि बालों के न होने के कारण उन्हें कोई जीवनसाथी के रूप में नहीं अपनाना चाहता, तब उनके मन को कितनी पीड़ा पहुँचती है। दूसरों की इसी समस्या को उनके जीने की वजह बनाने के लिए और एलोपेशिया से जुड़े तमाम भ्रमों से दुनिया को अवगत कराने के उद्देश्य से केतकी ने “ Support & Accept Aelopecia with Ketki Jani ” नामक एक ग्रुप भी बनाया है।

केतकी जानी ने हमसे बताया कि लोगों के दिमाग में एलोपेशिया को लेकर कैसे कैसे मिथक पल रहे हैं।  मेडिकल प्रैक्टिशनर्स भी स्वार्थ के चलते कैसे इससे जुड़े सच को लोगों से छुपा रहे हैं।

केतकी जानी की ही एक पोस्ट के अनुसार, “सालों से वो हमारे बीच है लेकिन हमने उसे जानने की न उत्सुकता जताई और ना किसी ने ये सब बताने की हिम्मत की। मै उठाती हूँ आज परदा, आप व Alopecia ( एलोपेशिया / ऊंदरी / इन्द्रलुप्त / कीड़ा लगना / चाई पड़ना / गंजापन ) के बीच से। क्योंकि मैं इसकी वजह से 6 साल पहले रोज-रोज पलपल मरी हूँ। मुझे ये होने के बाद पता चला कि, कमउम्र में जिन लड़के – लड़कियों को जीवनसाथी नही मिल पाते साथ ही इसकी वजह से और कई शादीशुदा लोगों की जिन्दगी में भूकंप आये हैं। बहुतों की अरमान भरी ज़िन्दगी बरबाद हो रही है।  प्यार की जगह उन्हें एकलता मिलती है। आप ही तय करें कि इस डिसऑर्डर की वज़ह से क्यों लाखों अरमान सुलग जाएँ ?? क्यों जिसके हिस्से ये आया है वो ताउम्र विग / स्कार्फ़ / कैप या घर की चार दीवारी की क़ैद में रहे ? ये होना उनकी मर्ज़ी नहीं मज़बूरी है। आओ , आप के आसपास कोई ऐसा है तो उसे हिम्मत दो बिना कोई बंधन खुले आकाश मै उड़ने की।

क्या है एलोपेशिया ?

एलोपेशिया एक हेयर रिलेटेड समस्या है जिसमे शरीर हेयर ग्रो करने से मना करता है।  संक्षेप में ये शरीर की हेयर बनाने के काम से घोषित की हुई हड़ताल है।

इसे ऑटोइम्म्युन डीसीस (Auto-Immune Disorder ) कहते हैं, ठीक डायबिटीज , थाइरोइड की तरह. एलोपेशिया मुख्यतः दो प्रकार का होता है।

पहला, रेयर केसेज़ में लोगो की  फैमिली के सभी सदस्यों को ये अनुवांशिक वज़ह से होता है। बकौल केतकी, उन्होंने सात वर्षों में केवल दो ही ऐसे एलोपेशियन परिवार देखे हैं और ऐसा शायद करोड़ों में एक आध परिवारों में ही पाया जाता है।

दूसरा, जो कभी किसी को भी अपनी गिरफ़्त में जकड़ सकता है, जो कई प्रकार का होता है:

  1. ऐलोपेसिआ ईराटा Alopecia Areata (AA)- इसमें सर के बाल के बीच बाल्ड ( Bald Patches) पैचेज होते है।
  2. ऐलोपेसिआ टोटालिस Alopecia Totalis (AT)- इसमें पूरा सर बिना बाल का होता है।
  3. ऐलोपेसिआ युनिवर्सलिस Alopecia Universalis (AU)- इसमें पूरे शरीर में कहीं भी बाल नहीं होते है।

 

ये जन्म से लेकर जीवन के अंत तक उम्र के किसी भी पड़ाव में हो सकता है. शुरुआत सर के किसी भी हिस्से में राउंड पैच से होती है। इसके कारण को आजतक दुनिया में कोई भी नहीं जान सका है। इसकी कोई शर्तिया दवा भी उपलब्ध नहीं है। जरूरी नहीं जिस दवा के लगाने से किसी एक को बाल आयें उसी के उपयोग से किसी अन्य जो भी बाल आ जाएँ।

एलोपेशियन्स के बारे में क्या हैं भ्रांतियाँ ?

लोगों में ये भ्रम है कि एलोपेशिया कोई छुआछूत की बीमारी है जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है। किसी एक के बाल झड़ने की वजह से उसके आसपास के अन्य लोग बिलकुल प्रभावित नहीं होते हैं।

         दैनिक जीवन में कोई तकलीफ़ नहीं होती, बल्कि इंसान बेहद सामान्य जीवन जीता है। एलोपेशिया से सिर्फ सर के बाल झड़ जाते हैं न कि ये किसी प्रकार के दूसरे रोगों को जन्म देता है।

     अमूमन देखा जाता है कि लड़की के बाल न होने पर उसकी शादी ही नहीं होती या फिर वैवाहिक जीवन प्रभावित हो जाता है। स्त्री की सुन्दरता उसके शरीर मात्र से नहीं होती। ऐसे लोग जिन्हें स्त्री केवल भोग की वस्तु या शोपीस समझ में आती हैं वो असामाजिकता के पर्याय हैं। ऐसे व्यक्ति का जीवनसाथी होने से बेहतर है आप अपने जीवन के साथी स्वयं बने रहें।

     किसी भी एलोपेशिया से पीड़ित व्यक्ति चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, की प्रजनन क्षमता पर इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता।

     मेडिकल प्रैक्टिसनर्स द्वारा यदि ये दावा किया जा रहा है कि वो आपके बाल वापस लाने की कोई शत प्रतिशत गारंटी दे रहे हैं तो, ये एक मिथक मात्र है।

     कई मामलों में पाया गया है कि जीवन से हताश निराश व्यक्ति जिनके बाल एकदम झड चुके हैं, वो वापस आ गये। एलोपेशिया से ग्रस्त व्यक्ति बेहद तनाव में आ जाता है, जिस कारण जीवन से हार तक मान सकता है। आवश्यकता है, कि ऐसे व्यक्ति स्त्री हो या पुरुष , हमें अपने बात व्यवहार में कोई भेद नहीं लाना चाहिए, बल्कि जितना हो सके सामान्य व्यवहार करें, उनका प्रोत्साहन करें।  शरीर के बाल जीवन के लक्ष्य तय नहीं करते।  शरीर के वाह्य आवरण पर इंसान का मन नहीं दिख सकता।  दुनिया भर में लाखों लोग एलोपेशियन हैं, और मस्ती भरा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। लेकिन भारत में इसे एक अलग नजरिये से देखा जाता है। हमारे समाज में बालों वाले ही सुन्दर माने जाते हैं। तमाम हेयर ऑयल्स के एडवर्टीज्मेंट्स में सुन्दरता का परिचायक बालों को ही बताया जाता है।  हम समाज के निर्माता हैं।  इसके हर उतार चढ़ाव के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं।  आज हम घने बालों वाले बिना बाल वाले लोगों को हेय दृष्टि से देखें और कल हमारी ही औलाद एलोपेशियन हो जाए तो क्या हमारा दृष्टिकोण पहले जैसा ही रहेगा?

     अक्सर हम गंजा, गंजी, टकला, टकली जैसे कुछ शब्दों का इस्तेमाल एलोपेशिया से गुजर रहे व्यक्तियों को संबोधित करने या उनका उपहास करने में इस्तेमाल करते हैं जिन्हें हम अपने लिए बर्दाश्त भी नहीं कर सकते। ऐसे वाहियात चुटकुलों पर दांत निपोर कर हंसने वालों की तादाद भी बहुत ज़्यादा है। लेकिन ज़रा सोचिए, यदि आपके पिता, पुत्र,माता,बहन,पत्नी,बेटी या अन्य किसी करीबी के लिए कोई भी ऐसे उपहासजनक व अपमानजनक शब्द बोले तो आपके मन में सबसे पहला विचार क्या आएगा! ये बेहद निंदनीय है कि हमें दूसरों का अपमान करके मिलने वाला सुख ज्यादा प्रिय है। यदि हम ऐसा दुर्व्यवहार करते हैं तो न ये हमारे देश की सभ्यता है और न ही हम सभ्य हैं। हमें एलोपेशिया से गुज़र रहे आस पास के हर व्यक्ति के जीवन का सम्बल बनकर रहने में आखिर तकलीफ़ ही क्या है।

     हाल ही में खंडवा, मध्य प्रदेश की एक कॉलेज छात्रा निकिता लाड़ ने एलोपेशिया से पीड़ित होने के कारण, ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली। आज के समाज को “घने मुलायम काले रेशम से मतवाले” बालों की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी से इतर सोचने और श्रेष्ठ मानसिकता का परिचय देने की ज़रूरत है। जो एलोपेशिया से पीड़ित हैं वो ये बिलकुल न सोचें कि बाल समाप्त तो जीवन समाप्त। जीवन हमें एक निश्चित लक्ष्य, समाज में योगदान देने के उद्देश्य के लिए मिला है न कि घने बालों के ख़्वाबों में मर मिटने के लिए। आपका आत्मविश्वास क्या इतना कमजोर था जो बालों के जाते ही खो गया!

     केतकी जानी वो नाम है जो समाज के लिए संघर्ष और कामयाबी की सच्ची प्रतिबिम्ब हैं। जिनसे सभी को सीख मिलती है कि जीवन बालों या शारीरिक सुन्दरता का मोहताज़ नहीं है।  हम अगर चाहें तो तबीयत से उछाले गए एक पत्थर से आसमान में भी सुराख कर सकते हैं।  ज़रूरत है तो केवल मज़बूत व अडिग धैर्य, साहस और आत्मविश्वास की।  केतकी जानी के इस अद्भुत साहस को हम सलाम करते हैं।

(Pictures Credit- Facebook Wall of Ketki Jani)

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