जमशेदपुर: एमजीएम मेडिकल कॉलेज में कुपोषण से 60 बच्चों की मौत

जमशेदपुर: एमजीएम मेडिकल कॉलेज में कुपोषण से 60 बच्चों की मौत

शिखा पाण्डेय|Navpravah.com भारत को कुपोषण मुक्त बनाने के लिए सरकार द्वारा तमाम योजनाएं बनाने के बावजूद देश में कुपोषण से मरनेवाले बच्चों की संख्या में...

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शिखा पाण्डेय|Navpravah.com

भारत को कुपोषण मुक्त बनाने के लिए सरकार द्वारा तमाम योजनाएं बनाने के बावजूद देश में कुपोषण से मरनेवाले बच्चों की संख्या में शर्मनाक बढ़ोतरी हुई है। जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज में 60 बच्चों की मौत हुई है। ये सभी बच्चे कुपोषित थे। इन कुपोषित बच्चों को गंभीर स्थिति में अस्पताल के सीसीयू में भरती कराया गया था।

पिछले तीस दिनों में हुए हुई इन 60 मौतों की जांच के लिए तीन सदस्यीय टीम गठित की गई है। टीम में डायरेक्टर मेडिकल एंड एजुकेशन डॉ एएन मिश्रा, रीजनल डिप्टी डायरेक्टर डॉ हिमांशु भूषण और सिविल सर्जन डॉ केसी मुंडा शामिल हैं। टीम के सदस्यों ने शुक्रवार को अस्पताल पहुंच कर मामले की जांच की। बाल विभाग के प्रभारी और नर्स से पूछताछ के बाद जांच टीम ने पाया कि अस्पताल में बच्चों की मौत से संबंधित आंकड़े ठीक नहीं हैं। बीएचटी में बच्चों की उम्र कुछ और डाटा इंट्री में कुछ और दर्ज है। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने बताया कि एक  हजार में 25 बच्चों की मौत होती है, तो यह मान्य है, पर यहां तो मौत का आंकड़ा अत्यंत चिंताजनक है।

उल्लेखनीय है कि इस अस्पताल में बंगाल, ओड़िशा सहित पूरे कोल्हान के लोग अपने बीमार बच्चे का इलाज कराने आते हैं। एनआइसीयू में शून्य से 28 दिन के बच्चों को रखा जाता है। बच्चों की मौत का मुख्य कारण उनका तय समय से पहले जन्म लेना, मां के कमजोर होने और उनमें खून की कमी होने से बच्चों का भी कमजोर होना शामिल है। टीम ने पाया कि पहले यहां पीआइसीयू व एनआइसीयू नहीं रहने के कारण गंभीर बच्चों को दूसरे अस्पतालों में भेज दिया जाता था, लेकिन अब वैसे बच्चों का भी यहां इलाज किया जाता है। मौत का आंकड़ा बढ़ने का यह भी अहम् कारण है। टीम ने जांच में पाया कि अस्पताल में हर माह बच्चों के भरती होने की संख्या बढ़ रही है। उसी अनुपात में मौत का आंकड़ा भी बढ़ रहा है।

जांच दल में शामिल निदेशक मेडिकल एजुकेशन डॉ एएन मिश्र ने कहा, अब तक की जांच से पता चला है कि बच्चों की मौत कुपोषण से ही हुई है। गर्भवती मां अस्पताल में जाकर एएनसी नहीं कराती, जिस कारण उन्हें सही खुराक नहीं मिल पाती। टेटेनस की सुई नहीं मिल पाती। जन्म के बाद भी नवजात को जो टीका मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पाता। नतीजतन बच्चों की स्थिति जब बिगड़ जाती है, तब उन्हें अस्पताल लेकर आते हैं।

निदेशक प्रमुख डॉ  सुमंत मिश्रा ने कहा कि बच्चों की मौत के कारणों का पता लगाया जा रहा है। अभी तक की जांच में यह बात सामने आयी है कि जिले में संस्थागत प्रसव बढ़ा है। मिश्रा के अनुसार , पहले बच्चे की मौत हो जाती थी, तो पता ही नहीं चलता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। संस्थागत प्रसव के बाद बच्चे की स्थिति खराब होने पर उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और उसके बाद अस्पताल भेजा जा रहा है। उन्होंने कहा, “सरकार गर्भवती महिलाओं के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन जागरूकता के अभाव में गर्भवती महिलाएं इसका लाभ नहीं उठा पाती हैं। इससे विटामिन की पूरी खुराक नहीं मिल पाती है, जिससे माताएं कमजोर हो जाती हैं। इससे बच्चे भी कमजोर व कुपोषित पैदा हो रहे हैं।” मिश्रा ने बताया कि जांच टीम ने  रिपोर्ट तैयार कर ली है। रिपोर्ट में जो भी दोषी पाया जायेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जायेगी।

क्या हैं मौत के आंकड़े?

प्राप्त जानकारी के मुताबिक अस्पताल में मई से अगस्त के दौरान एनआइसीयू, पीआइसीयू व वार्ड में विभिन्न रोगों से ग्रस्त 1867 बच्चों को भरती किया गया था। इनमें से 164 बच्चे की मौत हो गयी। सिर्फ एनआइसीयू की यदि बात करें, तो इसमें कुल 343 बच्चे भरती थे और यहीं सबसे अधिक, अर्थात 112 बच्चों की मौत हुई। अगस्त में इन तीनों जगहों पर कुल 470 बच्चों को भरती कराया गया था, जिनमें 41 बच्चों की मौत हो चुकी है। पीआइसीयू में 110 बच्चों में 31 और वार्ड में 1410 में 21 बच्चों की मौत हो गयी।



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